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‘सौतिया डाह’ का परिणाम है #सोनभद्र जनसंहार, स्पेशल रिपोर्ट में जानें पूरी कहानी

‘सौतिया डाह’ का परिणाम है #सोनभद्र जनसंहार, स्पेशल रिपोर्ट में जानें पूरी कहानी
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

O खोजी रिपोर्टः विजय विनीत

सोनभद्रः क्रोध, नफरत और इंतकाम का दूसरा नाम है सौतिया डाह। अब इसे उभ्भा जनसंहार कांड भी कह सकते हैं। जाहिर है कि सौतिया डाह हमेशा खतरनाक होती है और जान भी लेती है। उभ्भा नरसंहार के नेपथ्य में भी है सौतिया डाह की कहानी। यह लोमहर्षक कांड भले भी दबंग प्रधान यज्ञदत्त भूरिया ने रचा, लेकिन पटकथा तो सालों से धधकती डाह के चलते लिखी गई। इसी डाह के चलते इस कांड के दोनों प्रमुख किरदार अब मुल्जिम हैं। इनमें एक हैं आशा मिश्र (पत्नी- प्रभात कुमार मिश्र, आईएएस अधिकारी) और दूसरी उनकी बेटी विनीता शर्मा उर्फ किरण कुमारी। विनीता के पति भानु प्रताप शर्मा (आईएएस), मौजूदा समय में दिल्ली में आल इंडिया बैंकिंग ब्यूरो के चेयरमैन हैं।
उभ्भा नरसंहार कांड की कहानी की एक अहम कड़ी हैं बिहार के दबंग कांग्रेसी नेता माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिन्हा। ये राज्यसभा के मेंबर भी थे। बता दें कि इनके भाई सीपीएन सिंह साल 1980 में यूपी के राज्यपाल बने थे। शासन की जांच रिपोर्ट की मानें तो माहेश्वरी प्रसाद ने ही अभिलेखों में हेराफेरी कर फर्जी तरीके से आदर्श सहकारी कृषि समिति बनाई। इनकी दो बीवियां थीं। पहली पत्नी का नाम सीता और दूसरी का पार्वती था। दोनों के सौतिया डाह का प्रभाव इनके बच्चों पर भी पड़ा। सीता के दो बेटे थे। लोग इन्हें सोहन बाबू और मोहन बाबू पुकारते थे। पार्वती की इकलौती संतान हैं आशा मिश्रा। इनकी शादी आईएएस अफसर रहे प्रभात कुमार मिश्रा से हुई।
आशा, माहेश्वरी प्रसाद की दूसरी बीवी की बेटी थीं, इसलिए अहमियत अधिक थी। शायद आशा मिश्रा के कलेजे में कई दशकों तक अपनी मां के सौतिया डाह की आग धधक रही थी। आरोप है कि वो आज भी अपने सौतेले भाइयों से डाह रखती हैं। पिता माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिन्हा के निधन के बाद वो फर्जी आदर्श कृषि को-आपरेटिव सोसायटी की सर्वेसर्वा बन गईं। अपनी बेटी विनीता शर्मा को भी सोसाइटी का प्रबंधक बना दिया। सोसायटी के गठन के समय से सौतन सीता के पुत्र सोहन बाबू और मोहन बाबू संस्था के सदस्य थे। इनके अधिकारों का हनन करते हुए आशा और विनीता ने अपने सौतेले भाइयों को समिति से बेदखल कर दिया।
उभ्भा गांव के आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे दिलेर अधिवक्ता नित्यानंद द्विवेदी बताते हैं कि माहेश्वरी की पहली पत्नी सीता के पोते प्रकाश नारायण सिन्हा उस समय बेहद कुपित हुए जब आदर्श सोसाइटी से उनका हक छीना गया। उन दिनों प्रकाश, पटना मेडिकल कालेज से डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे। वो अपनी सौतेली दादी मां के रवैये से बेहद व्यथित थे। उन्होंने अपने दादा माहेश्वरी प्रसाद नारायण की संपत्ति के बंटवारे के लिए मुजफ्फरपुर जिला कोर्ट में परिवाद दाखिल कर दिया। परिवाद में उन्होंने उल्लेख किया कि दादा की सम्पत्ति में उन्हें बराबर हिस्सा दिया जाए। इसमें आदर्श कृषि को-आपरेटिव सोसायटी के नाम दर्ज 663 बीघा जमीन भी थी। मुजफ्फरपुर जिला कोर्ट ने फैसला दिया कि माहेश्वरी प्रसाद की हर सम्पत्ति बराबर-बराबर बंटेगी। सोसाइटी की जमीन में भी दोनों का एक समान हिस्सा होगा।
अधिवक्ता द्विवेदी बताते हैं कि सेशन कोर्ट के आदेश के खिलाफ आशा मिश्रा और विनीता शर्मा पटना हाईकोर्ट चली गईं। साक्ष्य के आधार पर हाईकोर्ट ने उनके वाद को सुना और सेशन कोर्ट के आदेश को सही मानते हुए फैसले को बरकरार रखा। बाद में आशा मिश्रा ने अपनी मां की सौत के परिजनों के खिलाफ एक और रिट दायर कर दी, जो अभी विचाराधीन है।
आदिवासियों के अधिवक्ता नित्यानंद द्विवेदी बताते हैं कि आदर्श सोसाइटी की जमीन बंटती, इससे पहले ही आशा मिश्रा और विनीता शर्मा ने संपत्ति बेचने का खेल रच डाला। सोसाइटी की करीब 72-72 बीघा जमीन आशा मिश्रा और विनीता शर्मा के नाम कर दी गई। दोनों के पति रसूखदार हैं। इन्होंने अपने पद और पावर का इस्तेमाल किया। फर्जी ढंग से मुख्तार-ए-खास बनवाकर सोसाइटी की करीब 144 बीघा जमीन अवैध तरीके से 17 अक्टूबर 2017 को मूर्तिया के दबंग प्रधान यज्ञदत्त सिंह भूरिया को बेच दिया। इस जमीन को बेचने के पीछे आशा मिश्रा और विनीता शर्मा की मंशा सिर्फ इतनी ही थी कि कहीं बंटवारे में यह कीमती जमीन उनके हाथ से निकल न जाए। दस्तावेजों के मुताबिक भूरिया को बेची गई जमीन की कीमत 80 लाख दर्शायी गई है। जबकि आरोप है कि आईएएस फैमली ने ढाई करोड़ से ज्यादा रकम लेकर फर्जी ढंग से रजिस्ट्री की। पटना हाईकोर्ट में सम्पत्ति बंटवारे का मामला विचाराधीन होने के बावजूद आशा मिश्रा व विनीता शर्मा ने दबंग प्रधान यज्ञदत्त सिंह भूरिया के 11 परिजनों व रिश्तेदारों के नाम बैनामा कर दिया। कौड़ियों के भाव जमीन खरीदने वालों में सुबाराजी पत्नी श्याम बिहारी, ममता सिंह पत्नी कोमल सिंह, उषा देवी, शिवानी पुत्री यज्ञदत्त, विवेक सिंह, विमलेश सिंह, अनूप सिंह, गणेश सिंह, शिवकुमार सिंह, अनिल कुमार सिंह और राजकुमार सिंह शामिल हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर आशा मिश्र (पत्नी- प्रभात कुमार, पूर्व आईएएस) और उनकी बेटी विनीता शर्मा उर्फ किरण कुमारी पत्नी भानु प्रताप शर्मा (आईएएस) के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में रपट दर्ज कराई गई है। आईएएस रेणुका कुमार की अध्यक्षता में गठित जांच कमेटी ने भी माना है कि आशा और उनकी बेटी विनीता ने आदिवासियों के हक पर डाका डाला। फर्जी सोसाइटी की जमीन दबंग भूमाफिया को बेची और जमीन पर अवैध तरीके से कब्जा दिलाने के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल किया। सूत्र बताते हैं कि आईएएस अफसरों की शह पाकर यज्ञदत्त भूरिया ने उभ्भा गांव में आदिवासियों की लाशें बिछा दीं। सीवान (घटना स्थल के मैदान) में एक रिहायसी घर में छिपने की जगह नहीं होती तो शायद इतनी लाशें गिरतीं कि जिन्हें गिन पाना शासन-प्रशासन के लिए मुश्किल हो जाता।

