Nationalwheels

नई शिक्षा नीति में चार साल का बीएड करने वालों को मिलेगी रोजगार की गारंटी?

नई शिक्षा नीति में चार साल का बीएड करने वालों को मिलेगी रोजगार की गारंटी?
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
केंद्र सरकार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करा चुकी है. नई शिक्षा नीति में माध्यमिक कॉलेजों में पढ़ाने से जुड़ी डिग्री बीएड को चार साल का का करने का प्रस्ताव है. हालांकि, बीएड को रोजगार की गारंटी की से भी जोड़ने की चर्चा है. नेशनल इनीशिएटिव फॉर स्कूल हैंड्स एंड टीचर्स होलिस्टिक एडवांसमेंट (एनआईएसएचटीएचए) यानि निष्ठा कार्यक्रम के जरिए स्कूल प्रमुखों और अध्यापकों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय पहल की शुरुआत हुई है.
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अपर महानिदेशक (मीडिया एवं संचार) नानू भसीन का कहना है कि इसका उद्देश्य प्राथमिक स्कूल के लाख अध्यापकों, प्रधानाध्यापकों, बीआरसी समन्वयक और क्लस्टर संसाधन केंद्र समन्वयकों की क्षमता सृजित करना है. विद्यार्थियों में वस्तुनिष्ठ विश्लेषण, मूल्यांकन और निर्णय की क्षमता का विकास करने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा. शिक्षकों के कौशल में सीखने के नतीजों, सक्षमता आधारित अधिगम व परीक्षण, छात्र केंद्रित शिक्षाशास्त्र के साथ सूचना एवं संचार टेक्नॉलाजी के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाएगा. यही नहीं प्रतिभाशाली विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों के अध्यापन में आगे आएं, इसके लिए नई शिक्षा नीति में चार साल के इंटीग्रेटेड बीएड पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करने पर रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी भी दी जाएगी.
भसीन कहते हैं कि उत्कृष्ट अध्यापकों को ग्रामीण इलाकों में तैनाती के लिए प्रोत्साहन देने की भी योजना है. ऐसे अध्यापकों को उन ग्रामीण क्षेत्र में आवास प्रोत्साहन भी दिया जा सकता है जहां अध्यापकों की भारी कमी है. हालांकि, प्रयास पहले भी हुए हैं लेकिन स्कूलों में तैनात शिक्षक निष्ठा कार्यक्रम में प्रस्तावित आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, स्वास्थ्य और आरोग्य, पारिस्थितिकी क्लब, किचेन गार्डन, युवा क्लब, पर्यावरण सरोकारों जैसे कार्यक्रम कितना सीख पाएंगे और बच्चों उसमें कितना ज्ञान देंगे, यह देखने वाला मुद्दा होगा. वजह, प्रेरणा ऐप और मानव संपदा ऐप को ही शिक्षक भारी मुसीबत मान रहे हैं. उत्तर प्रदेश में शिक्षक संगठन बेसिक शिक्षा मंत्री के सामने इन ऐप आधारित निगरानी प्रणाली का विरोध कर चुके हैं. इससे यह भी साफ है कि शिक्षा की गुणवत्ता के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करने से पहले उन्हें ही जागरूक करने की जरूरत है. साथ ही प्रधानाध्यापकों को जिम्मेदारियों के साथ अधिकारों से भी लैस करने की जरूरत है.
मसौदा- राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2019 में कहा गया है कि `यह सुनिश्चित किया जाए कि स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों पर तमाम छात्र-छात्राओं को उत्साही, प्रेरित, उच्च शिक्षित, पेशेवर रूप से प्रशिक्षित और अन्य बेहतर खूबियों वाले शिक्षक पढ़ाएं.`

तथ्य यह भी हैं

  • सन 1951 में देश में पहली से 12वीं कक्षा तक 230700 स्कूल थे जो 2019 तक बढ़कर 15 लाख हो गए हैं. 72 वर्षों में 7 गुना बढ़ोत्तरी हुई. ज्यादातर विद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों में खुले.
  • सन 2016-17 में बच्चों के ग्रोस एनरोलमेंट रेशो प्राइमरी में 95 फीसदी, मिडिल में 90.7 फीसदी, सेकेंडरी में 79.3 फीसदी और हायर सेकेंड्री में 51.5 फीसदी हैं.
  • इन विद्यालयों में वर्तमान में 25 करोड़ बच्चे प्राथमिक, मिडिल व सेकेंडरी स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. यह 1951 की तुलना में 10 गुना ज्यादा है. सन 1951 में 2.40 करोड़ बच्चे ही पढ़ते थे.
  • सन 1951 में प्राइमरी स्तर पर 83.85 फीसदी, मिडिल में 51.6 फीसदी और सेकेंडरी स्तर पर 73.33 फीसदी बच्चे स्कूल छोड़ देते थे. वर्तमान में यह क्रमशः 4.13 फीसदी, 4.03 फीसदी और 17.06 फीसदी रह गया है.

शिक्षकों से जुड़े मुद्दे

  • शिक्षकों की भर्ती की मौजूदा प्रणाली में इंटरव्यू या कक्षा में डेमो का प्रावधान नहीं है, जिससे शिक्षक की प्रेरणा का मूल्यांकन हो सके.
  • शिक्षकों की गुणवत्ता का स्तर काफी कमजोर है. शिक्षकों के करीब 17 हजार निजी संस्थान हैं जिनमें से 92 फीसदी निजी हैं. आरोप है कि ज्यादातर निजी संस्थान लाभ के आगे शिक्षकों के प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर जोर नहीं दे रहे हैं.
  • सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 10 लाख से ज्यादा खाली पद हैं. इसके कारण कुछ हिस्सों में छात्र शिक्षक अनुपात 60:1 से भी ज्यादा है. विषयों के शिक्षकों की अनुपलब्धता भी है. हिन्दी के अध्यापक गणित और अंग्रेजी पढ़ा रहे हैं.
  • 20 लाख विद्यालय एकल शिक्षक के सहारे चल रहे हैं. इनमें से ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालय हैं जहां शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के बजाए दोपहर के भोजन और अन्य व्यवस्थाओं में ही सिमटे रह जाते हैं, जबकि यहां बच्चों की संख्या ज्यादा रहती है.
  • शिक्षकों को मध्यान्ह भोजन प्रबंधन, प्रशासनिक कार्य, डाटा प्रबंधन का कार्य भी करना पड़ता है. शिक्षकों का काफी समय में इसमें जाया होता है. जनगणना, स्वस्छता, चुनाव और पल्स पोलियो अभियान जैसी ड्यूटी भी आम है. जबकि शिक्षा का अधिकार कानून के तहत गैर शिक्षण गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं है.
  • वेतन, पदोन्नति, अवकाश स्वीकृति, स्थानांतरण, चिकित्सा सुविधाएं भी शिक्षक समस्याओं में हैं.

 


Nationalwheels India News YouTube channel is now active. Please subscribe here

(आप हमें फेसबुकट्विटर, इंस्टाग्राम और लिंकडिन पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *