Ayodhya, #सबहिं_नचावत_राम_गोसाईंः अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारत की सांस्कृतिक चेतना का अधिष्ठान

#सबहिं_नचावत_राम_गोसाईंः अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारत की सांस्कृतिक चेतना का अधिष्ठान

Ayodhya, #सबहिं_नचावत_राम_गोसाईंः अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भारत की सांस्कृतिक चेतना का अधिष्ठान
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

प्रो. बल्देव भाई शर्मा

श्रीराम का विजय रथ आखिरकार अयोध्या पहुंच ही गया। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने अब श्रीराम जन्म स्थान पर भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। सैकड़ों वर्षों से वहां भगवान श्रीराम का विस्थापन अब समाप्त होगा और देश-दुनिया के करोड़ों हिंदुओं के मन में रामलला को टेंट में देखकर जो दुस्सह पीड़ा होती थी , उससे मुक्त होकर हिन्दू जनमानस आह्लादित होगा। उस फैसले से अंततः 134 साल की कानूनी लड़ाई का पटाक्षेप हो गया और 1528 में बर्बर आक्रमणकारी बाबर के सिपहसालार मीर बाकी द्वारा श्रीराम जन्म भूमि पर बनाई गई मस्जिद को विधिक रूप से अवैध ठहराते हुए श्रीरामलला विराजमान को विवादित 2.77 एकड़ भूमि का निर्विवाद रूप से मालिकाना हक दे दिया गया।

इक्का-दुक्का को छोड़ सभी ने संतोष जताया

भारत के कानूनी इतिहास में शायद यह पहला मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में था , जिसके फैसले का न केवल 130 करोड़ देशवासियों को बेसब्री से इंतजार था बल्कि पूरी दुनिया में इसे लेकर उत्सुकता थी। यही वजह थी कि फैसला आते ही ट्यूटर पर दुनिया भर के 10 में से 3 ट्वीट इसी को लेकर ट्रैंड करने लगे और भारत में तो मानो सोशल मीडिया पर बाढ़ सी आ गई। आम सहमति के मामले में भी शायद यह पहला मामला है कि इस फैसले पर देश के लगभग सभी राजनैतिक दलों व वर्गों-समुदायों ने एकराय और एकजुटता का परिचय दिया है, अगर आग में घी डालने का राजनैतिक मौका ताड़ने वाले एकाध विघ्नसंतोषी को छोड़ दिया जाए। सभी प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने फैसले पर संतोष जताया है। यहां तक कि एक मुख्य पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फैसले के खिलाफ अपील न करने की राय बनाई है। बोर्ड के चेयरमैन जफर अहमद फारूकी का कहना है कि फैसले को चुनौती देने की हमारी कोई योजना नहीं है। अगर कोई कहता है कि बोर्ड फैसले को चुनौती देगा तो यह सही नहीं है। हालांकि ओवैसी जैसे एक्का-दुक्का मुस्लिम नेता अपने बयानों से इस सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश में दिखे।

है राम के वजूद पर हिन्दोस्तां को नाज

इस फैसले से मजहबी बना दिए गए मामले के पीछे की वैमनस्यकारी मानसिकता पर भारतीयता को प्रतिष्ठित किया है। जैसी की आशंका पनप रही थी कि फैसला किसी के पक्ष में आए , कुछ अनर्थकारी घटित हो सकता है। सरकार की ओर से भी इससे निपटने के लिए पूरी मुस्तैदी से सुरक्षात्मक प्रबंध किए गए थे। लेकिन भारत ने फिर साबित कर दिया कि इसका सामाजिक तानाबाना बहुत सुदृढ़ है , कोई भी मजहबी राजनीति उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश ही यह है कि ” न किसी की हार हुई , न किसी की जीत ” । जीता तो सिर्फ भारत और हमारा सामाजिक सौहार्द। कुछ दलों और नेताओं ने भले ही अपने सत्ता स्वार्थों के लिए राम के अस्तित्व को नकार कर उन्हें एक काल्पनिक चरित्र बताने वाले हलफनामे दिए हों , मुस्लिम मतदाताओं को खुश करके उनके वोट के लिए कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं हो लेकिन वे राम के वजूद को न ओझल कर सके और न ही बांट सके। राम जितने हिंदू मन में समाए हैं , उतना ही उन्होंने मुस्लिम मन को मोह रखा है। तभी तो प्रसिद्ध शायर अल्लामा इकबाल ने लिखा – ” है राम के वजूद पर हिन्दोस्तां को नाज , अहले नजर समझते हैं उनको इमाम ए हिन्द । “

