अफसरों की खींचतान में फंस गई है रेल मंत्री की लाडली ट्रेन-18!

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स       
काफी धूमधड़ाके से ट्रैक पर उतारी गई ट्रेन-18 का शोर अब थम चुका है. भारत की स्वदेशी मिनी बुलेट ट्रेन के तौर पर प्रचारित इस ट्रेन को यात्रियों की सेवा में उतारने की बारी आई तो ऐसी खबरें सामने निकलकर आई हैं कि यह ट्रेन रेलवे अफसरों की खींचतान का शिकार हो गई है. इस विभागीय लड़ाई से देश की राष्ट्रीय राजधानी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के बीच चलने का खाका बनने के बाद भी ट्रेन को तारीख-दर-तारीख मिल रही है.
ट्रेन-18 को पटरियों पर ट्रॉयल रन पर दौड़ते हुए देश ने देख लिया है. अब यात्रियों को इस ट्रेन का बेसब्री से इंतजार है. नई दिल्ली से इलाहाबाद के बीच 130 किमी प्रति घंटे के ट्रॉयल टन के बाद यह दावा किया गया था कि जल्द ही नई दिल्ली से प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के बीच यह ट्रेन शुरू कर दी जाएगी. इसके रूट को औद्योगिक नगरी कानपुर और केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बहुप्रचारित कुंभ-2019 को आयोजित करने वाले प्रयागराज को बताया गया था.
परंतु, अब हैरान करने वाली जानकारी सामने आ रही है कि रेलवे की आंतरिक विभागीय लड़ाई में इस ट्रेन की लॉन्चिंग टलती जा रही है. शुरुआत में इस ट्रेन को भारत रत्न व पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को इसे चलाने की तैयारी देखी गई. फिर, 29 जनवरी को प्रधानमंत्री के वाराणसी दौरे के वक्त ट्रेन को हरी झंडी मिलने की चर्चा हुई. बाद में कहा गया कि कुंभ मेला के पहले स्नान पर्व से पूर्व ही इसे चला दिया जाएगा, जिससे विदेशी पर्यटक भी आसानी से प्रयागराज पहुंच सकें लेकिन अब तक ट्रेन के संचालन को लेकर रेलवे कुछ भी साफ तौर पर नहीं बता रहा है.
समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक बुधवार को हुई रेलवे बोर्ड की मीटिंग में भी इसके बारे में कोई समाधान नहीं हो पाया. इलेक्ट्र‍िकल इंस्पेक्टर जनरल (EIG) के सेफ्टी सर्टिफिकेट को लेकर रेलवे के इलेक्ट्र‍िकल और मेकैनिकल विंग के बीच अहम की जंग छिड़ी है. कहा जा रहा है कि दो विभागों के टकराव को देखते हुए अब रेलवे बोर्ड इस मसले को चीफ कमिश्नर रेलवे सेफ्टी को वापस भेजने पर विचार कर रहा है.
पिछले महीने सीआरएस ने ट्रेन को अधिकतम 160 किमी की स्पीड से चलाने के लिए मंजूरी दी थी, लेकिन इसके लिए कई शर्तें भी लगा दी गईं. इनमें ईआईजी सर्टिफिकेशन और दुर्घटनाओं से बचने के लिए रेलवे ट्रैक के किनारे फेन्सिंग यानी दीवार या जाल लगाने जैसी शर्ते शामिल हैं.
खबरों के मुताबिक सीआरएस के आदेश में कहा गया है, ‘सभी तरह के इलेक्ट्र‍िकल सिस्टम के लिए सेफ्टी सर्टिफिकेशन का काम जोनल रेलवे के ईआईजी के द्वारा किया जाएगा. साथ ही ट्रेन के संचालन से पहले इसकी रिपोर्ट कमीशन के पास जमा करनी होगी.’
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार रेलवे का इलेक्ट्र‍िकल विभाग इस बात पर अड़ गया है कि जब तक ईआईजी सर्टिफिकेट नहीं मिलता, तब तक वह आगे नहीं बढ़ेगा. मेकैनिकल विभाग का तर्क है कि इंडियन इलेक्ट्र‍िसिटी एक्ट, 2003 की धारा 54 के मुताबिक ईआईजी सर्ट‍िफिकेशन जरूरी नहीं है.
गौरतलब है कि इस ट्रेन के विकास पर 100 करोड़ रुपये का खर्च आया है. रेलवे मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से आईएएनस ने लिखा है कि आईसीएफ के प्रिंसिपल चीफ इलेक्ट्र‍िकल इंजीनियर ने ट्रेन की सुरक्षा के लिए सर्टिफिकेट दे दिया है. कानून के मुताबिक अब इसे ईआईजी से किसी और तरह के सेफ्टी सर्टिफिकेशन की जरूरत नहीं है.
सूत्रों का कहना है कि किसी भी ट्रेन की शुरुआत के लिए रेलवे के पूरे बोर्ड की हरी झंडी जरूरी है. इसलिए ईआईजी सर्टिफिकेट न मिलना ट्रेन-18 की शुरुआत के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बन रहा है.
यहां रोचक यह भी है कि रेलवे गतिमान एक्सप्रेस को 160 किमी प्रति घंटे की गति से दिल्ली से झांसी के बीच दौड़ा रहा है. इस पूरे हिस्से में अभी फेंसिंग का कार्य नहीं हुआ है. जबकि सीआरएस ने 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाले हिस्से में फेंसिंग कराने को कहा था. ऐसे में यह भी चर्चा है कि रेलवे बोर्ड के कुछ सदस्य इसे अहम के टकराव से जोड़ रहे हैं. जबकि बोर्ड इस मुद्दे को अनसुना कर ट्रेन को चलाने का अधिकार रखता है.
रेलवे बोर्ड के अफसरों का यह टकराव उस काम को लेकर है जिस पर लगातार रेल मंत्री और पीएमओ की भी निगाह है. ऐसे में यह आसानी से समझा जा सकता है कि पिछले दिनों रेलवे के अफसर की ओर से उठाए गए सवालों में कितनी सच्चाई है.
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