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यूपी में सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस से करेगा फ्रेंडली फाइट, ताकि चुनाव बाद भी बनी रहें उम्मीदें

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स       
बसपा और सपा लोकसभा चुनावों और अगले विधानसभा चुनावों के लिए भी गठबंधन का ऐलान कर दिया है. सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में बसपा प्रमुख मायावती ने कांग्रेस को लेकर एक-एक शब्द सोच-समझकर बोला. इसके साथ ही उन्होंने भविष्य की रणनीति भी साफ कर दी. गठबंधन ने साफ किया कि वह कांग्रेस के साथ मिलकर नहीं लड़ेंगे क्योंकि कांग्रेस के वोट सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी को ट्रांसफर नहीं होते हैं, इसके बजाय वह दूसरी पार्टियों में चले जाते हैं. परंतु, गठबंधन अमेठी और रायबरेली की दो सीटों पर कांग्रेस परिवार के खिलाफ प्रत्याशी इसिलए नहीं उतारेगा जिससे कि भाजपा के सामने राहुल गांधी या सोनिया गांधी को हार का सामना न करना पड़े.

सपा और बसपा की इस रणनीति ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस से घोषित रूप से गठबंधन भले नहीं हुआ है लेकिन अंदरूनी तौर पर यह सेफ पैसेज छोड़ा गया है जिससे लोकसभा चुनाव के बाद यदि सरकार बनने की स्थिति बनती है तो सपा-बसपा कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बना सकें. मायावती ने साफ कहा भी कि अमेठी और रायबरेली में प्रत्याशी इसलिए नहीं उतारे जाएंगे, जिससे भाजपा उन्हें अमेठी में घेर न सके.

भाजपा को अधिकतम नुकसान पहुंचाने की रणनीति

गठबंधन की रणनीति से यह भी साफ है कि माया-अखिलेश की जोड़ी भाजपा को अधिकतम नुकसान पहुंचाने की योजना बना चुके हैं. इस रणनीति में परदे के पीछे से कांग्रेस की बड़ी भूमिका है. कांग्रेस नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में उसकी भूमिका सीमित है. ऐसे में बाहरी तौर पर वह यह दिखाना चाहती है कि चुनाव अलग होंगे लेकिन अंदरूनी तौर पर कांग्रेस ऐसे प्रत्याशियों को लड़ाने पर जोर देगी जो भाजपा के अधिकतम वोटों का नुकसान पहुंचा सकें. कांग्रेस भाजपा को जितनी क्षति पहुंचाएगी, सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशियों की जीत की संभावनाएं उतनी ही रफ्तार से बढ़ती जाएंगी.

कांग्रेस खेलेगी ब्राह्मण कार्ड

राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस के प्रत्याशियों में ब्राह्मण उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा हो तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. राजनीतिज्ञों को यह बात अच्छी तरह पता है कि पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के अंदर भाजपा के प्रति अकुलाहट रही है. सोशल मीडिया पर ब्राह्मण नेताओं और उनके प्रतिनिधियों की टिप्पणिय़ों से भी यह दिखता रहा है. भाजपा से जुड़े कई नेता भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी प्रकट करते रहे हैं. ब्राह्मण विचारकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश या केंद्र की सरकारों में महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक पदों से उन्हें दूर रखा गया है. सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस नेतृत्व इसी मौके का फायदा उठाने की कोशिशों में है. हालांकि, मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देकर यह नाराजगी दूर करने की कोशिश की है लेकिन माना जा रहा है कि कांग्रेस ब्राह्मण कार्ड खेलकर भाजपा को अधिकतम सीटों पर नुकसान पहुंचाने की रणनीति बना रही है. वर्तमान में जिन नेताओं के नामों को लेकर चर्चा है उसमें भी इसी जाति के ज्यादातर हैं.

 

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