Modi Government 2.0, तीन तलाक फिर बना बड़ा मुद्दा, संसद में पीएम मोदी ने कांग्रेस को घेरा, जानिए क्या है पूरा मामला

तीन तलाक फिर बना बड़ा मुद्दा, संसद में पीएम मोदी ने कांग्रेस को घेरा, जानिए क्या है पूरा मामला

Modi Government 2.0, तीन तलाक फिर बना बड़ा मुद्दा, संसद में पीएम मोदी ने कांग्रेस को घेरा, जानिए क्या है पूरा मामला
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
मोदी सरकार 2.0 में आहूत पहले संसदीय सत्र में सबसे बड़ा मुद्दा तीन तलाक बिल बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बिल को पास कराने में कांग्रेस को भी साथ आने का आह्वान किया है. इसके साथ ही पीएम मोदी ने शाहबानो केस का याद दिलाकर मुस्लिम महिलाओं के हुए पक्षपात को लेकर कांग्रस को घेरा. पीएम मोदी ने कहा का कांग्रेस को ऐसे मौके मिले थे, जब वे तीन तलाक पर उचित कदम उठा सकती थी. शाहबानो केस में कांग्रेस ने गलती की. अब एक बार फिर से मौका है कि वह राष्ट्रय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से पटल पर लाए गए बिल का समर्थन करे.
प्रधानमंत्री मोदी ने शाहबानो केस का नाम लेकर कांग्रेस पर हमला तो किया लेकिन देश की युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसने शाहबानों केस का नाम तो सुना लेकिन इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. वह यह भी नहीं जानते कि शाहबानों कौन थीं और क्यों उनका मामला इस कदर चर्चित हुआ था कि पीएम मोदी को भी संसद के अंदर उनका नाम लेना पड़ा. ऐसे में नेशनल व्हील्स आपको इस पूरे मामले से वाकिफ करा रहा है-

कौन थीं शाहबानो बेगम, क्या था उनका केस?

मध्य प्रदेश के इंदौर के एक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाली शाहबानो 62 वर्षीय महिला थीं, जो उस वक्त पांच बच्चों की मां थीं. 1978 में शाहबानो के पति अहमद खान ने उन्हें तीन बार तलाक-तलाक कहकर रिश्ता खत्म कर लिया. तलाक के बाद शाहबानो अपने और बच्चों के गुज़ारे के लिए अपने पति से भत्ते की मांग की. इस मांग को लेकर वह अदालत की शरण में पहुंच गईं.
अदालत में मामला पहुंचने और उस पर जिरह होने के दौरान शाहबानो केस खूब चर्चित हुआ. हालात ऐसे हो गए कि ज़्यादातर मौकों पर इस केस की ही चर्चा होती रही, देश की राजनीति का हिस्सा भी यह केस बना लेकिन शाहबानो की ज़िंदगी एक तरह से अनछुई रह गई. आखिर शाह बानो कौन थीं? उनकी ज़िंदगी कैसी थी और उनके पति ने उन्हें तलाक क्यों दिया था? इन तमाम बातों पर एक परदा ही पड़ा रह गया. कम ही लोग शाहबानो की ज़िंदगी के बारे में पूरा तथ्य जान पाए.

सौतन की वजह से हुआ था शाहबानो का तलाक!

शाहबानो के पति अहमद ने दूसरी शादी कर ली थी, जो इस्लाम के कायदों के तहत जायज़ भी था. अहमद नामी वकील थे जो विदेश से वकालत पढ़कर भारत लौटे थे और सुप्रीम कोर्ट तक में वकालत के लिए जाते थे. बताते हैं कि अहमद की दूसरी पत्नी यानि शाहबानों की शौतन उनसे 14 साल छोटी थी. एक ही छत के नीचे दो बीवियों के रहने के कारण उनमें स्वाभाविक कटुता भी बढ़ी.
शाहबानो और उनकी सौतन के बीच खटपट होने लगी. आए दिन के झगड़े होने लगे. कुछ वर्षों के बाद अहमद ने अपनी पहली बीवी यानी शाहबानो को तलाक दे दिया था. एक सादा जीवन जीने वाली एक घरेलू के लिए यह बड़ा झटका था. साथ ही गुजारा भत्ता के लिए अपने पति के खिलाफ कोर्ट में जाना भी मुस्लिम समुदाय के लिए एक बड़ी घटना थी. चूंकि अहमद खुद बड़े वकील थे. इसलिए भी उनके खिलाफ कोर्ट में मुकदमा लड़ना शाहबानो के लिए आसान नहीं रहा होगा.

