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दिग्विजय के खिलाफ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर लड़ सकती हैं चुनाव? भाजपा में हुईं शामिल

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
मालेगांव बम धमाका मामले में यूपीए सरकार के कार्यकाल में जेल जा चुकीं साध्वी प्रज्ञा ठाकुर बुधवार को भारतीय जनता पार्टी में विधिवत शामिल हो गईं. ऐसी संभावना जताई जा रही है कि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भोपाल से कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं. दावा किया जा रहा है कि भाजपा साध्वी प्रज्ञा को चुनाव मैदान में उतारकर हिन्दू आतंकवाद शब्द को शुरू करने वाले दिग्विजय सिंह की घेराबंदी कर सकती है. गौरतलब है कि यूपीए सरकार के दौरान कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ही हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को जन्म दिया था.

जानिए साध्वी प्रज्ञा के बारे में
साध्वी प्रज्ञा मध्यप्रदेश के एक मध्यम वर्गीय परिवार से हैं। परिवारिक पृष्ठ भूमि के चलते वे संघ व विहिप से जुड़ीं और किसी समय संन्यास ले लिया। 2008 में हुए मालेगांव बमविस्फोट में उन्हें शक के आधार पर गिरफ्तार किया गया। 2017 में बिना किसी सबूत उन्हें बैल दी गई। उन्हें वैसे ग्वालियर का निवासी माना जाता है। उन्होंने पढ़ाई में साधारण शुरुआत के बाद उच्च शिक्षा हासिल की। भोपाल में एबीवीपी, आरएसएस से जुड़ी रही। अध्यात्म अध्ययन में झुकाव होने के साथ वह स्वामी अवधेशानंद से प्रभावित थीं। प्रज्ञा ठाकुर मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में स्थित भिंड जिले में पली-बढ़ीं। वे राजावत राजपूत हैं। उनके पिता आरएसएस के स्वयंसेवक और पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। साध्वी प्रज्ञा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सक्रिय सदस्य थीं और विश्व हिन्दू परिषद की महिला विंग दुर्गा वाहिनी से जुड़ी थीं।
अपने भड़काऊ भाषणों के लिए वे कई बार सुर्खियों में रहीं। 2002 में उन्होंने जय वंदे मातरम जन कल्याण समिति बनाई। स्वामी अवधेशानंद गिरि के संपर्क में आने के बाद प्रज्ञा नए अवतार में नजर आईं। अवधेशानंद का राजीनितिक गलियारे में खासा प्रभाव माना जाता था। उन्होंने राष्ट्रीय जागरण मंच का गठन किया।
मालेगांव में 2008 में बम विस्फोट हुआ। उसमें एक गाड़ी जो उन्होंने एक साल पूर्व बेंच थी, उसका इस्तेमाल होना बताया गया। पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया और गिरफ्तार कर लिया। पुलिस की पूछताछ चलती रही। साध्वी प्रज्ञा ने दावा किया कि जेल के दौरान उनके खिलाफ जांच एजेंसियों ने काफी अत्याचार किए। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा नासिक कोर्ट में शपथ पत्र देकर पुलिस उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
कोर्ट में दिया गया शपथ पत्र जो हूबहू इस प्रकार है-
14 अक्टूबर 2008 को सुबह मुझे कुछ जांच के लिए एटीएस कार्यालय से काफी दूर ले जाया गया, जहां से दोपहर में मेरी वापसी हुई। उस दिन मेरी पसरीचा से कोई मुलाकात नहीं हुई। मुझे यह भी पता नहीं था कि वे (पसरीचा) कहां हैं। 15 अक्टूबर को दोपहर बाद मुझे और पसरीचा को एटीएस के वाहनों में नागपाड़ा स्थित राजदूत होटल ले जाया गया, जहां कमरा नंबर 315 और 314 में हमे क्रमशः बंद कर दिया गया। यहां होटल में हमने कोई पैसा जमा नहीं कराया और न ही यहां ठहरने के लिए कोई खानापूर्ति की। सारा काम एटीएस के लोगों ने ही किया।
मुझे होटल में रखने के बाद एटीएस के लोगों ने मुझे एक मोबाइल फोन दिया। एटीएस ने मुझे इसी फोन से अपने कुछ रिश्तेदारों और शिष्यों (जिसमें मेरी एक महिला शिष्य भी शामिल थी) को फोन करने के लिए कहा और कहा कि मैं फोन करके लोगों को बताऊं कि मैं एक होटल में रूकी हूं और सकुशल हूं। मैंने उनसे पहली बार यह पूछा कि आप मुझसे यह सब क्यों कहलाना चाह रहे हैं। समय आने पर मैं उस महिला शिष्य का नाम भी सार्वजनिक कर दूंगी।
