NationalWheels

महिला आरक्षण बिल पर 23 साल से वादाखिलाफी

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

विजय शंकर पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार

सच कहूं तो भारतीय संसद पितृसत्तात्मक भारतीय समाज का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है, जहां आधी आबादी की नुमाइंदगी न के बराबर है। लोकतंत्र की पैठ हमारे देश में कहां तक है, इसकी बानगी है पंचायती राज। ग्राम प्रधान के चुनाव में भी भारत में आम चुनाव से कम गहमागहमी नहीं रहती। कई जगह तो गोलियां तक चल जाती हैं। मगर इस लोकतंत्र में आधी आबादी की नुमाइंदगी की चुगली करते नजर आते हैं प्रधान पति और ब्लाक प्रमुख पति जैसे अनऑफिशियल तमगे। 33 फीसदी आरक्षण महिलाओं को देकर शायद कोई भी राजनीतिक दल अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहता।  पितृसत्तात्मक संरचना वाले समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद, महिलाओं के लिए स्पेस को कमतर करते रहने की मंशा में कैसी हैरानी… अफसोस जरूर होता है। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता …  सरीखे मंत्र जपने वाले आखिर क्यों डरते हैं महिलाओँ से , महिला सशक्तीकरण की राह में रोड़े क्यों अटका रहे हैं भारतीय सांसद, महिला आरक्षण की हुंकार से सत्ता में तो मोदी सरकार आई मगर भूल गई, राहुल गांधी कितना निभाएंगे वादा , यह तो वक्त बताएगा।
  • भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का करीब 48 फीसदी हैं
  • रोजगार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 26 फीसदी की है
  • न्यायपालिका और सरकारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है
  • आरक्षण के चलते पंचायतों में नुमाइंदगी है, मगर घूंघट की ओट में
  • महिलाओं के नाम पर उनके पति या बेटे हुक्म चलाते हैं
  • कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे राज्यों में तो 50 फीसदी आरक्षण है मगर धरातल पर तो हालात कलई खोलते नजर आते हैं
  • संसद में महिला प्रतिनिधित्व के वैश्विक औसत में भारत का स्थान बहुत नीचे है
  • 543 सीटों वाली लोकसभा में इस समय मात्र 62 महिला सांसद हैं
  • 2009 में 58 महिलाएं थीं, ग्राफ तो बढ़ा, लेकिन नगण्य ही माना जाएगा
  • 22 साल हो गए इस बिल को संसद में पेश हुए , 2010 में राज्यसभा से पास हुआ, मगर लोकसभा में लटक गया
  • UPA 2 के पास पर्याप्त संख्या बल था फिर भी कोताही की गई
  • BJP महिला आरक्षण का वादा कर सत्ता में आई, मगर भूल गई

लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या

पहली लोकसभा में 22 महिलाएं जीती थीं जो सदन की कुल संख्या का 4.4 प्रतिशत थी। 1957 में दूसरी लोकसभा में 27 महिलाएं चुनकर आई थीं जो कुल संख्या का 5.4 प्रतिशत थी । 1962 में तीसरी लोकसभा में 34 महिलाएं जीत कर आईं जो 6.7 प्रतिशत थी। चौथी लोकसभा में 31 महिलाएं (5.9 प्रतिशत) जीत कर आईं। पांचवी लोकसभा में 22 महिला सदस्यों (4.2 फीसदी) ने जीत दर्ज की। छठी लोकसभा में 19 महिलाएं (3.4 फीसदी), सातवीं लोकसभा में 28 महिलाएं (5.1 प्रतिशत), आठवीं लोकसभा में 44 महिलाएं (8.11 फीसदी), नौवीं लोकसभा में 28 महिला सांसद (5.3 प्रतिशत) जबकि दसवीं लोकसभा में 36 महिलाएं (7 प्रतिशत) सांसद चुनकर आईं। 11वीं लोकसभा में 40 महिलाएं जीतकर आईं जो संख्याबल का 7.4 प्रतिशत थी तो 12वीं लोकसभा में 44 महिलाएं (8 प्रतिशत) आईं। 13वीं लोकसभा में 48 महिलाएं चुनकर आईं जो कुल संख्याबल का 8.8 प्रतिशत थी, जबकि 14वीं लोकसभा में 45 महिलाएं चुनकर आईं जो 8.1 प्रतिशत थी। 15वीं लोकसभा में 59 महिलाएं चुनकर आईं जो 10.9 प्रतिशत थी, वहीं 16वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 62 है जो संख्याबल का करीब 11 प्रतिशत है।

