Mahabalipuram, मोदी और जिनपिंग की मुलाकात के लिए महाबलीपुरम् ही क्यों? कूटनीति में गहरे हैं इसके मायने

मोदी और जिनपिंग की मुलाकात के लिए महाबलीपुरम् ही क्यों? कूटनीति में गहरे हैं इसके मायने

Mahabalipuram, मोदी और जिनपिंग की मुलाकात के लिए महाबलीपुरम् ही क्यों? कूटनीति में गहरे हैं इसके मायने
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कश्मीर पर कुटिल कूटनीति का साया लेकर भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर शुक्रवार को चेन्नई पहुंच गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चेन्नई से करीब 40 किलोमीटर दूर महाबलिपुरम् में चीनी राष्ट्रपति का इंतजार कर रहे हैं. दिल्ली में पीएमओ का पूरा ऑपरेशन वर्तमान में महाबलिपुरम् में शिफ्ट हो चुका है. हालांकि, इस बीच एक रोचक सवाल भी उभर रहा है कि शी जिनपिंग से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरू, सूरत, अहमदाबाद या चेन्नई जैसे शहरों में मिलने के बजाए महाबलिपुरम् को ही क्यों चुना गया?
यूरोशिया की दो महाशक्तियों के राजनैतिक मुखिया के बीच दो दिनों में होने वाली वार्ताओं के लिए अचानक एक प्राचीन शहर का नाम सामने आने के बाद इसकी चर्चा होना भी स्वाभाविक है. लोग इंटरनेट और यू-ट्यूब पर पिछले 24 घंटे से महाबलिपुरम् की तलाश कर रहे हैं. लोग इस शहर के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां जुटाने में लगे हैं. ऐसे में हम आपको उन संभावनाओं के बारे में बताते हैं कि केंद्र सरकार ने क्यों महाबलिपुरम् को चुना होगा. दरअसल, दो देशों के बीच हर बातचीत और संकेत के कूटनीतिक मायने होते हैं. महाबलिपुरम् भी वार्ता स्थल से ज्यादा दोनों देशों की प्राचीनता और उनके बीच पुराने संबंधों को प्रकट करने वाला एक शहर है.
जानकार बताते हैं कि दक्षिण भारत के इस प्राचीन शहर का चीन से पुराना रिश्‍ता रहा है. महाबलीपुरम का चीन के साथ करीब 2000 साल पुराना रिश्‍ता है. कहते हैं कि समंदर किनारे बसे इस बंदरगाह वाले शहर का चीन से इस कदर पुराना नाता है कि यहां और इसके आसपास के इलाके में चीनी सिक्‍के भी मिले.
इस मायने में अहम रहा महाबलीपुरम… या मामल्‍लपुरम (Mamallapuram) प्रसिद्ध पल्‍लव राजवंश की नगरी थी. इसके चीन के साथ व्‍यापारिक के साथ ही रक्षा संबंध भी. इतिहासकार मानते हैं कि पल्‍लव शासकों ने चेन्‍नई से 50 किमी दूर स्थित मामल्‍लपुरम के द्वार चीन समेत दक्षिण पूर्वी एशियाओं मुल्‍कों के लिए खोल दिए थे, ताकि उनका सामान आयात किया जा सके.
चीन के मशहूर दार्शनिक ह्वेन त्सांग भी 7वीं सदी में यहां आए थे. वह एक चीनी यात्री थे, जोकि एक दार्शनिक, घूमंतु और बेहतरीन अनुवादक भी थे. ह्वेनत्सांग को ‘प्रिंस ऑफ ट्रैवलर्स’ कहा जाता है. बताया जाता है कि ह्वेनत्सांग को सपने में भारत आने की प्रेरणा मिली, जिसके बाद वह भारत आए और भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का दौरा भी किया.
इसके बाद उन्‍होंने उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाकों की यात्रा भी की. उन्‍होंने बौद्ध धर्मग्रंथों का संस्कृत से चीनी अनुवाद भी किया. माना जाता है कि ह्वेनत्सांग भारत से 657 पुस्तकों की पांडुलिपियां अपने साथ ले गया था. चीन वापस जाने के बाद उसने अपना बाकी जीवन इन ग्रंथों का अनुवाद करने में बिता दिया.

 


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