भारत की न्याय व्यवस्था पर विश्वास मजबूत

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पांचों जजों ने सभी तथ्यों और बिदुओं को खंगालकर 1045 पृष्ठों का यह फैसला सर्वसम्मति से दिया है। निस्संदेह यह फैसला आस्था और विश्वास पर नहीं बल्कि प्रमाणों व ऐतिहासिकता पर आधारित है। अदालत ने जहां स्कंद पुराण और वाल्मीकि रामायण के तथ्यों पर विचार किया वहीं पुरातत्व विभाग की रपटों को भी आधार बनाया। इस फैसले में पूरी तरह से न्यायिक प्रक्रिया का पालन हुआ है। जहां मस्जिद के लिए अयोध्या की सीमा में 5 एकड़ भूमि देने का सरकार को निर्देश है वहीं मंदिर निर्माण के लिए तीन माह में ट्रस्ट बनाने व निर्मोही अखाड़ा को प्रतिनिधित्व देने का भी निर्देश है ताकि मंदिर निर्माण प्रक्रिया निर्विवाद रहे और सौहार्दपूर्वक आगे बढ़े। जिस तरह विद्वान न्यायाधीशों ने फैसला देते हुए छोटी-छोटी बातों पर गौर किया है वह एक मिसाल है। इससे भारत की न्याय व्यवस्था पर आमजन का विश्वास मजबूत हुआ है।

सटीक टिप्पणी

फैसले पर सबसे सटीक टिप्पणी प्रधानमंत्री की है कि फैसले को जीत-हार के रूप में नहीं देखना चाहिए। राम भक्ति हो या रहीम भक्ति , यह समय सभी के लिए भारत भक्ति की भावना को सशक्त करने का है। शांति , सद्भाव और एकता बनाए रखें। और वास्तव में सभी देशवासियों ने राजनीति , वर्ग , मजहब से ऊपर उठकर फैसले का स्वागत किया है , उसे स्वीकार किया है। शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद की प्रतिक्रिया में तो कोई संशय बचता ही नहीं है-” हम विनम्रता पूर्वक कोर्ट के फैसले को स्वीकार करते हैं । मैं अल्लाह का शुक्रगुजार हूं कि मुसलमानों ने इस फैसले को स्वीकार किया है और विवाद अब समाप्त हो गया है। मुझे लगता है कि मामला अब खत्म होना चाहिए। “

अदालत की ईमानदारी झलकती है

वस्तुतः फैसले पर किसी भी तरह के किंतु – परन्तु की गुंजाइश ही नहीं बचती जब कोर्ट ने फैसले में स्पष्टतः कह दिया कि ” एक की आस्था दूसरे का अधिकार न छीने। आस्था पर फैसला न्यायिक जांच के दायरे से बाहर है । टाइटल आस्था के आधार पर साबित नहीं होता। हर धर्म के लोगों को संविधान ने बराबर का सम्मान दिया है। ” सर्वोच्य न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के द्वारा दी गई विशेष शक्तियों का प्रयोग कर यह फैसला दिया है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है ” मुस्लिम पक्ष जमीन पर कब्जा साबित नहीं कर सका। सुन्नी बोर्ड यह भी साबित नहीं कर सका कि वहां हिंदू पक्ष का जबरन कब्जा था। कोर्ट ने माना है कि वहां मस्जिद वैध जमीन पर नहीं बनाई गई। ” ऐसी स्पष्टता के बाद भी कोई कुएं में भांग डालने का प्रयास करते हुए कहे कि यह मुस्लिम पक्ष के साथ अन्याय है तो इसे उसकी बदनीयती ही समझा जाएगा। अदालत की न्यायिक ईमानदारी तो इससे भी झलकती है कि उसने मस्जिद को ढहाया जाना गैरकानूनी माना है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने साफतौर पर कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( एएसआई ) की रिपोर्ट और खुदाई से निकले सबूतों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। एएसआई ने अयोध्या में मंदिर 12वीं सदी का बताया था और खुदाई में नीचे मिला ढांचा व कलाकृतियां इस्लामी शैली की नहीं थीं। “

कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने लोगों को बरगलाया

इतने स्पष्ट और तथ्यों पर आधारित फैसले में भी ओवैसी जैसे लोग यदि वैमनस्य के सूत्र ढूंढ रहे हैं तो यह कोई नई बात नहीं है। कम्युनिस्ट जमात रामजन्मभूमि मुद्दे पर शुरू से भारतजन को बांटने और मुस्लिम पक्ष को बहकाने , भड़काने के लिए तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत करती रही है जिससे इस मुद्दे का आम सहमति से समाधान होने में लगातार बाधाएं उत्तपन्न होती रहीं। दरअसल भारत में सामाजिक सौहार्द होने से तो इनकी राजनीति ही खत्म हो जाएगी। इस मामले में एएसआई के पूर्व निदेशक व अयोध्या में न्यायालय के आदेश पर खुदाई प्रक्रिया से जुड़े रहे केके मुहम्मद का कहना है कि कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने लोगों को बरगलाया , जिससे मामला पेचीदा होता गया। जबकि अयोध्या में 70 के दशक व उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश से हुई खुदाई में वहां मंदिर के अवशेष मिले। ये अवशेष बताते हैं कि उस परिक्षेत्र में कभी भव्य विष्णु मंदिर था। यह बताते हुए मुहम्मद कम्युनिस्ट इतिहासकार इरफान हवीब और रोमिला थापर जैसे को उत्तरदायी मानते हैं। एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से माना है कि मस्जिद उसी स्थान पर बनाई गई जहां श्रीराम जन्मस्थान था। सर्वोच्य न्यायालय ने अपने फैसले में रिपोर्ट में दिए इन तथ्यों पर भी ध्यान दिया है। ऐसे में फैसले पर आस्था का सवाल उठाना बेमानी और शरारतपूर्ण है। निश्चित है ऐसे लोग नहीं चाहते कि भारतीय समाज वैमनस्य से बाहर निकलकर सौहार्द के साथ रहे और भारतीयता की भावना मजबूत हो।

राम धर्म का साक्षात रूप हैं

वास्तव में अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के मुद्दे को राजनैतिक व मजहबी रंग देते रहे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि राम भारत के आत्मा हैं और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस देश की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक किंवा भारत की पहचान होगा। गांधी जहां उन्हें अपना अराध्य मानते थे और आजादी के बाद भारत के विकास का मॉडल रामराज्य को बनाने के अभिलाषी थे वहीं डॉ. लोहिया राम को भारत की आंतरिक चेतना का देवता मानते थे। ऐसे राम व इनका मंदिर सम्प्रदायिकता का प्रतीक कैसे हो सकता है ? इसलिए श्रीराम जन्मभूमि पर ” विश्व तीर्थ स्थल ” बनाने के उदार सुझाव देते रहे सेक्युलर ज्ञानियों को भी अब समझ लेना चाहिए कि भारत ही दुनिया को सर्वपंथ समभाव का संदेश देने वाला देश है। अपनी पहचान मिटाकर दूसरों को यह पाठ कैसे पढ़ाया जा सकता है। इसलिए अयोध्या में राम मंदिर की बजाए सभी धर्मों का प्रतीक कोर्ट धर्मस्थल बनाए जाने की बात करना महज एक छलावा थी। इसलिए याद रखें कि भारत में राम हैं तो सेकुलरवाद है और सर्वपंथ समभाव भी। राम हैं तो भारत है अन्यथा भारत को पाकिस्तान बनते देर नहीं लगेगी। धर्म और मजहबी कट्टरता के फर्क को समझना भी जरूरी है। इसीलिए महर्षि वाल्मीकि ने ” रामो विग्रहवान धर्म: ” कहा है कि राम धर्म का साक्षात रूप हैं। वे मानवता का आधार हैं , मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। यही धर्म का रूप है जो मानवता के सारे भेद मिटाकर मनुष्यता का पोषण करता है। इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के अपने भाषण में हिंदू धर्म को मानव धर्म कहा। ऋग्वेद में इसी मानवीय चेतना के पोषण के लिए लिखा गया – ” संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम ” यानी सभी मनुष्य एक साथ चलें , एक भावबोध लेकर संवाद करें और एक मन होकर सोचें व जिएं। इससे व्यापक लोककल्याणकारी जीवनदृष्टि और क्या हो सकती है। राम इसी लोकोपकारी उद्दात चिंतन के आदर्श हैं।

राम की इच्छा ही फलदायी

निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से बनने वाला भव्य राम मंदिर मानवता के पोषक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा का अधिष्ठान होगा। इसी के लिए 491 साल में करीब 70 छोटे-बड़े युद्ध हुए , जिनमें असंख्य राम भक्तों का बलिदान हुआ। कार सेवा में कोठारी बंधुओं सहित कितने ही राम भक्त निर्ममता पूर्वक गोलियों के शिकार बनाए गए। अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता जैसी नृशंस अहंकारी घोषणाओं के बाद भी अगर देश के कोने कोने से राम भक्तों का ज्वार उमड़ पड़ा तो महज एक मंदिर बनाने के लिए नहीं , बल्कि राम मंदिर के रूप में भारत की पहचान व देश की सांस्कृतिक चेतना की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए। वह मंगल पर्व आखिरकार आ ही गया, इसलिए सब पिछली बातों और किसी भी प्रकार के विवाद , वैमनस्य , कटुता को भुलाकर सामाजिक सद्भाव व राष्ट्रीय एकता के प्रतीक भव्य राम मंदिर के निर्माण में जुटें, यही इस फैसले का निहितार्थ है। हमारी मंशा कुछ भी हो लेकिन अंततः राम की इच्छा ही फलदायी होती है। इसीलिए संत तुलसीदास ने लिखा – सबहिं नचावत राम गोसाईं।

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