दुनिया के देशों में ये है महिलाओं की स्थित

दुनिया के तक़रीबन सौ देशों में सियासत में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन एशियाई देशों में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। इन देशों का औसत अनुपात 18.5 फीसद है, जो का़फी कम है। इस मामले में श्रीलंका की हालत बेहद खराब है, जहां यह दर महज़ छह फीसद है। पश्चिमी देशों की महिलाएं सियासत में बहुत आगे हैं। रवांडा की संसद में 56 फीसद महिलाएं हैं। यह दर दुनिया में सबसे ज़्यादा है। इसके बाद स्वीडन का स्थान आता है, जहां यह दर 47 फीसद है। दक्षिण अफ्रीका में 45 फीसद, आइसलैंड में 43 फीसद, अर्जेंटीना में 42 फीसद, नीदरलैंड्स में 41 फीसद, नॉर्वे में 40 फीसद,  सेनेगल में 40 फीसद, डेनमार्क में 38 फीसद, अंगोला में 37 फीसद और कोस्टारिका में भी 37 फीसद महिलाएं संसद में हैं. भारत में यह दर महज़ 11 फीसद ही है। इंग्लैंड में हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्डस में यह आंकड़ा क्रमश: 23 और 24 फीसदी है। अमेरिका के निचले सदन में 20 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि उच्च सदन में केवल 20 सांसद हैं।
” संसद में महिलाओं की स्थिति हमारे पड़ोसी मुल्कों में ज्यादा बेहतर है। नेपाल में 29.5 फीसदी महिलाएं संसद में प्रतिनिधित्व करती हैं तो वहीं, अफगानिस्तान में यह आंकड़ा 27.7 फीसदी और पाकिस्तान में 20.6 प्रतिशत है। यह शर्मनाक बात है कि भारत में महिला सदस्यों का औसत मात्र 12 फीसदी है। “

आज भी घूंघट की ओट में महिला जनप्रतिनिधि

ग्राम पंचायतों में आरक्षण के चलते महिलाओं की नुमाइंदगी तो बढ़ी मगर घूंघट की ओट हटाकर महिला ग्राम प्रधान अभी भी दहलीज के बाहर नहीं आ पा रही हैं। तमाम पंचायतों में प्रधानों के पति ही गांव की सरकार चला रहे हैं। ठीक इसी तरह बीते 23 साल से राज्य सभा में पास होने के बावजूद ठंडे बस्ते में है महिला आरक्षण बिल। यक्ष प्रश्न तो यही है कि आखिर कब तक पास होगा महिला आरक्षण बिल ? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मानसून सत्र से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी महिला कल्याण की चिंताओं की याद दिलाते हुए महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पास कराने की अपील की थी।  इसके बाद बात आई गई हो गई। खुद राहुल गांधी लगता है इस पर अपनी पार्टी में अमल करना भूल गए, जिसकी कार्य समिति के पिछले दिनों हुए पुनर्गठन में महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है। हालांकि यह बात अलग है कि मोदी को बिना शर्त समर्थन की चिट्ठी में 32 लाख हस्ताक्षर भी भेजे गए हैं। मगर राजनीतिक दलों और नेताओं के जबानी जमा खर्च के रुटीनी अभ्यास से मामला आगे नहीं बढ़ा। नतीजतन इस बिल को कानून की शक्ल नहीं मिल पाया।

राहुल ने फिर उम्मीदों को पंख लगाए

अब एक बार फिर राहुल गांधी ने उम्मीदों को पंख लगा दिया है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र 2019 में 17वें लोकसभा के पहले सत्र में ही महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने का वादा किया है। इस विधेयक के पास हो जाने के बाद से 33 फीसदी लोकसभा सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकेगा। साथ ही केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का लाभ मिल सकेगा।

आखिर क्या है महिला आरक्षण बिल ?

