NationalWheels

नेहरू की इस एक गलती की कितनी कीमत चुकाएगा भारत, क्या है सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का मामला

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

रणविजय सिंह

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत में आतंकी हमलों के दोषी और पुलवामा हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों की शहादत के गुनहगार जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध में बाधक बने चीन के वीटो ने आम चुनाव के दौरान भारत में नई बहस को जन्म दे दिया है. यह बहस कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के “नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से डरते हैं. उनसे बात करने से घबराते हैं” जैसे बयान के बाद ज्यादा गंभीर हो गई है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी तीखा जवाब देने में देर नहीं लगाई. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के परनाना और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर यह कहते हुए अटैक किया कि कश्मीर और चीन की समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू दोषी हैं. उन्होंने अमेरिका की ओर से 1953 में भारत को सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव को नकार कर चीन को यह उपहार दे दिया था. यदि नेहरू ने यह गलती न की होती तो वर्तमान में भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक और ज्यादा होती. सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य होने के नाते ही चीन ने मसूद अजहर के खिलाफ आने वाले सभी प्रस्तावों के लिए वीटो का इस्तेमाल कर भारत को भारी नुकसान पहुंचा रहा है. यह भारतीय कूटनीति की जीत है कि अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन सीधे तौर पर चीन के अड़ियल रुख के खिलाफ खड़े हो गए हैं.
गौरतलब है कि चीन ने लगातार चौथी बार मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र के नामित आतंकवादी के रूप में नामित करने के प्रस्ताव को रोक दिया है. यहां तक ​​कि जब दुनिया के सभी ताकतवर देश मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंध के लिए भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए तो भारत, अतीत में हुई नेहरू की चूक के कारण चीनी बाधा को पार नहीं कर सका. इसके साथ ही अब यह भी तय है कि भारत-चीन संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है. देश के बड़े हिस्से में चीन के खिलाफ माहौल बनता दिख रहा है.

