कम्युनिस्ट सरकार की आंख में खटक रही 1950 की भारत-नेपाल संधि, समीक्षा संभव

आशंका है कि किसी तीसरे देश के इशारे पर समीक्षा हुई तो भारत और नेपाल के बीच दशकों पुराने रिश्ते पर लग सकता है ग्रहण
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स       

विजय बहादुर सिंह

काठमांडूः नेपाल की नई कम्युनिस्ट सरकार भारत और नेपाल के बीच 1950 में की गई संधि की नए सिरे से समीक्षा कर सकती है। इसमें वे समझौते भी शामिल हैं जिसके तहत दोनों देशों के बीच कई परियोजनाएं विचाराधीन और निर्माणाधीन हैं। कम्युनिस्ट सरकार की भारत के प्रति यह कोई नया नजरिया नही है। एमाले नेता स्व मनमोहन अधिकारी जब 1994 में नेपाली कांग्रेस के एक गुट के समर्थन से पीएम बने थे तब भी इसकी चर्चा शुरू हुई थी। उस समय के उप प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल अपनी भारत यात्रा के दौरान 1950 की बेहद अहम समझौते को पुराना बताते हुए इसकी समीक्षा की मांग की थी। बताते हैं कि भारत ने उनकी इस मांग को स्वीकार भी कर लिया था लेकिन नौ माह बाद स्व अधिकारी की सरकार गिर गई। लिहाजा यह मांग ठंडे बस्ते में चली गई। अभी हाल ही नेपाल ने भारत के सारे बड़े नोट नेपाल क्षेत्र में प्रतिबंधित कर भारत से पुराने रिश्तों की समीक्षा का संकेत दिया है।
अब केपी शर्मा ओली की पूर्ण बहुमत की कम्युनिस्ट सरकार में यह मांग फिर उठने लगी है। बताते हैं कि भारत इसके लिए तैयार है और नेपाल को 1950 के मैत्री संधि की समीक्षा को हरी झंडी दे दी है। चर्चा तेज है कि नेपाल सरकार इस ओर कभी भी कदम बढ़ा सकती है। पिछले महीने पाकिस्तान के पीएम के नेपाल दौरे के बाद भारत- नेपाल मैत्री समझौते की समीक्षा की बात जोर शोर से उठी थी। 26 साल बाद आए पाक पीएम के स्वागत में नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार ने जिस तरह पलक पांवड़े बिछा रखा था,उसे देख ऐसा लगा कि नेपाल चीन की तरह ही पाक से भी नजदीकियां बढ़ाने को आतुर है।
कहने को तो नेपाल अपने पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत को तरजीह देने की बात करता है लेकिन अंदर से वह चीन और पाक के करीब जा चुका है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत और नेपाल के बीच पुराने संधि पर नए सिरे से समीक्षा हुई तो नई संधि में पाकिस्तान और चीन की भूमिका अहम हो सकती है। ऐसे में खुली सीमा से बेरोक टोक आवाजाही और व्यापार के तौर तरीकों में बदलाव मुमकिन है। ऐसा हुआ तो दोनों देशों के बीच सदियों पुराने समाजिक सांस्कृतिक रिश्ते पर भी ग्रहण लगना तय है।
ज्ञात रहे कि भारत-नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दोनोे देशों के बीच आर्थिक,सांस्कृतिक संबंध बहुत पुराना है। पड़ोसी राष्टों में भारत के सबसे अधिक घनिष्ट आर्थिक संबंध नेपाल से ही रहे हैं। नेपाल के चौमुखी विकास में भी भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और है भी। मुक्त तथा व्यापाक व्यापार सुविधाओं के कारण ही नेपाल को भारत से आर्थिक लाभ भी मिलता रहा है।
भारत-नेपाल व्यापार और पारागमन संधि के अनुसार नेपाल अपनी आवश्यकताओं के अनुसार जरूरत और रोजमर्रा की वस्तुएं भारत से आयात करता है। भारत में भले ही इन वस्तुओं का अभाव हो लेकिन भारत इसे नेपाल को उपलब्ध कराता रहा है। संधि के तहत ही भारत नेपाल सीमा के 1750 किमी लंबे मार्ग पर 15 स्थानों से नेपाल को सामानों को लाने ले जाने की सुविधा प्राप्त है। यही नही 1950 की संधि के तहत नेपाली नागरिकों को भारत में उच्च सेवा को छोड़कर शेष नौकरी हासिल करने की सुविधा भी प्राप्त है। सेना में तो गोरखा रेजीमेंट की अलग ही पहचान है। नेपाली नागरिकों को भारत में संपत्ति खरीदने, बैंको में धन जमा करने तथा नेपाली मुद्रा को भारत में बेरोक टोक भुनाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
नेपाल 1950 की इस सुविधाजनक संधि को बहुत पुराना कहकर इसकी समीक्षा जब चाहे कर सकता है लेकिन किसी तीसरे देश के बहकावे में आकर दोनों देशों के बीच की पुरानी संधि की समीक्षा हुई तो नुकशान नेपाल का ही होगा। भारत नेपाल की जितनी जरूरते पूरी कर सकता है, अन्य देश किसी भी सूरत मे नहीं कर सकते। चर्चा यह भी है कि नेपाल को उकसाने में दूसरे पड़ोसी देश चीन का भी अहम रोल है। चीन भारत को घेरने के लिए लगातार नेपाल में रेलवे, सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क क्षेत्र में भी निवेश की राशि को बढ़ावा दे रहा है। चीन ने हिमालय का सीना चीरकर भारत की सीमा के निकट तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना बना चुका है। पिछले वर्ष ही चीन ने नेपाल को तीन पोर्ट से माल परिवहन की सुविधा भी दी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नेपाल की इस सोच के पीछे चीन की भूमिका भारत-नेपाल के रिश्तों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

 

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