शाहबानो ने गुज़ारे के लिए ली थी कोर्ट की शरण

तलाक के कुछ ही दिनों तक अहमद ने शाहबानो के गुज़ारे का इंतज़ाम किया और उसके बाद उसने हाथ खींच लिये थे. अपने बच्चों के साथ अकेली और मजबूरी की हालत में आ गई शाहबानो के पास जब कोई चारा न बचा, तो उसने अदालत की शरण ली. शाहबानों ने पति से गुज़ारा भत्ता की मांग करने का केस दायर किया. इसके आगे जो हुआ वह भारतीय राजनीति में इतिहास बन गया है.
एक औरत का कोर्ट में चले जाना, धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर महिलाओं के लिए समान हक मांगना, कभी अपने वकील के ज़रिए अदालत में कुरआन की आयतों की दुहाई देना… ये सब वो बातें थीं, जिनसे कोर्ट ने तो फैसला शाहबानो के हक में दिया. कोर्ट का फैसला भी शाहबानों की किस्मत को नहीं बदल सका. मुस्लिम समाज को ये सब नागवार गुज़रा. धीरे धीरे ये केस राजनीति के केंद्र में आ गया. मुस्लिम समाज के बड़े-छोटे नेताओं ने धर्म में हस्तक्षेप बताते हुए कोर्ट के फैसले का विरोध शुरू कर दिया.

कोर्ट के फैसले को राजीव सरकार ने पलट दिया था

सात सालों की कठिन कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद भी शाहबानो के लिए जीवन आसान नहीं था. मुस्लिम समाज का विरोध इस कदर बढ़ा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद के जरिए एक कानून मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पास करवा दिया. इस कानून के चलते राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया गया. यही वह वक्त था जबसे खुले तौर पर देश में मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरूआत हुई.
राजीव गांधी पर मुस्लिम समुदाय के दबाव में आकर ऐसा कदम उठाने के आरोप लगे और हिंदू समुदाय उनसे नाराज़ हुआ. उसे मनाने के लिए हिंदू समुदाय के तुष्टिकरण के लिए राजीव गांधी सरकार ने ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पर लगे ताले को खुलवाने के लिए कदम उठाए. राजीव गांधी सरकार के ये दोनों ऐसे कदम थे जिनका असर वर्तमान राजनीति में भी दिख रहा है.

चर्चा में रहा केस लेकिन शाहबानो हाशिए पर

शाहबानो केस पर जमकर हुई राजनीतिक और धार्मिक रस्साकशी के बीच केस तो सुर्खियों में बना रहा, लेकिन शाहबानो की ज़िंदगी की चर्चा हाशिए पर चली गई. मुस्लिम महिला अधिकारों का प्रतीक बन चुका शाहबानो केस विडंबना साबित हुआ क्योंकि शाहबानो लंबी कानूनी लड़ाई जीतने के राजनीतिक दांवपेच में बावजूद हार गई थी.

ब्रेन हैमरेज से हुई थी शाह बानो की मौत

शाहबानो की बेटी सिद्दिका बेगम के हवाले से छपी कहानी के अनुसार 60 साल की उम्र में पति से तलाक मिलने के बाद शाह बानो को गहरा सदमा लगा था. कोर्ट केस और उनके खिलाफ मुस्लिम समाज की नाराज़गी की वजह से भी उनकी सेहत पर काफी बुरा असर पड़ा था. उनकी सेहत लगातार खराब रहने लगी थी. इसके बावजूद उन्होंने हौसले के साथ कानूनी लड़ाई लड़ी और जीती, लेकिन राजनीतिक मुद्दा बनकर लड़ाई हार जाने से शाहबानो का स्वास्थ्य लगातार खराब होता चला गया और 1992 में ब्रेन हैमरेज के कारण उनकी मौत हो गई.
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1 Comment

  • Nagendra , June 27, 2019 @ 12:15 am

    Such a sad story of Sahbano I did not know.

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