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“ये पाकिस्तानी गालों पर दिल्ली के चाटें होते, जीना सीखो अपने ही भुजदंडों पर!”, सीमा पर लगी ई-बाड़

“ये पाकिस्तानी गालों पर दिल्ली के चाटें होते, जीना सीखो अपने ही भुजदंडों पर!”, सीमा पर लगी ई-बाड़
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
“ये पाकिस्तानी गालों पर दिल्ली के चाटें होते,
गर हमने दो के बदले बीस शीश काटे होते!
दिल्ली वालों ठोकर मारो दुनिया के हथकण्डों पर,
इजराइल से जीना सीखो अपने ही भुजदंडों पर!”
हरिओम पंवार की यह पंक्तियां वर्ष 2008 में मुंबई के अंदर हुए 26/11 आतंकी हमले के बाद उपजी थीं। पुलवामा की तरह तब भी देश में आतंक को लेकर भारी गुस्सा था। तब देश के किसी कोने में बैठे एक कवि के मन में भी वही पीड़ा और क्रोध की ज्वाला धधक रही थी। ऐसा कहा जाता है कि मुंबई हमले के वक्त ही यदि आतंकियों और उनके शरणदाताओं के खिलाफ बालाकोट जैसा मुँहतोड़ जवाब दिया गया होता तो पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसे आतंकी हमले शायद न होते।
जानकार बताते हैं कि उस वक्त भी हमारी सेना ने इसका जवाब देने के लिए तैयारी की थी। 26/11 के हमले के बाद तत्कालीन वायु सेना प्रमुख ने भारत सरकार को आतंकियों से बदला लेने का एक रोडमैप बताया था। इसके बाद भी तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने वायु सेना को इसकी इजाजत नहीं दी। संभवतः इसके पीछे गठबंधन सरकार की मजबूरी रही होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने जवाब दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कूटनीतिक जंग भी छेड़ी कि बालाकोट की चोट सहलाने के लिए पाकिस्तान के मित्र राष्ट्रों ने भी उसके पक्ष में एक शब्द कहना मुनासिब नहीं समझा। यह भारतीय राजनय का स्वर्णिम काल भी कह सकते हैं। यही नहीं, इस कार्रवाई ने दशकों से आतंकवाद के विरुद्ध चल रही हमारी लड़ाई के रूख में परिवर्तन भी साफ दिखता है लेकिन यह कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है। आतंकी और उनके समर्थक घुसपैठियों के भेष में भारतीय सरजमीं पर कदम न रख सकें, सरकार ने इसके भी इंतजाम व्यापक पैमाने पर शुरू कर दिया है। सीमा पर मादक पदार्थों और उनकी आड़ में अवैध हथियारों और विस्फोटकों का जखीरा लेकर भारतीय सीमा में घुसने वाले घुसपैठियों पर रोक लगाने के लिए  काम शुरू हो चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि असम में भारत-बांग्लादेश सीमा के नदी के किनारे से होने वाली अवैध घुसपैठ और हथियारों की तस्करी की जांच के लिए इलेक्ट्रॉनिक निगरानी में रखा जाएगा। पिछले दिनों गृह मंत्री ने इसका उद्घाटन भी किया था। नव आतंक और कट्टरता की खेप लेकर घुसने वाले रोहिंग्याओं की घुसपैठ पर भी लगाम लग सकेगी।
ऐसे की जाएगी ‘इलेक्ट्रॉनिक’ निगरानी
इलेक्ट्रॉनिक निगरानी हेतु “स्मार्ट फेंसिंग” का संचालन असम के धुबरी जिले में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के 61 किलोमीटर के नदी वाले इलाके में किया जाएगा, जहाँ से ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यह क्षेत्र में भारत-बांग्लादेश सीमा को कवर करेगा, जिसमें ‘चार’ (रेत के द्वीप) और असंख्य नदियों का चैनल शामिल हैं, जो सीमा पर निगरानी को एक चुनौतीपूर्ण कार्य बनाता है। खासकर बारिश के मौसम के दौरान। इस समस्या को दूर करने के लिए, गृह मंत्रालय ने 2017 में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के कर्मियों की भौतिक उपस्थिति के अलावा एक तकनीकी समाधान को नियुक्त करने का निर्णय लिया था। इसके लिए कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS) के तहत प्रोजेक्ट बोल्ड-क्यूआईटी (बॉर्डर इलेक्ट्रॉनिकली डोमिनेटेड क्यूआरटी इंटरसेप्शन तकनीक) का इस्तेमाल किया जाएगा।