ऐतिहासिक गलतियाँ

“युद्ध का तरीका धोखे का एक तरीका है. जब सक्षम और सामर्थ्य देश पड़ोसी के धोखे से किए गए सैनिकों की तैनाती को देख नहीं पाते. जब पास, दूर दिखाई दे… यदि शत्रु पूर्ण है, तो तैयार रहें. अगर मजबूत है, तो उससे बचें. यदि वह क्रोधित है, तो उसे निराश करें. अगर वह कमजोर है, तो उसे गर्व के साथ हिलाओ. अगर वह तनावमुक्त है, तो उसे परेशान करें. यदि उसके लोग सामंजस्यपूर्ण हैं, तो उन्हें विभाजित करें. जहां वह मौजूद नहीं है हमला आप वहां करें.” चीन के महान रणनीतिकार सुन त्ज़ु की ये रणनीति पूरी तरह से भारत-चीन के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सटीक बैठती दिख रही है.
चीन अपने समकालीन विदेशी देशों के एकीकरण को कैसे गढ़ता रहा है, हेनरी किसिंजर ने अपनी पुस्तक `ऑन चाइना` में दिलचस्प तरीके से उल्लेख किया है कि चीन की कूटनीति `वी क्यूई’ के खेल को प्रतिबिंबित करती है, जिसे गो भी कहा जाता है. इसमें खिलाड़ी एक दूसरे को घेरने की कोशिश करते हैं. यह रणनीति, सुन त्ज़ु के सूत्रों से लैस है, जो संभवतः 21वीं सदी में चीन के अपने लक्ष्य की खोज को तय करती है. इसके सहारे चीन दुनिया की नंबर-1 शक्ति बनना चाहता है.
वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार तत्कालीन सभी मुख्यमंत्रियों को लिखे गए पत्र में प्रधानमंत्री नेहरू ने अमेरिकी प्रस्ताव का जिक्र किया है. उसमें नेहरू ने बताया था कि सन् 1953 में अमेरिका ने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थायी सीट की पेशकश की थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा इस बात से साफ इनकार कर दिया गया और उन्होंने सुझाव दिया था कि यह सीट चीन को दी जाए. क्योंकि वह क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से भारत से बड़ा है. उसे यह अधिकार न मिलने पर अन्याय होगा.
इंडिया रिपोर्ट कार्ड वेबसाइट के अनुसार नेहरू के शब्दों में, चीन इस लायक है कि उसे संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में उचित स्थान मिलना चाहिए. उन्होंने कहा, “अनौपचारिक रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सुझाव दिए गए हैं कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाना चाहिए, लेकिन सुरक्षा परिषद में नहीं. भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की जगह लेनी चाहिए. हम निश्चित रूप से इसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि इसका मतलब है चीन के साथ अन्याय.  चीन का सुरक्षा परिषद में नहीं होना एक महान देश के लिए बहुत अनुचित होगा. हमने उन लोगों को यह स्पष्ट कर दिया है जिन्होंने यह सुझाव दिया है कि हम इस सुझाव से सहमत नहीं हो सकते हैं. भारत इस स्तर पर सुरक्षा परिषद में प्रवेश करने के लिए उत्सुक नहीं है. एक महान देश के रूप में चीन को वहां होना चाहिए. चीन के लिए अपना सही स्थान लेने के लिए पहला कदम उठाया जाना चाहिए.” नेहरू ने कहा, “कई कारकों के कारण भारत निश्चित रूप से सुरक्षा परिषद में एक स्थायी सीट का हकदार है, लेकिन हम चीन की कीमत पर नहीं जा रहे हैं. ”
वित्त मंत्री और भारतीय राजनय इसे भारत की एक भारी ऐतिहासिक चूक मानते हैं. विधि और राजनीति के जानकार शलभ श्रीवास्तव का दावा है कि तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू की उस ऐतिहासिक चूक की कीमत भारत कई मोर्चों पर चुका रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की धमक के पीछे सुरक्षा परिषद में उसका स्थायी सदस्यता भी है जिसे भारत ने उसे सौंपा था.

वर्तमान स्थिति

भारत आज खुद को चीन द्वारा वीटो की गई अपनी कई वैध सुरक्षा चिंताओं से घिरा होने की स्थिति में पाता है, इन सुरक्षा चिंताओं का बड़ा कारण  पड़ोसी पाकिस्तान की आतंक समर्थक नीति से उपजता है. पठानकोट आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड आतंकवादी मसूद अजहर को UNSC-1267 के प्रस्ताव को वीटो का इस्तेमाल कर चीन द्वारा रोकना सबसे ताजा मामला है. इसके पहले भी तीन बार वह मसूद को बचा चुका है. भारत इस प्रस्ताव के कार्यान्वयन को संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक काउंटर टेररिज्म स्ट्रैटेजी के एक महत्वपूर्ण बिल्डिंग ब्लॉक के रूप में मानता है, जिसका उद्देश्य सभी सदस्य राज्यों और उनके नागरिकों को आतंकवादी समूहों की गतिविधियों से बचाना है.
चीन की ओर से आतंकवादियों का समर्थन कोई आश्चर्यजनक मामला नहीं है. पूर्वोत्तर से लेकर पाकिस्तान को समर्थन देकर कश्मीर तक में चीन भारत के हितों के खिलाफ काम करता रहा है.  यह इस तथ्य के बावजूद है कि 1990 के दशक से चीन शिनजियांग क्षेत्र में आतंकवाद और अलगाववादी हिंसा का शिकार बना हुआ है.