यह भारतीय संविधान के 85वें संशोधन का विधेयक है। इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान रखा गया है। इसी 33 फीसदी में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी है। महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक राज्यसभा में 2010 में पारित हो चुका है। अब लोकसभा में इसे पारित करवाने की बारी है। लेकिन लोकसभा की डगर बहुत ही कठिन निकली। यूपीए के पास पर्याप्त संख्या बल था लेकिन न जाने क्यों इसमें कोताही की गई और अब 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ आई बीजेपी भी लगता है इसे भूलने का बहाना कर रही है जबकि ये उसके चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था।  2010 में जब राज्यसभा से बिल पास हुआ था तो न सिर्फ विभिन्न दलों की कद्दावर महिला नेताओं का यादगार फोटो सेशन पूरे देश ने देखा था बल्कि उस समय राज्यसभा में बीजेपी के नेता अरुण जेटली ने कहा था कि वो उनके लिए गर्व और सम्मान का ऐतिहासिक पल है। मौजूदा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज उस समय लोकसभा में विपक्ष की नेता थीं। वे इस बिल की सबसे प्रमुख पैरोकारों में एक रही हैं,  क्या इस बिल को लेकर पार्टी में मतभेद और वर्चस्व का इतना बड़ा पहाड़ खड़ा हो गया है जो उन्हें इस बिल की तूफानी पैरवी से रोके रख रहा है या बात कुछ और है?

1996 में पहली बार आया विधेयक

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए 1996 में एचडी देवेगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया गया था। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल बिल के सबसे मुखर विरोधी रहे हैं। एक समय तक जनता दल यूनाईटेड भी इस विरोध में शामिल रहा था। आइए विस्तार से समझते हैं इस बिल के बारे में कि आरक्षण के बाद क्या बदलाव होगा –
बिल के मुताबिक महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें रोटेशन में आरक्षित की जानी हैं। सीटों का बंटवारा कुछ इस तरह होगा कि एक सीट, लगातार तीन आम चुनावों में एक बार के लिए ही आरक्षित हो सके। बिल में ये भी कहा गया था कि लागू होने के बाद 15 साल तक आरक्षण की व्यवस्था रहेगी और उसके बाद ये व्यवस्था खत्म हो जाएगी। बिल के विरोधियों के भी कुछ तर्क रहे हैं,  जो इसमें निहित कुछ प्रावधानों से जुड़े हैं लेकिन ये सारी कमजोरियां तो दूर कर ली जातीं अगर कोई सर्वसम्मति बनती। जो भी चिंताएं या डर इस बिल को लेकर रहे हैं उनका समाधान तो कोई बहुत कठिन नहीं होना था  लेकिन एक राह निकालने की नौबत ही नहीं बनने दी जा रही ।

राज्यसभा की बुलंदी लोकसभा में न जाने कहां दबी रह गई

सत्ताएं आ रही हैं और जा रही हैं , लेकिन महिला हितों को लेकर कोई ठोस ऐक्शन नदारद है, जबकि संसद से ही इसकी शुरुआत होती तो सोचिए ये देश के लिए कितना बड़ा संदेश होता। महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ी राह खुलती। महिलाओं के प्रति समाज में वर्चस्व और मर्दवादी रवैये और उनके खिलाफ अपराधों और हिंसाओं का ग्राफ नीचे आता। कुल मिलाकर उनके खिलाफ पुरुष दबंगई में गिरावट आती लेकिन विधायिका ही उदासीन है तो फिर हालात कैसे बदलेंगे ? 1996 का बिल भारी विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया था।1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में फिर से बिल पेश किया। गठबंधन की मजबूरियों और भारी विरोध के बीच ये लैप्स हो गया और 1999, 2002 और 2003 में इसे फिर लाया गया। एनडीए गठबंधन पूर्ण बहुमत के साथ लौटा और वाजपेयी अपने दूसरे कार्यकाल में ये बिल पास करा सकते थे और कांग्रेस व वाम दल भी इसके समर्थन में थे लेकिन कारण बताया गया वही- गठबंधन की मजबूरियां और नतीजा भी वही रहा- सिफर।  2008 में मनमोहन सिंह सरकार ने बिल को राज्यसभा में पेश किया। दो साल बाद वो एक दुर्लभ क्षण था जब तमाम राजनीतिक अवरोधों को दरकिनार कर सदन में ये बिल पास करा दिया गया। कांग्रेस को बीजेपी और वाम दलों के अलावा कुछ और अन्य दलों का साथ मिला लेकिन लोकसभा में 262 सीटें होने के बावजूद मनमोहन सरकार बिल को वहां पास नहीं करा पाई। राज्यसभा की बुलंदी लोकसभा में न जाने कहां दबी रह गई और आज, साल 2019, महिला आरक्षण बिल पर ‘हम निभाएंगे’ की टंकार के बीच कांग्रेस एक बार फिर जनता जनार्दन के बीच मुखातिब है लेकिन बाकी राजनीतिक दल और सरकार रहस्यपूर्ण खामोशी ओढ़े हुए हैं।

