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भारतीय हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन को बदनाम कर मैदान से भाग निकले वैज्ञानिक

भारतीय हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन को बदनाम कर मैदान से भाग निकले वैज्ञानिक
कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए दुनियाभर से हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की उठी मांग के दौरान इस दवा को मौत का बड़ा कारण बताने वाले वैज्ञानिकों ने मैदान छोड़ दिया है। एक प्रभावशाली विदेशी मेडिकल पत्रिका लैंसेट में लेख लिखकर हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन को मृत्यु के लिए बड़ा खतरा बताने वाले तीनों वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन वापस ले लिया है। इससे इस बात की आशंका भी खड़ी हो रही है कि भारतीय दवा को दुनियाभर में बदनाम करने के लिए साजिश रची गई। ऐसे में इस बात की भी जरूरत है कि तीनों वैज्ञानिकों ने दवा पर सवाल उठाते समय जिन वजहों को कारण बताया था, उनकी भी जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि तीनों वैज्ञानिकों के पीछे क्या कोई देश तो नहीं था?
कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान अमेरिकी वैज्ञानिकों की सलाह पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से इस दवा को भेजने की गुजारिश की थी। हालांकि, विवाद उस दौरान भी ट्रंप की भाषा को लेकर उठा था, लेकिन बाद में भारत ने बड़े पैमाने पर अमेरिका को हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की आपूर्ति की। अमेरिकी मांग के बाद दुनिया के करीब 4 दर्जन से ज्यादा देशों ने भी इस दवा की मांग उठाई। ज्यादातर देशों में भारत ने दवा की आपूर्ति की। कुछ मित्र देशों को भारत ने इस दवा को मुफ्त में भी देने का काम किया जिससे वायरस के संक्रमण का फैलाव रोका जा सके।
इसी दौरान दवा को बदनाम करने के लिए मेडिकल पत्रिका लैंसेट में एक लेख प्रकाशित कर दावा किया गया कि एचसीक्यू का इस्तेमाल करने से मृत्यु का खतरा काफी बढ़ जाता है। पत्रिका में किए गए दावे के आधार पर भारत में भी तमाम लोगों ने एचसीक्यू के इस्तेमाल पर सवाल खड़े किए थे।
यही नहीं पत्रिका में तीनों विशेषज्ञों की प्रकाशित इस लेख के बाद कोविद 19 से जुड़े कई अध्ययनों को भी रोक दिया गया।
दुनिया भर में सवाल उठाने के बाद अब लेखकों ने दावा किया कि डाटा प्रदान करने वाली कंपनी सर्जीफेयर स्वतंत्र समीक्षा के लिए डाटासेट हस्तांतरित नहीं करेगी। ऐसे में प्राथमिक डाटा स्रोतों की सत्यता के लिए वे अब जिम्मेदारी नहीं ले सकते हैं।
न्यूज़ एजेंसी रॉयटर ने कहा है कि चौथे लेखक और सर्जीफेयर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ सपन देसाई ने तीन लेखकों के अध्ययन से पीछे हटने पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है। पिट्सबर्ग मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर डॉ वैलिड गैलरी कहा, जब आप की प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस तरह का काम करती हैं और अपने अध्ययन से 10 दिनों में पीछे हट जाती हैं। तो ऐसे में इससे सिर्फ अविश्वास बढ़ता है। लैंसेट ने कहा कि वह वैज्ञानिक अखंडता के मुद्दों को बहुत गंभीरता से लेता है।
हालांकि, शुरुआती दौर से ही सर्जीफेयर और उसके अध्ययन में कथित रूप से शामिल आंकड़ों के बारे में कई सवाल उठाए गए हैं। भारत की सबसे बड़े वैज्ञानिक संस्था आईसीएमआर इस दवा को पूरी तरह से कारगर बता चुकी है। एम्स के डॉक्टरों ने इसका परीक्षण भी किया है जिसमें यह दवा पूरी तरह खरी उतरी है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस दवा की प्रमाणिकता पर सवाल उठाने वालों को दो टूक जवाब दे चुके हैं और यह भी उन्होंने कहा था कि वह नियमित तौर पर इस दवा का सेवन कर रहे हैं। इससे यह समझा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय दवा के खिलाफ एक मुहिम इस लेख के जरिए चलाई गई, जो न सिर्फ इस दवा के व्यवसाय को नुकसान पहुंचा सकता था। बल्कि इससे भारतीय उत्पाद की प्रमाणिकता भी संदिग्ध होती।

 


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