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सावन की हरियाली , पक्षी का कलरव

सावन की हरियाली , पक्षी का कलरव
डॉ. रजनी रंजन जमशेदपुर ( झारखंड )
हे कविवर ! कविताई तुमने छत पर से ही की होगी देखी हरियाली पत्तों की, फूल भी सतरंगी देखी।
हरियाली की चादर ओढ़े धरती का आँचल देखा।
सदा विहसते जग में , जलपरियों की लीला देखी।।
इन्द्रधनुष की छटा लिए सतरंगी नभ को जब देखा आँख मिचौली बादल संग तत्क्षण बहुरंगी नग देखा।।
देखी ताल तलैया भरते , पंछी का कलरव देखा।
दादूर मोर पपीहा झींगूर, सबको नाचते गाते देखा।।
देखी फूलों पर तितली को ,देखी भौरों का गुंजन देखी सदाबहार सावन की, जो तुमने की थी सृजन।।
मेघों का गर्जन देखा और बिजली की चम-चम देखी रिमझिम बारिश की बूँदों में टपटप ध्वनि की बातें की।।
शीतल मंद बयार को देखा श्यामल धरा गगन देखी प्रेम में मेल-वियोग देखा,हिय की अन्तस्तल देखी।।
धानी चूनर हरी चुड़ियाँ ,हाथ रची मेहँदी देखा पाँवो में महावर देखी,पायल की छमछम देखा।।
झूला तीज सदाशिव की, पूजा महिमा को भी लिखा काँवर ले जाते काँवरिया, बोलबम गाते देखा।।
बेलपत्र गंगाजल अर्पण हेतु, पैदलयात्रा डाकबम देखी जय भोले शिवशंभु नाम का गुंजन हर घर में देखा।।
हे कविवर ! मैंने भी कुछ पंक्तियाँ लिखी विचरण करके पर तुमसा मैं लिख नहीं पाया, मेरी दृष्टि है हट करके।।
मैंने कीचड़ सने हुए मिट्टी के संग काई देखा फटे बिवाई आहें भरते खेतों में खेतिहर देखा।।
मांग भरी सिन्दूर सुहागन पीठ लदे बालक देखा धान रोपतीं गीत सुनातीं कर्म मग्न नारी देखा।।
फटी साड़ियों से तन ढंकती कीचड़ सना पाँव देखा। साझ ढले कौतुक आँखों को घर की ओर तकते देखा।।
दर्द भरे मुख पर देवों के सुमिरन संग याचना देखी। जियें सुखी से साजन संतति ऐसी अद्भुत अंगना देखी ।।
बहती नाक बिना कपड़ों में बच्चों को बैठे देखा हुआ अचानक गरम देह और सूजी आँखों को देखा।।
देखा गंध भरे नाले जो बजबजाती दुर्गंध लिए अनगिन कीड़े रेंगते देखा हर दरबे में पैठ किये।।
हे कविवर! क्या इन बातों में कोई रस ना मिला तुम्हें निज आँखों में पंक भरा जिससे कुछ ना दिखा तुम्हें।।
सुंदर बातें लिख दीं तुमने, देखी ना मलिनता इनकी कैसे होंगे दूर ये अंतर जिसने खुशियाँ ना देखीं।।
हे कविवर! ऊपर नीचे में फर्क बहुत है जो जाना। उसने सावन के बहार संग कठिन डगर को पहचाना।।
हे कविवर! कमियों पर परदा डाल रखे क्यों तुमने। कब तक भागोगे सत्य से, जिसको जीते हैं अपने।।
हे कविवर! अब लिखना मत तुम सूरज चाँद सितारे मग बस कह देना जग से सत्य, टूटे हुए तारे का सच।।
हे कविवर! उस घर को लिखना जहाँ तेल ना बाती है दाल सब्जियाँ सपने होते सूखी रोटी चबाती हैं ।।
हे कविवर! उन आँखों को भी लिखो सदा जो नीर भरा कल हो तो मिल जाये रोटी कितना उनमें धीर भरा।।
हे कविवर! साहस लिखना जो डर के ऊपर भारी है। घोड़ा गाड़ी नहीं चाहिए पैदल इनकी सवारी है।।
हे कविवर ! कूड़े का गंगाजल में प्रत्यर्पण लिखो। बने महल तोड़ के कुटिया ऐसे निर्मम क्षण लिखो।।
हे कविवर! जंगल कटना व जीव हनन की बात लिखो। उजड़ी धरती तपताअंबर झुलसे प्राणी हयात लिखो।।
हे कविवर!कजरी गान में सखियों का समवेत राग लिखो। लिखो बहुला,सामा की गाथा भाई का सम्मान लिखो।।
हे कविवर! सावन की वही पुरानी रीति रिवाज लिखो। लिखो खुशी के पर्व त्योहार और प्रेम अपनापन लिखो।।
हे कविवर! कुछ राय सलाह भी दे दो अंतर पाटने का जिससे कुछ सीखें जगवाले तथ्य खुशियाँ बाँटने का।।

 


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