बड़े भाई के पद व पावर से बनाई फर्जी सोसाइटी

आदिवासियों की जमीन लूटने का खेल कांग्रेस के दबंग नेता एवं राज्यसभा सदस्य रहे माहेश्वरी प्रसाद नारायण सिन्हा ने रचा। इन्हें पद और पावर यूपी के राज्यपाल रहे इनके भाई सीपीएन सिंह की वजह से मिला। अपने भाई के रसूख का फायदा उठाकर माहेश्वरी ने आदिवासियों की जमीन हड़पनी शुरू कर दी। फर्जी कृषि सोसाइटी बनाई, फिर भोले-भाले आदिवासियों को झूठा ख्वाब दिखाया। कोई भी कृषि सोसाइटी तभी वैध मानी जाती है जब उसमें स्थानीय किसान सदस्य होते हैं। जबकि आदर्श सोसाइटी में उभ्भा अथवा मूर्तिया-सपही गांव के किसी किसान का नाम दर्ज ही नहीं हुआ।
उभ्भा में फर्जी सोसाइटी बनाने वाले माहेश्वरी प्रसाद बिहार के पारसगढ़ के निवासी थे। माहेश्वरी के भाई सीपीएन सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत से लड़ाई लड़ी थी। मुजफ्फरपुर के जिला परिषद अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने साल 1934 के भूकम्प के दौरान पीड़ितों की राहत के लिए जो कार्य किया, उसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। साल 1945 में वो संयुक्त पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए। आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें नेपाल का राजदूत बनाया।
साल 1953 में उन्हें अविभाजित पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्हीं के कार्यकाल में चंडीगढ़ और भाखड़ा नांगल बांध का निर्माण हुआ। साल 1958 में उन्हें जापान में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया। वहां उन्हें डाक्ट्रेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। बाद में उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक का निदेशक बनाया गया। वो आईडीबीआई के निदेशक और अन्य कई कंपनियों के अध्यक्ष भी रहे। साल 1977 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। 28 फरवरी, 1980 को वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त हुए। इस महान शख्स के खानदान वालों ने पैसे की लालच में दस निर्दोष आदिवासियों को मौत की नींद सुलाने के लिए विवश कर दिया। इससे देश का हर व्यक्ति अचंभित है।
(लेखक जनसंदेश टाइम्स अखबार के संपादक हैं।)

 

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