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वाराणसीः बाबा विश्वनाथ के दरबार से सीधे गंगा का दीदार

वाराणसीः बाबा विश्वनाथ के दरबार से सीधे गंगा का दीदार
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

विभूति नारायण चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी से

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर को विकसित करने के लिए 296 इमारतों की पहचान की गई, जिनका अधिग्रहण करके ध्वस्तीकरण किया जाएगा। अब तक 182 भवनों को खरीदने के साथ 50 से ज्यादा  इमारतों को ध्वस्त कर दिया गया है। तीन हजार से ज्यादा मजदूर इस कार्य में लगे हैं। बाकी इमारतों के अधिग्रहण व खरीद की प्रक्रिया जारी है।  कॉरिडोर बन जाने के बाद तीर्थयात्रियों को संकरी गलियों के सहारे विश्वनाथ मंदिर पहुंचने से मुक्ति मिल जाएगी। तीर्थयात्री सीधे मणिकर्णिकाघाट, जलासेन व ललिताघाट से काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंच सकेंगे। दिव्यांग तीर्थयात्री व वीआईपी ही छत्ताद्वार से प्रवेश करेंगे।
– गंगा घाट से लेकर मंदिर परिसर तक मकानों को  तोड़ा जा रहा है। कोई इसे बदलता बनारस कह रहा है तो कोई असली बनारस
– कॉरिडोर के निर्माण के लिए जिन भवनों की खुदाई चल रही है, उनमें प्राचीन मूर्तियों सहित पुरातन कलाओं और शैली में निर्मित मंदिर भी निकल रहे हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक में बिल्कुल काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह ढांचा निकला है
-2017 के मई माह में पीएम मोदी ने काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन किया था और कहा था कि इसे सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर विकसित किया जाए। प्रदेश की योगी सरकार ने दिसंबर 2017 में इस परियोजना के लिए 600 करोड़ रुपए की मंजूरी दी। अब तक इसके लिए काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन को 183 करोड़ रुपए आवंटित किए जा चुके हैं। इस योजना के तहत जो दुकानदार व किराएदार आ रहे हैं, उनके पुनर्वास की भी योजना है
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बार जब वाराणसी में वोट मांगने उतरेंगे तो उनके पास गिनाने के लिए विश्वनाथ धाम भी होगा। अहिल्या बाई होल्कर ने जब 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार और आसपास के इलाके का विकास कराया तब से लेकर अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है। आबादी में बढ़ोतरी के साथ ही काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने पहुंचने वाले दर्शनार्थियों की संख्या में भी कई गुना की बढ़ोतरी हो चुकी है। लेकिन लाहौरी टोला स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचाने और दर्शन कराने वाली गलियां जस की तस बनी रहीं। काशी विश्वनाथ मंदिर में रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं और विशेष अवसरों पर इनकी संख्या लाखों में पहुंच जाती है। देश और दुनिया से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की तंग गलियों को देखते हुए दर्शन को सुगम बनाने की जरूरत भी लोगों को महसूस होती रही लेकिन पहल नहीं हुई।

बसपा-सपा ने भी सोचा था पर हिम्मत नहीं जुटाई

काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास सुविधा बढ़ाने की सोच उत्तर प्रदेश की सत्ता में रही बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकार में भी आई और शुरुआती सर्वेक्षण भी कराए गए। इसके बाद बात आगे नहीं बढ़ी। दोनों ही सरकारों ने तंग गलियों और पुराने मकानों को हाथ लगाने की हिम्मत नहीं दिखाई। शायद उनकी राजनीतिक समझ में फायदे से ज्यादा नुकासान दिखाई दे रहा था।

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर पर खर्च होंगे 600 करोड़

हिन्दुत्व के खुले एजेंडे वाली भारतीय जनता पार्टी के केंद्र और उसके बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर योजना ने गति पकड़ी। इस साल 8 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब काशी विश्वनाथ धाम की आधारशिला रखी तो उन्होंने कह भी दिया कि केंद्र में उनकी सरकार आने के बाद तीन साल तक वाराणसी में विकास का काम इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि प्रदेश की समाजवादी सरकार सहयोग नहीं कर रही थी। काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया जाता है। इस परियोजना पर सरकार 600 करोड़ रुपए खर्च करेगी।

