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एमपीः आया राम, गया राम, दल बदल से जनादेश मुंह के बल

एमपीः आया राम, गया राम, दल बदल से जनादेश मुंह के बल

" 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में डॉ . आंबेडकर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद दोनों ने स्पष्ट चेता दिया था कि हम चाहे कितना ही अच्छा संविधान बना दें

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
” 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में डॉ . आंबेडकर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद दोनों ने स्पष्ट चेता दिया था कि हम चाहे कितना ही अच्छा संविधान बना दें, यदि संविधान के पालन का दायित्व निभानेवाले अच्छे नहीं हुए, तो संविधान भी अच्छा साबित नहीं होगा. “

विजय शंकर पांडेय

फिलहाल यक्ष प्रश्न तो यह है कि कमलनाथ सरकार बचेगी या नहीं? मगर यह सरदर्द इस मुल्क के किसी आम व्यक्ति का नहीं हो सकता. इसकी फिक्र में दुबली हो वे पार्टियां या उनके विधायक जिनकी सरकार बनेगी या बिगड़ेगी. सत्तारुढ़ दल और मुख्य विपक्षी पार्टी दोनों इसके लिए कमर कस कर तैयार भी हैं. कोई विधायकों को गुरुग्राम भेज रहा है तो कोई जयपुर. इसका निहितार्थ यह भी है कि इन पार्टियों को खुद अपने विधायकों पर भरोसा नहीं रह गया है. अब इस तरह के ड्रामें आम बात हैं. मगर मार्के की बात तो यह है कि जिन विधायकों पर उनकी पार्टी के आलाकमान तनिक भी भरोसा नहीं कर रहे हैं उन पर उन्हें चुनने वाले मतदाता कैसे भरोसा करें? और क्यों करें? मतदाता सिर्फ विधायक ही नहीं चुनते हैं. प्रकारांतर में वे ही सरकार या यूं कह लीजिए पार्टी को भी चुनते हैं. अगर वह विधायक या सांसद उस पार्टी के साथ अपने कमिटमेंट नहीं निभा पाया तो क्या गारंटी है जनता के किए वादे को पूरा करेगा? खरीद फरोख्त या हॉर्स ट्रेडिंग जैसे शब्दों को अब नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत नहीं है. यह तो प्रमाणित तथ्य है कि हमारे देश में कानून बनाने वालों से कहीं ज्यादे मेधावी कानून तोड़ने वाले होते हैं.

लूपहोल के चलते कानून बेअसर

निर्भया के गुनहगारों की फांसी पर लटकाने का हुक्म सुप्रीम कोर्ट दे चुका है, मगर किसी न किसी कारणवश अब तक फांसी टालनी पड़ी. यह सब कुछ संविधान और कोर्ट के दायरे में ही हुआ है. आप चाहें तो इसके लिए दोषियों के वकील को कोस सकते हैं. जैसे कि सोशल साइटों पर पानी पी पी कर कोसा भी जा रहा है. मगर इसमें कहां दो राय है कि उन्होंने वही किया जिसकी इजाजत उन्हें देश का कानून देता है. इसीके चलते कई लोगों ने सोशल साइटों पर इसी कानूनी लूपहोल को कारगर ढंग से खत्म करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को भी कहा. बिहार में शराब पर पूर्ण पाबंदी है. मगर जानकार दावा करते हैं कि बिहार में शराब सर्वत्र सहज सुलभ है. बस कीमत चुकाने की हैसियत होनी चाहिए. आए दिन यूपी-बिहार बॉर्डर पर भारी मात्रा में शराब की बरामदगी, तस्करों की गिरफ्तारी और तस्करी रोकने के लिए शासन-प्रशासन का कर्मकांड अखबारों में सुर्खिया बटोरता है. साथ ही शराब की बिहार में सहज उपलब्धता की तस्दीक भी करता है. सीमावर्ती यूपी के जिलों के लोग तो कई बार यहां तक कहते हैं कि कम से कम पाबंदी न रहती तो तस्करी सरीखे आपराधिक गोरखधंधे तो पड़ोसी राज्यों में नहीं बढ़ते. मार्के की बात यह भी है कि ज्यादातर बरामद शराब हरियाणा निर्मित होती है.

विधायकों के पैंतरा बदलने से मतदाताओं को क्या फायदा

यहां इन बातों का जिक्र करने की एक वजह यह भी थी कि हरियाणा ही वह प्रदेश है, जहां सबसे पहले आया राम गया राम का जुमला चलन में आया. बात 1967 की है. गयालाल हरियाणा के पलवल जिले के हसनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे. मात्र नौ घंटे में विधायक गयालाल का तीन बार हृदय परिवर्तन हुआ. वे कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में शामिल हो गए. इसके बाद फिर कांग्रेस में घर वापसी किए. कुछ ही देर बाद फिर जनता पार्टी में चले गए. बताया जाता है कि जब तक वे कांग्रेस में वापस नहीं लौटे अपना अभियान जारी रखे. तत्कालीन वरिष्ठ कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह जब गयालाल को साथ लेकर चंडीगढ़ में प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किए तो बताए कि गया राम अब आया राम है. 1980 में तो हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने पूरी टीम के साथ कांग्रेस में शामिल होकर इतिहास ही रच दिया. ऐसे में यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि विधायकों के पैंतरा बदलने से आखिर आम मतदाता के हिस्से में क्या आया? क्योंकि विधायकों के हिस्से में जो कुछ भी आया हो, वह हमारी चिंता का विषय ही नहीं है.