भारत में महिलाओं की स्थित केन्या से भी बदतर

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में महिलाओं की स्थिति केन्या और सेनेगल जैसे देशों से भी खराब है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में आर्थिक प्रगति के साथ-साथ महिलाओं के खिलाफ अपराध में भी तेजी आई है। लैंगिक समानता के लिहाज से देखें तो 2018 में भारतीय संसद में महिलाओं की संख्या सबसे कम,  महज 12 प्रतिशत है, वहीं, सेनेगल के लिए यह आंकड़ा 42 प्रतिशत है।

14 सालों में रोजगार के बाजार में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी आधी हुई

बाल विवाह और 18 साल की उम्र से पहले जबरन विवाह के मामले में भी भारत दूसरे स्थान पर है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की चर्चित शोध संस्था ई-पॉड अर्थात एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन की शोध रपट के मुताबिक भारतीय कामगारों में महिलाओं की भागीदारी में लगातार गिरावट आ रही है और 2.5 करोड़ कमासुत महिला कामगार कार्यक्षेत्र से बेदखल हुई हैं। ‘बेटी पढ़ाओ’ सरीखी योजनाओं से फायदा लेकर बच्चियां स्कूल जरूर जाने लगी हैं, पर स्कूल पास कर लेने से क्या?…. पिछले करीब 14 सालों में देश की करोड़ों ग्रामीण महिलाओं ने अपनी नौकरियां खो दी हैं। 2004-05 से शुरू हुए इस सिलसिले के तहत साल 2011-12 में नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी सात प्रतिशत तक कम हो गई। इसके चलते नौकरी तलाशने वाली महिलाओं की संख्या घट कर 2.8 करोड़ के आसपास रह गई। इंडियन एक्सप्रेस ने नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के 2017-18 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के हवाले से यह रिपोर्ट प्रकाशित की है,  इसके मुताबिक नौकरी गंवाने वाली ज्यादातर महिलाएं 15-59 साल की हैं। अखबार के मुताबिक 2004-05 में नौकरियों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 49.4 प्रतिशत थी. लेकिन 2011-12 में यह घट कर 35.8 प्रतिशत हो गई थी। वहीं, 2017-18 में यह केवल 24.6 प्रतिशत रह गई। यानी 14 सालों में राष्ट्रीय रोजगार बाजार में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी करीब आधी हो गई है। क्या इस तरह के शोध के नतीजे आपको खतरे की घंटी बजाते नहीं लगते।

आखिरकार विरोध क्यों ?

महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने वाली राजनीतिक पार्टियां अपने पक्ष में कई तरह की दलीलें देती हैं। उनका कहना है कि पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं को भी राजनीति में हिस्सेदारी करनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इस विरोध के पीछे कुछ अलग ही कारण बताते हैं।
  • ज़्यादातर पुरुष सांसदों को लगता है कि अगर उनकी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो गई तो वे शायद फिर कभी लोकसभा के सदस्य बन ही नहीं पाएंगे।
  • छोटी पार्टियों को लगता है कि बारी-बारी से सीटें आरक्षित करने पर उनका जनाधार हाथ से निकल जाएगा।
  • कुछ सामाजिक संगठन ये तर्क भी देते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने से राजनीतिक दलों के लिए इतनी बड़ी संख्या में महिला उम्मीदवार ढूंढ पाना मुश्किल हो जाएगा।
  • उम्मीदवार न मिलने की वजह से कई राजनेता अपनी पत्नियों या दूसरी महिला रिश्तेदारों को टिकट दिलवाकर और उन्हें जीताकर ख़ुद उनके नाम पर शासन चलाएंगे।
  • संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों के लिए जनप्रतिनिधि व्यवस्था में आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया है।
  • बहरहाल इन तमाम अड़चनों के चलते महिला आरक्षण विधेयक एक सत्र से दूसरे सत्र और एक लोकसभा से दूसरी लोकसभा तक टलता जा रहा है।
  • हर चुनाव में ये एक बड़ा मुद्दा बनता है। हर लोकसभा में इसे लाने की और फिर इसे पास करवाने की बात की जाती है। फिर भी  ये विधेयक लटका हुआ है।

 

Nationalwheels India News YouTube channel is now active. Please subscribe here

(आप हमें फेसबुकट्विटर, इंस्टाग्राम और लिंकडिन पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

 

You have successfully subscribed to the newsletter

There was an error while trying to send your request. Please try again.

NationalWheels will use the information you provide on this form to be in touch with you and to provide updates and marketing.