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अयोध्या रामजन्मभूमि मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को करेगा सुनवाई, पैनल सौंप सकता है रिपोर्ट

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
अयोध्या रामजन्मभूमि मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ सुबह 10.30 बजे सुनवाई शुरू करेगी. पीठ ने 8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एफएम कलीफुल्ला, धर्मगुरु श्रीश्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचु को मध्यस्थ नियुक्त किया था. कोर्ट ने पैनल से सभी पक्षों से बात कर मसले का सर्वमान्य हल निकालने की कोशिश करने को कहा था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पैनल 4 हफ्ते में मध्यस्थता के जरिए विवाद निपटाने की प्रक्रिया शुरू करने के साथ 8 हफ्ते में यह प्रक्रिया खत्म कर ले. चीफ जस्टिस ने कहा था कि मध्यस्थता प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में होगी और इसे गोपनीय रखा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जरूरत पड़े तो मध्यस्थ और लोगों को पैनल में शामिल कर सकते हैं. वे कानूनी सहायता भी ले सकते हैं.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्मभूमि न्यास समिति के विरोध को दरकिनार करते हुए यह भी कहा था कि अगर 1 फीसदी भी समझौता और मध्यस्थता का चांस है तो प्रयास होना चाहिए. जस्टिस बोबड़े ने कहा था कि मध्यस्थता की प्रकिया गोपनीय रहेगी और ये भूमि विवाद की सुनवाई के साथ साथ चलेगी. हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों का कहना था कि पहले भी अदालत की पहल पर इस तरह से विवाद को सुलझाने की कोशिश नाकामयाब हो चुकी है.
मुस्लिम पक्षकारो की ओर से वकील राजीव धवन ने कहा था कि मध्यस्थता को एक चांस दिया जा सकता है, परंतु हिन्दू पक्ष को ये साफ होना चाहिए कि कैसे आगे बढ़ा जाएगा. जस्टिस बोबड़े ने कहा था कि हम एक प्रॉपर्टी विवाद को निश्चित तौर पर सुलझा सकते है, परंतु हम रिश्तों को बेहतर करने पर विचार कर रहे है. सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को दस्तावेजों का अनुवाद देखने के लिए 6 हफ्ते दिया था और कहा था कि हमारे विचार में 8 हफ्ते के वक्त का इस्तेमाल पक्ष मध्यस्थता के ज़रिए मसला सुलझाने के लिए भी कर सकते हैं.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्षों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा था. कोर्ट ने 1994 के इस्माइल फारुकी के फैसले में पुनर्विचार के लिए मामले को संविधान पीठ भेजने से इंकार कर दिया था. मुस्लिम पक्षों ने नमाज के लिए मस्जिद को इस्लाम का जरूरी हिस्सा न बताने वाले इस्माइल फारुकी के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी. गौरतलब है कि राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर  1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था. इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला था.
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