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अमेरिकी अखबार का दावा- खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से बिखर सकता है पाकिस्तान, इमरान के पास सीमित हैं विकल्प

अमेरिकी अखबार का दावा- खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से बिखर सकता है पाकिस्तान, इमरान के पास सीमित हैं विकल्प
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
नई दिल्लीः कश्मीर में धारा370 और 35ए की समाप्ति के बाद पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ दुनियाभर में घूम-घूमकर विषवमन कर रहा है. अरब देशों, अमेरिका और रूस से दो-टूक जवाब मिलने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री चीन की यात्रा पर हैं. इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान के बाद तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है, लेकिन पाकिस्तान की ध्वस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था को देख दुनिया सकते में है कि वह परमाणु ताकत होने की चेतावनी और धमकी कैसे दे सकता है.
दि वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अर्थव्यवस्था ही पाकिस्तान की रणनीति में सबसे बड़ी बाधा है. अखबार ने पाकिस्तान की युद्ध चेतावनी पर भी सवाल खड़े किए हैं. उसने लिखा है कि  धीमी अर्थव्यवस्था में क्या वास्तव में वह युद्ध छेड़ सकता है. दक्षिण एशियाई राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों पर परामर्श देने वाली फर्म विजियर कंसल्टिंग के अध्यक्ष आरिफ रफीक ने कहा कि कश्मीर पर भारत के साथ एक पूर्ण संघर्ष की लागत वहन करने की उसकी क्षमता भले ही विद्रोही यानी आतंकी नेटवर्क के जरिए हो, लेकिन उसके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं.
पाकिस्तान अगले सप्ताह अपना स्वतंत्रता दिवस मनाएगा. वह भी महसूस करता है कि अपने अस्तित्वगत हितों की रक्षा के लिए सीमित विकल्प हैं. उसकी अर्थव्यवस्था टूटने की कगार पर है और इसके अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी या तो कश्मीर पर चुप रहे हैं या भारत के समर्थन में हैं, जो उसके हितों के अनुरूप नहीं है.
अखबार ने अंदेशा जताया है कि एक पारंपरिक सैन्य प्रतिक्रिया शायद बहुत महंगी है. उसकी सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक आतंकवाद है जिसे पाकिस्तान ने परंपरागत रूप से पड़ोसी मुल्कों की परेशानी बढ़ाने के लिए आतंकवादी समूहों का उपयोग किया है. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के खतरे के बीच यह उसकी नीति का एक हिस्सा बन गया है. हालांकि, पाकिस्तान ने इस बात से इनकार किया है कि वह अपने विदेश नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आतंकवादी समूहों का उपयोग करता है.

पिछले साल, अपने वैश्विक अलगाव को समाप्त करने के प्रयास में अफगानिस्तान में  तालिबान के साथ जारी युद्ध को समाप्त करने में पाकिस्तान ने तालिबान नेतृत्व को शांति वार्ता के लिए मदद करने के लिए सहमति व्यक्त की. ऐसा करने के लिए पाकिस्तान ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ लाभ उठाने के अपने सबसे बड़े स्रोतों में से एक को नियुक्त किया. अखबार ने लिखा है कि वे वार्ताएं अब एक निष्कर्ष पर पहुंचने वाली हैं. अमेरिकी वार्ताकारों ने अपने तालिबान समकक्षों से आमने-सामने बैठने और जल्द ही एक समझौते पर पहुंचने का लक्ष्य रखा है. अफगानिस्तान में भारत के हित भी गहरे जुड़े हैं लेकिन इस वार्ता से पाकिस्तान के रणनीतिकारों ने भारत को बाहर रखा है जबकि चीन और रूस जैसे देश तालिबान के साथ वार्ता का हिस्सा हैं.

तालिबान ने कश्मीर से बनाई दूरी?

इमरान खान के जुलाई में अमेरिकी दौरे के वक्त पाकिस्तान ने मांग की है कि अमेरिका भारत द्वारा कश्मीर की स्वायत्तता को खत्म करने पर शांति वार्ता में अपना सहयोग समाप्त करे, लेकिन तालिबान ने गुरुवार को किसी भी मध्यस्थता के खिलाफ एक बड़ा बयान जारी किया. तालिबान के बयान में कहा गया है कि कुछ पक्षों द्वारा अफ़गानिस्तान के साथ कश्मीर के मुद्दे को जोड़ने से कुछ संकट में सुधार नहीं होगा, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा कश्मीर से संबंधित नहीं है और न ही अफ़गानिस्तान को अन्य देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के रंगमंच में बदलना चाहिए.

तालिबान के साथ शांति वार्ता और उसमें पाकिस्तान की भूमिका के नतीजों से संभवत: प्रभावित होगा कि क्या पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों के निरंतर समर्थन पर खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्लैकलिस्टेड करना सह सकता है. यह एक ऐसा कदम होगा जो उसकी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचा या तोड़ सकता है. आतंकवाद के वित्तपोषण पर नजर रखने वाला पेरिस स्थित समूह फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स अक्टूबर में मतदान करेगा कि क्या पाकिस्तान ने घर में आतंकवादी नेटवर्क पर नकेल कसने के लिए पर्याप्त काम किया है अथवा नहीं.
पाकिस्तान गुहार लगा रहा है कि उसे ग्रे सूची से हटा दिया जाना चाहिए, जिस पर पिछले साल से नजर रखी गई थी. पाकिस्तान को इस बात का भी डर है कि उसे ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों तक पहुंच से वंचित रखा जा सकता है, जब उसे दूर रहने के लिए कर्ज की सख्त जरूरत है. अगर पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट किया जाता है, तो इससे उसकी अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आ सकती है.
फरवरी में कतर की राजधानी दोहा में अमेरिकी राजनयिक, तालिबान के प्रतिनिधि और पाकिस्तान ने पिछले साल अफगानिस्तान में अपने युद्ध को समाप्त करने में मदद करने के लिए सहमति व्यक्त की थी.
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी नई कश्मीर नीति को त्यागने के लिए भारत को मजबूर करने के विकल्पों की कमी के बारे में चिंतित लग रहे हैं. पाकिस्तानी समा टीवी के रिपोर्टर एम्बर रहीम शम्सी के अनुसार गुरुवार को पाकिस्तानी पत्रकारों के साथ बातचीत में खान ने कश्मीर में भारत के खिलाफ “जिहादी संगठनों” के इस्तेमाल की बात को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, “फायदे की तुलना में अधिक नुकसान हैं,” अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों की आशंका भी इमरान खान के दिमाग में घर कर गई है. इमरान ने पत्रकारों के समूह से कहा, “पाकिस्तान ने अतीत से बाहर निकलने के लिए हर कदम उठाया है.”
उन्होंने कहा कि सरकार ने आतंकवादी समूहों के खिलाफ “पूर्ण रूप से सफाई अभियान” चलाया है. फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स का जिक्र करते हुए खान ने कहा, “मेरी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि पाकिस्तान को एफएटीएफ के प्रतिबंधों से बाहर निकालने का एक पूर्ण और ईमानदार प्रयास है.”

 

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