परियोजना की सबसे बड़ी अड़चन जमीन थी। इस अड़चन को दूर कर लिया गया है। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के सैकड़ों मकानों को न सिर्फ खरीदा जा चुका है बल्कि उन्हें तोड़ा भी जा चुका है। कई लोग शुरू में तो मकान बेचने और अपनी रिहाइश छोड़ने को तैयार नहीं हो रहे थे लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति के आगे उन्हें झुकना पड़ा। जिन लोगों के मकानों पर किराएदारों का कब्जा था उन्हें तो सरकारी खरीद में बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद नजर आने लगा । जिस सम्पत्ति का मालिक होते हुए उन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा था उन्हें अचानक अपनी सम्पत्ति की न सिर्फ कीमत मिल गई बल्कि वो यह भी कहने लगे कि इस पुनीत कार्य में सम्पत्ति देना उनका योगदान है। मुसीबत उन लोगों को हुई जो सालों, दशकों या यूं कहें सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के मकानों में सेवइत, केयरटेकर या फिर किराएदार के तौर पर रह रहे थे। हालांकि प्रशासन का दावा है कि ऐसे लोगों को भी उचित मुआवजा दिया गया है।

काम न आया विरोध का स्वर

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के लिए जब मकानों की खरीद का काम शुरू हुआ तो विरोध के स्वर भी उभरे। कुछ लोगों ने संगठित होकर प्रदर्शन भी किया लेकिन जनता का वो सहयोग उन्हें नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। लिहाजा कॉरिडोर निर्माण विरोध का आंदोलन समय के साथ न सिर्फ मद्धिम पड़ा बल्कि लगभग खत्म हो गया। स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सहित निर्माण विरोधियों की सबसे बड़ी दलील यह थी कि काशी की ऐतिहासिकता, प्राचीनता और परंपरा को नष्ट किया जा रहा है लेकिन वह शायद समय की आवश्यकता को नहीं समझ पाए।

कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए

कॉरिडोर के लिए खरीदी गई इमारतों को जब तोड़ा गया तो कई चौंकाने वाली चीजें भी सामने आईं। वैसे तो पुरानी काशी के ज्यादातर पुराने मकानों में शिवमंदिर और शिवलिंग मिलते हैं लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर क्षेत्र में एक ऐसा मंदिर भी एक मकान के भीतर से निकला जो मौजूदा मंदिर की अनुकृति है। इसके साथ ही इस बात का भी खुलासा हुआ कि कई मंदिरों को मकानों के भीतर नाजायज तरीके से कब्जा कर हथिया लिया गया था।

जल मार्ग से भी पहुंच सकते हैं बाबा धाम तक

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का शिलान्यास करने के बाद एक वीडियो ट्वीट किया जिसमें भावी कॉरिडोर में विकसित की जाने वाली सुविधाओं और निर्माणों का ब्योरा दिया गया है। प्रधानमंत्री के ट्वीटर हैंडर से ट्वीट किए गए इस वीडियो में दिखाया गया है कि कॉरिडोर गंगा और काशी विश्वनाथ मंदिर को 50 फीट चौड़े गलियारे से जोड़ देगा। उत्तर वाहिनी भागीरथी के बाएं तट यानि पश्चिमी में स्थित ललिता घाट से श्रद्धालु सीधे बाबा के दरबार जा सकेंगे या फिर मंदिर से गंगा आ सकेंगे।
इस तरह की सुविधा के विकास का एक और फायदा श्रद्धालुओं को यह होगा कि वो पुराने बनारस शहर के जाम से बचते हुए जल मार्ग से बाबा धाम तक पहुंच सकते हैं। जल परिवहन बढ़ने का सीधा फायदा नाविकों को होगा। प्रधानमंत्री ने कॉरिडोर का जो वीडियो ट्वीट किया है उसमें दिखाया गया है कि कॉरिडोर में लाइब्रेरी, कैफे, मल्टीपरपज हॉल, वैदिक केंद्र, वाराणसी गैलरी, यात्री सुविधा केंद्र, दुकानें, कार्यालय, म्यूजियम, एम्पोरियम, भोगशाला, गेस्ट हाउस के साथ ही रिसेप्शन और प्रशासनिक एवं सुरक्षा दफ्तर बनाए जाएंगे। बताया जा रहा है कि इन सुविधाओं को विकसित करने और काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास की जगह को भव्यता प्रदान करने के लिए 600 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।