भारत के खिलाफ 10 बार चीनी वीटो

यह पहला मौका नहीं है जब चीन ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में भारत के खिलाफ अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल किया है. 45 वर्षों में चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 10 बार वीटो शक्ति का उपयोग किया है. इसके पहले उसने 26/11 हमले के दोषी आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा को सूचीबद्ध करने के भारत के प्रयास को 3 बार अवरुद्ध कर चुका है. चीन ने लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और अल अख्तर ट्रस्ट (जैश-ए-मोहम्मद का एक संगठन) पर यूएनएससी प्रतिबंधों को भी रोका है. चीन ने UNSC आतंकी सूची में सैयद सलाहुद्दीन का नाम शामिल करने वाली सूची का समर्थन करने से भी इनकार कर दिया था. इसके पहले भी भारत द्वारा 26/11 के मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड लश्कर कमांडर जकीउर रहमान लखवी पर कार्रवाई करने के लिए भारत के एक कदम को रोक दिया था. तब कारण बताया था कि नई दिल्ली ने पर्याप्त जानकारी नहीं दी है. चीन का दावा है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार है.
जहां एक ओर चीन ने यूएनएससी के तहत आतंकवादियों और आतंकी संगठन को सूचीबद्ध करने के लिए भारत के कदमों को रोकना जारी रखा है, वहीं ‘वेई क्यूई’ से प्रेरणा लेकर चीन पाक आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के मोर्चे पर पाकिस्तान के साथ जुड़ना जारी रखा है. महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव चीन ने गिलगित बाल्टिस्तान (जी-बी) से चलने वाले प्रस्तावित CPEC पर गतिविधियों को रोकने से इनकार कर दिया है, जो कि पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए भारतीय क्षेत्र है. यहां तक ​​कि पाकिस्तान के अनुसार, जी-बी विवादित क्षेत्र है और पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है.
 चीन ने लगातार CPEC को आजीविका परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन दक्षिण चीन में भारतीय निजी कंपनियों के तेल की खोज का विरोध किया है.  चीन समुद्र में तेल खोज को संप्रभुता का मामला बताकर आंखें तरेर रहा है.चीन ने कहा है कि “हम भारतीय पक्ष की चिंता जानते हैं और वे परियोजनाएँ राजनीतिक परियोजनाएँ नहीं हैं. वे सभी लोगों की आजीविका के लिए हैं … हम क्षेत्र के मुद्दे पर किसी भी पार्टी के साथ नहीं हैं.
 पूर्व सेना प्रमुख सेवानिवृत्त जनरल वीपी मलिक ने एक कॉलम में  ने कहा कि चीन जिस रणनीतिक गलियारे को सीपीईसी गलियारे के माध्यम से हासिल करना चाहता है,  जब CPEC पूरा हो जाता है तो यह क्षेत्र में एक राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक गेम चेंजर होगा. गिलगिट-बाल्टिस्तान की शक्सगाम और अन्य घाटियों पर चीन का नियंत्रण हो सकता है. इस क्षेत्र को उत्तर-पश्चिमी तिब्बत के अपने सैन्य और औद्योगिक परिसरों से जोड़ा जा सकेगा. चीन ने परियोजना की सुरक्षा और इसमें शामिल कार्यबल के लिए पाकिस्तान से प्रतिबद्धता भी प्राप्त की. गिलगित-बाल्टिस्तान के डायमर जिले में मुख्यालय के साथ पाकिस्तान सेना ने इसके लिए एक विशेष सुरक्षा प्रभाग खड़ा किया है.
भारत के रास्ते में बार-बार अड़ंगा लगाने के पीछे चीन को मिला वही विशेषाधिकार है जिसे लेने से पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ठुकरा दिया था और चीन को उसे थाल में सजाकर प्रस्तुत कर दिया. वर्तमान में यह मुद्दा चुनाव के दौरान तेजी के साथ उठ सकता है. भारत की मजबूती की राह का कांटा बने चीन के समर्थन में राहुल गांधी के खड़े होते दिखने से इसका नुकसान भी कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है.

 

Nationalwheels India News YouTube channel is now active. Please subscribe here

(आप हमें फेसबुकट्विटर, इंस्टाग्राम और लिंकडिन पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

 

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

NationalWheels will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.