ऐसे शुरू हुई पूरी कार्यवाही
जनवरी 2018 में बीएसएफ की सूचना और प्रौद्योगिकी विंग ने बोल्ड-क्यूआईटी को प्रोजेक्ट किया और इसे विभिन्न निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं के तकनीकी समर्थन के साथ रिकॉर्ड समय में पूरा किया। BOLD-QIT, CIBMS के तहत तकनीकी प्रणाली एक ऐसी परियोजना है, जो BSF को ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के अनियंत्रित नदी क्षेत्र में भारत-बांग्लादेश सीमा से लैस करने में सक्षम बनाती है। गृह मंत्रालय ने कहा है कि अब ब्रह्मपुत्र की पूरी अवधि को माइक्रोवेव संचार, ओएफसी केबल्स, डीएमआर कम्युनिकेशन, डे और नाइट सर्विलांस कैमरों और घुसपैठ का पता लगाने वाले सिस्टम से तैयार किया गया है। ये आधुनिक गैजेट सीमा के साथ बीएसएफ नियंत्रण कक्ष को ‘फीड’ प्रदान करते हैं और अर्धसैनिक बल की त्वरित प्रतिक्रिया टीमों को अवैध सीमा पार करने और अपराधों की किसी भी संभावना को विफल करने में सक्षम बनाते हैं।
सरकार की योजनाओं का प्रचार करने वाली इंडिया रिपोर्ट कार्ड वेबसाइट के अनुसार गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने जानकारी दी है कि “धुबरी में भारत-बांग्लादेश सीमा के नदी के किनारे को अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है जहां अवैध प्रवासियों की आवाजाही, हथियारों, गोला-बारूद और अन्य सामानों की तस्करी बहुत आम बात है। स्मार्ट फेंसिंग लगाने से समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।” बीएसएफ, बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। मंत्रालय ने कहा है कि भौगोलिक बाधाओं के कारण पूरी सीमा पर फेंसिंग लगाना संभव नहीं है। इस परियोजना के कार्यान्वयन से न केवल बीएसएफ को सभी प्रकार के सीमा पार अपराधों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी, बल्कि चौबीसों घंटे मानव निगरानी से सैनिकों को राहत भी मिलेगी।
जम्मू-कश्मीर में किया जा चुका है पायलट प्रोजेक्ट
सितंबर 2018 में जम्मू में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के साथ पांच किलोमीटर की दो स्मार्ट फेंसिंग पायलट परियोजनाएं शुरू की गईं थी। यह काफी कामयाब बताई जा रही है, जिसके चलते देश के सैनिकों को न सिर्फ राहत मिली, बल्कि उस हिस्से में खतरे की संभावना भी थोड़ी कम हुई।
घुसपैठियों से परेशान है भारत 
आपको बता दें कि बंग्लादेश की सीमा से होने वाली अवैध घुसपैठ के कारण हमारे देश के विभिन्न राज्य जैसे असम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, बिहार आदि बहुत प्रभावित हुए हैं जिसे लेकर केंद्र सरकार बहुत गंभीर है। अवैध घुसपैठ ने कानून व्यवस्था के साथ सीधे तौर पर इन राज्यों के जनघनत्व को भी बहुत प्रभावित किया है। लाखों रोहिंग्या मुसलमानों की अवैध घुसपैठ और आतंकियों की उनके बीच आसानी से बनने वाली पकड़ से सुरक्षा एजेंसियां परेशान हैं। गृह मंत्रालय जम्मू-कश्मीर और असम-बांग्लादेश सीमा पर लगाए गए इलेक्ट्रानिक निगरानी प्रणाली के प्रभाव के अध्ययन के आधार पर उन सभी हिस्सों में इसे लगाने की रणनीति बना रही है जहां सुरक्षा कर्मियों के लिए मुसीबतें पैदा होती हैं।

 

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