पीएम मोदी ने यूं ही नहीं खेला 10 फीसदी आरक्षण का गेम, इस हकीकत से फटी रह जाएंगी आपकी आंखें

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स       

रणविजय सिंह

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े हिस्से को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण के मोदी सरकार का फैसला लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद बुधवार को राज्य सभा में राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करते हुए विपक्ष की धार पर परखा जाएगा.
बिहार के प्रमुख विपक्षी दल राजद के मनोज झा ने इसके विरोध का ऐलान कर संकेत दे दिया है कि अन्य विपक्षी पार्टियां भी इस बिल का लाभ भाजपा को उठाने देने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार होने वाली नहीं हैं. राजद ने जिसि बैठक के बाद यह फैसला सुनाया है उसमें समाजवादी पार्टी के महासचिव राम गोपाल यादव और वामपंथी दलों के नेता, टीएमसी समेत कई दल शामिल थे. सो, विपक्षी दलों का ताना-बाना राज्यसभा में ही दिखना है जहां मोदी सरकार अल्पमत में है. विपक्षी हर वह दांव आजमाने का प्रयास करेंगे कि भाजपा के हाथ से यह `तोता` भी उड़ जाए. क्योंकि, इसी में उनका फायदा और भाजपा का नुकसान उन्हें दिखता है.
फिलहाल, सरकार का मानना है कि संविधान में आरक्षण से जुड़े आर्टिकल में संशोधन किए जाने से इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना आसान नहीं होगा. हालांकि, कोर्ट में इस फैसले के टिकने या खारिज होने का दावा करने वालों का जत्था संसद के गलियारे से लेकर सोशल मीडिया के जरिए गांव-गांव, घर-घर फैल चुका है. सरकार को उम्मीद है कि इस कानून के खिलाफ जाने वालों को कोर्ट नकार देगी. लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले के सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं. इस तरह के सवाल भी उठ रहे हैं कि आखिर संसद के आखिरी सत्र के आखिरी दिनों में ही यह क्यों लाया गया?

सवर्ण आरक्षण और सियासी समीकरण

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली 282 सीटों में 256 सीटें 14 राज्यों से मिली थीं. इन 14 राज्यों में लोकसभा की 341 सीटें हैं, जिनमें से करीब 180 सीटों पर सवर्ण वोटर निर्णायक हैं. महाराष्ट्र में करीब 25 सीट, हरियाणा, दिल्ली और उत्तराखंड की 5-5 सीट, हिमाचल की 4 सीट पर सवर्ण वोट हार-जीत की भूमिका तय करते हैं. गुजरात की 12, मध्य प्रदेश की 14, राजस्थान की 14, बिहार की करीब 20 सीट और झारखंड की 6 सीट पर सवर्ण मतदाताओं का असर पड़ता है. अकेले यूपी में करीब 40 ऐसी सीटें हैं, जहां सवर्ण वोटर किसी की जीत या हार तय करते हैं. इन्हीं सीटों में अमेठी और रायबरेली भी हैं, जहां से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी सांसद हैं. ऐसे में 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार का यह मास्टर स्ट्रोक विपक्षी एकजुटता के लिए हानिकारक भी साबित हो सकता है और बीजेपी के विजयी रथ को फिर से उड़ान हासिल हो सकती है.

इन्हें मिलता है यह आरक्षण

इस सब के बीच यह समझना भी जरूरी है कि देश में अब तक आरक्षण पाने वालों की स्थिति क्या है और नई आरक्षण नीति लागू होने पर कितने लोगों को इसका लाभ मिल पाएगा. देश में 16.6 फीसदी अनुसूचित जाति (SC) आबादी है, जिसे 15% आरक्षण मिलता है. जबकि 8.6 फीसदी अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी है जिसे 7.5 फीसदी आरक्षण मिलता है. करीब 41% अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आबादी मानी जाती है, जिसे 27% आरक्षण मिलता है.

अब तक चुनावी बिसात पर ठगी गई आबादी

अब बात करते हैं सामान्य श्रेणी के करीब 34 फीसदी आबादी की, जो किसी भी किस्म के सरकारी आरक्षण से वंचित है. ऐसा माना जाता है कि सामान्य श्रेणी की आबादी का 50 फीसदी आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ा है. इसमें भी करीब 15 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनके पास इतनी भी आमदनी नहीं है कि वह साधारण जीवन यापन कर सकें. बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें. यह सच्चाई है कि क्षत्रियों और ब्राह्मणों में भी बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जो दलित परिवारों जैसा जीवन गुजारते हैं लेकिन अब तक यह आबादी सवर्ण के नाम पर किसी भी सरकारी योजना में संरक्षण से वंचित रही है. मोदी सरकार ऐसे ही सामान्य श्रेणी वाले गरीबों के लिए 10 फीसदी आरक्षण ला रही है, जिन्हें अभी तक कोई फायदा नहीं मिलता है. मोदी सरकार का यह फैसला यदि बुधवार को राज्य सभा में भी दो तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तो इसका लाभ पाने वाला देश का एक बड़ा वर्ग होगा.
दिलचस्प बात ये है कि मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण में धर्म और जाति की सीमाओं को तोड़ते हुए अब तक सरकारों में किसी भी रूप से पोषित न हो सकने वाले विपन्न सवर्णों यानी गरीब सवर्णों को फायदा पहुंचाने का फैसला लियाय.  इसमें हिन्दू आबादी के साथ-साथ मुस्लिम और ईसाई आबादी भी लाभान्वित होगी. चुनावी दृष्टिकोण से ये फैसला मील का पत्थर साबित हो सकता है.

2006 में बना था ईबीसी कमीशन

देश में आरक्षण की व्यवस्था आजादी के बाद से ही चली आ रही है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था के बाद 1990 में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया गया. इसके बाद आर्थिक तौर पर पिछड़े समाज की पहचान और उसे आरक्षण का लाभ देने की कोशिश शुरू हुई. इसी के तहत जुलाई 2006 में मेजर जनरल रिटायर्ड एसआर सिन्हा की अध्यक्षता में EBC कमीशन बनाया गया. इसका काम EBC यानी आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग की पहचान करने और उनकी दशा देखकर सिफारिश करने का था. सिन्हा कमीशन ने 2010 में दी गई अपनी रिपोर्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बारे में जानकारी दी लेकिन तत्कालीन सरकार इसे दबा ले गई. इस पर कोई चर्चा तक नहीं हुई.
सिन्हा कमीशन की रिपोर्ट
-टैक्स भरने तक की कमाई ना कर पाने वाले सवर्णों को OBC की तरह से देखना चाहिए.
-5 से 6 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें SC-ST की तरह आरक्षण मिलना चाहिए.
-आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस वर्ग को आरक्षण सहित 14 सिफारिशें की थी.
-खास तौर पर सवर्ण जातियों के लिए नौकरी-कॉलेज में आरक्षण देने की सिफारिश थी.
-आरक्षण न पाने वाले आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग की आबादी करीब 17% है.
-आर्थिक पिछड़ों में 18 फीसदी ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं.
-सवर्ण जातियों में करीब 6 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिनके पास कोई ज़मीन तक नहीं है.
-करीब 65 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिनके पास एक हेक्टेयर से भी कम ज़मीन है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दलित और आदिवासी जनसंख्या के बराबर ऐसी सवर्ण आबादी है, जो गरीबी रेखा से नीचे है. ऐसे में अगर इन आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए मोदी सरकार का यह फैसला देश के एक बड़े तबके को साधने में सहयोग कर सकता है, जो 2019 चुनाव के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

 

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