एटीएस की इस प्रताड़ना के बाद मेरे पेट और किडनी में दर्द शुरू हो गया। मुझे भूख लगनी बंद हो गयी। मेरी हालत बिगड़ रही थी। होटल राजदूत में लाने के कुछ ही घण्टे बाद मुझे एक अस्पताल में भर्ती करा दिया गया जिसका नाम सुश्रुसा हास्पिटल था। मुझे आईसीयू में रखा गया। इसके आधे घण्टे के अंदर ही भीमाभाई पसरीचा भी अस्पताल में लाये गये और मेरे लिए जो कुछ जरूरी कागजी कार्यवाही थी, वह एटीएस ने भीमाभाई से पूरी करवाई। जैसा कि भीमाभाई ने मुझे बताया कि श्रीमान खानविलकर ने हास्पिटल में पैसे जमा करवाये। इसके बाद पसरीचा को एटीएस वहां से लेकर चली गयी जिसके बाद से मेरा उनसे किसी प्रकार का कोई संपर्क नहीं हो पाया है।
इस अस्पताल में कोई 3-4 दिन मेरा इलाज किया गया। यहां मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था तो मुझे यहां से एक अन्य अस्पताल में ले जाया गया, जिसका नाम मुझे याद नहीं है। यह एक ऊंची इमारत वाला अस्पताल था, जहां दो-तीन दिन मेरा ईलाज किया गया। इस दौरान मेरे साथ कोई महिला पुलिसकर्मी नहीं रखी गयी। न ही होटल राजदूत में और न ही इन दोनों अस्पतालों में. होटल राजदूत और दोनों अस्पताल में मुझे स्ट्रेचर पर लाया गया। इस दौरान मेरे चेहरे को एक काले कपड़े से ढंककर रखा गया। दूसरे अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मुझे फिर एटीएस के आफिस कालाचौकी लाया गया।
इसके बाद 23-10-2008 को मुझे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के अगले दिन 24-10-2008 को मुझे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नासिक की कोर्ट में प्रस्तुत किया गया, जहां मुझे 3-11-2008 तक पुलिस कस्टडी में रखने का आदेश हुआ। 24 तारीख तक मुझे वकील तो छोड़िये अपने परिवारवालों से भी मिलने की इजाजत नहीं दी गयी। मुझे बिना कानूनी रूप से गिरफ्तार किये ही 23-10-2008 के पहले ही पालीग्रैफिक टेस्ट किया गया। इसके बाद 1-11-2008 को दूसरा पालिग्राफिक टेस्ट किया गया। इसी के साथ मेरा नार्को टेस्ट भी किया गया।
मैं कहना चाहती हूं कि मेरा लाई डिटेक्टर टेस्ट और नार्को एनेल्सिस टेस्ट बिना मेरी अनुमति के किये गये। सभी परीक्षणों के बाद भी मालेगांव विस्फोट में मेरे शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिल रहा था। आखिरकार 2 नवंबर को मुझे मेरी बहन प्रतिभा भगवान झा से मिलने की इजाजत दी गयी। मेरी बहन अपने साथ वकालतनामा लेकर आयी थी जो उसने और उसके पति ने वकील गणेश सोवानी से तैयार करवाया था। हम लोग कोई निजी बातचीत नहीं कर पाये क्योंकि एटीएस को लोग मेरी बातचीत सुन रहे थे। आखिरकार 3 नवंबर को ही सम्माननीय अदालत के कोर्ट रूम में मैं चार-पांच मिनट के लिए अपने वकील गणेश सोवानी से मिल पायी।
10 अक्टूबर के बाद से लगातार मेरे साथ जो कुछ किया गया उसे अपने वकील को मैं चार-पांच मिनट में ही कैसे बता पाती? इसलिए हाथ से लिखकर माननीय अदालत को मेरा जो बयान दिया था, उसमें विस्तार से पूरी बात नहीं आ सकी। इसके बाद 11 नवंबर को भायखला जेल में एक महिला कांस्टेबल की मौजूदगी में मुझे अपने वकील गणेश सोवानी से एक बार फिर 4-5 मिनट के लिए मिलने का मौका दिया गया। इसके अगले दिन 13 नवंबर को मुझे फिर से 8-10 मिनट के लिए वकील से मिलने की इजाजत दी गयी। इसके बाद शुक्रवार 14 नवंबर को शाम 4.30 मिनट पर मुझे मेरे वकील से बात करने के लिए 20 मिनट का वक्त दिया गया जिसमें मैंने अपने साथ हुई सारी घटनाएं सिलसिलेवार उन्हें बताई, जिसे यहां प्रस्तुत किया गया है।
2016-17 में भोपाल के खुशिलाल शर्मा आयुर्वेद औषधालय में उपचार कराती रही। 2017 में कोर्ट से अनुमति के बाद उन्होंने उज्जैन सिंहस्थ में स्नान किया। 25 अप्रैल 2017 को उन्हें बैल पर रिहा कर दिया गया।
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