मंदिर का इतिहास

काशी विश्वनाथ मंदिर का उल्लेख पुराणों में भी आता है। मूल मंदिर किसने बनवाया ये तो नहीं पता लेकिन 1194 में कुतुबउद्दीन एबक की सेना द्वारा मूल मंदिर को तोड़े जाने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद इस मंदिर के टूटने और बनाए जाने का सिलसिला चल पड़ा। सल्तनत काल में भी इस मंदिर को तोड़ा गया। मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में राजा मान सिंह ने फिर यह मंदिर बनवाया। राजा टोडर मल ने भी बाद में इस काम को आगे बढ़ाया।
औरंगजेब के शासनकाल में यह मंदिर फिर निशाना बना और इसके पास ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ। जिस कुएं के नाम पर ज्ञानवापी मस्जिद आज भी जानी जाती है वह कुआं आज भी मस्जिद और  मंदिर के बीच है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि जयपुर के महाराज ने 1750 ई. में काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास का सर्वेक्षण जमीनों को खरीदने के इरादे से कराया था ताकि मंदिर का पुनर्निमाण कराया जा सके। 1780 ई. में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मौजूदा मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर परिसर में 7 फुट ऊंची नंदी की एक प्रतिमा भी है जो नेपाल नरेश ने उपहार में दिया था। नागपुर के भोंसले शासकों ने सन 1841 में मंदिर को चांदी दान की तो 1835 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर की गुम्बद पर चढ़ाने के लिए एक टन सोना दान में दिया।

इस मंदिर में पहुंचने वाले प्रमुख व्यक्ति

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ यानि की विश्वेश्वर के दर्शन की इच्छा हर धर्मावलंबी हिन्दू को होती है। महात्मा गांधी भी काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे थे। वह साल 1902 का था जब एक हिन्दू श्रद्धालु के तौर पर उस विश्वनाथ गली से गुजरे थे जहां आज कॉरिडोर आकार ले रहा है। गांधी उस वक्त तक न तो महात्मा थे, न ही नेता। मंदिर की दशा देखकर वह दुखी हुए थे। “भिनभिनाती मक्खियां और दुकानदारों का शोर उस जगह पर जहां कोई ध्यान और आध्यात्मिक भावना प्रकट करने जाता है।” आदि शंकराचार्य, गुरुनानक देव, स्वामी विवेकानंद जैसे लोग भी उन लोगों में शामिल हैं जो बाबा के दरबार में पहुंचे थे।

कॉरिडोर की खासियत

2500 वर्ग मीटर में बनेगा
करीब 50 फुट का गलियारा ललिता घाट को मंदिर से जोड़ेगा
घाट का सुंदरीकरण होगा
श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए प्रतीक्षालय होगा
संग्रहालय और ऑडिटोरियम बनाया जाएगा जिसमें बनारस का इतिहास और संस्कृति दिखेगी
हवन और यज्ञ के लिए यज्ञशाला का निर्माण होगा
श्रद्धालुओं के लिए गेस्टहाउस होगा
श्रद्धालुओं के लिए स्वागत पटल और दूसरी सुविधाएं होंगी
मंदिर से पहले गलियारा में एक भव्य चौक बनाया जाएगा
गलियारे में पर्यटकों को बनारसी पकवानों का स्वाद मिलेगा

 

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