बरबस याद आते हैं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

जब जब ऐसे हालात पैदा होंगे बरबस पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी याद किए जाएंगे. 28 मई, 1996 को लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि पार्लियामेंट में मैंने 40 साल गुजारे हैं. ऐसे क्षण बार-बार आए हैं. सरकारें बनी हैं, बदली हैं. नई सरकारों का गठन हुआ है. लेकिन हर कठिन परिस्थिति में से भारत का लोकतंत्र बलशाली होकर निकला है और मुझे विश्वास है कि इस परीक्षा में से भी बलशाली होकर निकलेगा. पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए नया गठबंधन कर के अगर सत्ता हाथ में आती है तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा. भगवान राम ने कहा था कि मैं मृत्यु से नहीं डरता, डरता हूं तो बदनामी से डरता हूं. वाजपेयी के दौर से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है. ऐसा नहीं है कि इस अंजाम का अंदेशा हमारे संविधान निर्माताओं को नहीं था. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में डॉ . आंबेडकर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद दोनों ने स्पष्ट चेता दिया था कि हम चाहे कितना ही अच्छा संविधान बना दें, यदि संविधान के पालन का दायित्व निभानेवाले अच्छे नहीं हुए, तो संविधान भी अच्छा साबित नहीं होगा. राजनीतिक लाभ और सत्ता के लिए दल-बदल की होड़ हम दशकों से देखते आ रहे हैं. जाहिर है अवसरवादिता व राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देता है. इस प्रवृत्ति के चलते देश में विशेष तौर पर लोकतंत्र के लिए अक्सर एक शर्मनाक स्थिति पैदा हो जाया करती है.

चव्हाण समिति की अनुशंसाएं भी नहीं कस सकीं नकेल

इसी को देखते हुए 1968 में तत्कालीन गृह मंत्री वाईवी चव्हाण की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था. उस समिति ने अनेक अनुशंसाएं की थीं, जिनके आधार पर साल 1973 और 1978 में संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश हुए, मगर इसमें सफलता नहीं मिली.  1968 में दलबदल रोकने के प्रयासों के तहत गठित पहली समिति के अध्यक्ष वाईवी चव्हाण ने तब अपनी रिपोर्ट में कहा था कि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ विधायी या संवैधानिक उपाय तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक कि विभिन्न राजनीतिक दल इनके अनुरूप मूल राजनीतिक नैतिकता की आवश्यकता को स्वीकार न करें, सार्वजनिक जीवन के कुछ औचित्यों और शालीनताओं का पालन स्वीकार न करें और एक दूसरे के प्रति और अंतिम विश्लेषण में इस देश के नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों और कर्तव्यों को स्वीकार न करें. चह्वाण की वह आशंका आज सही साबित हो रही है. अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 91वां सशोधन पारित हुआ. मगर हालात नहीं बदले.

मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की

230 सीटों वाली मध्यप्रदेश विधानसभा में दो सीटें खाली हो जाने के बाद फिलहाल कुल 228 सीटें थी. इसमें कांग्रेस के पास 114 विधायक थे, चार निर्दलीय, दो बसपाइयों और एक सपाई का समर्थन कांग्रेस को प्राप्त था. जबकि भाजपा के पास 107 विधायक हैं. फिलहाल कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफा देने के बाद सियासी गणित बदल गया है. एक तरफ आशंका जताई जा रही है कि ये 22 विधायक भाजपा ज्वाइन कर लेंगे. दूसरी तरफ मध्यप्रदेश कांग्रेस के दिग्गजों का दावा है कि कई भाजपाई विधायक उनके संपर्क में हैं। जाहिर है अब कमलनाथ सरकार बची रहे या गिर जाए, उसकी तकदीर का फैसला आया राम गया राम ही करेंगे. और आया राम गया राम जनमत या जनादेश को कैसे मजाक बना रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. हाल ही में कर्नाटक में इसी तरह की गतिविधियां अपनाई गईं. पहले गोवा, मणिपुर, झारखंड जैसे छोटे राज्यो में यह आम बात थी, मगर अब बड़े राज्य भी इसकी चपेट में हैं. सच्चाई तो यह है कि दलबदल का यह रोग एक राष्ट्रीय व्याधि का रूप धारण कर चुका है, जो हमारे लोकतंत्र के प्राण तत्वों को अंदर ही अंदर खाये जा रहा है.

दल बदल कानून का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा

मामला यही तक सीमित नहीं है.10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा. पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता. लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया. हालांकि पैराग्राफ़ 7 को असंवैधानिक क़रार दे दिया. बीते 21 जनवरी को देश की सबसे बड़ी अदालत ने देश की सर्वोच्च विधायी संस्था यानी संसद को सलाह दी कि उसे संविधान संशोधन करके सदन के अध्यक्षों से दल-बदल कानून के तहत किसी सदस्य (सांसद/विधायक) की सदस्यता खत्म करने या बनाये रखने का विशेषाधिकार वापस लेने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. यानी, दल बदलने वाला सांसद/विधायक सदन की सदस्यता के योग्य रह गया है या नहीं, यह फैसला करने का अधिकार सदन के अध्यक्ष के पास अब नहीं रहना चाहिए. कल्पना कीजिए हालात कितने बदतर हो चुके हैं. क्योंकि सदन के कई अध्यक्षों पर भी राजनीतिक स्वार्थ से प्रभावित होने के आरोप लग चुके हैं. इसी कारण दल बदल कानून का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है. स्वार्थी तत्व कानून की पेचीदगियों का फायदे उठा रहे हैं और खामियाजा आम जनता भुगत रही है.

 


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