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#मोदीसरकार-2: नासूर बनीं समस्याओं से मुक्ति के नाम रहा पहला साल

#मोदीसरकार-2: नासूर बनीं समस्याओं से मुक्ति के नाम रहा पहला साल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला साल 30 मई यानि आज पूरा हो रहा है। पहले साल की पहली छमाही में सरकार का प्रदर्शन देश के लिए बेहद शानदार रहा है। पहले 6 महीने में सरकार ने बिना झुके और डरे देश के लिए नासूर बनी कई समस्याओं का जड़ मूल नाश कर दिया है। दूसरी छमाही में सरकार कोरोना वायरस संक्रमण के मकड़जाल में ऐसा उलझी है कि इसे आगे पीछे कुछ सूझता दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि इस संकट काल में भी सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान को धार देकर निकट भविष्य की रंगत बदलने की शुरुआत कर दी है। इस अभियान में घरेलू उपभोक्ता बाजार में चीन की चमक तोड़ने का भरपूर प्रयास सरकार ने शुरू कर दिया है।
सरकार के पहले साल के पूरा होने के अंतिम दिनों में देश कोरोना वायरस संक्रमण से जूझ रहा है। देश में अब तक करीब डेढ़ लाख संक्रमित लोग सामने आ चुके हैं। मृतकों का आंकड़ा भी 5000 के करीब पहुंचने वाला है। हालांकि, भारत दुनिया के उन अग्रणी देशों में खड़ा है जो कोरोना के खिलाफ मजबूती से लड़ रहे हैं। मानवता पर सबसे बड़े संकट से निपटने में सरकार के प्रयासों का आकलन अगले साल होगा। लेकिन सरकार के पहले साल में कई ऐसे फैसले आए हैं, जो भारतीय इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित होंगे। हालांकि इस दौरान अंदरूनी राजनीति के कारण सरकार के सामने काफी मुश्किलें भी खड़ी हुई लेकिन देश के लिए दूरगामी असर डालने वाले इन फैसलों पर झुकने से सरकार ने इंकार कर राजनीतिक दृढ़ता का प्रदर्शन किया है।
मोदी सरकार का पहला कार्यकाल नोटबंदी, जीएसटी और पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक रणनीति समेत तमाम ऐसे फैसलों के लिए जाना जाता है, जिन्हें पिछली सरकारें अंजाम तक नहीं पहुंचा सकी थी। दूसरे कार्यकाल में ज्यादा भारी बहुमत के साथ वापसी करने वाली मोदी सरकार में आते ही तमाम ऐसे विषयों को उठाया जो देश के लिए परिवर्तनकारी या युगांतकारी कहे जा सकते हैं।
5 अगस्त 2019 को संसद के पटल पर। देश के लिए नासूर बन चुकी कश्मीर समस्या की जड़ अनुच्छेद 370 और 351 को एक झटके भी इतिहास का हिस्सा। सरकार ने बना दिया। कश्मीर की विशेष स्थिति को लेकर वहां के नेताओं को इतना भरोसा था कि उन्होंने मोदी सरकार को। 370 और 35a को हटाने की सीधी चुनौती तक दे डाली थी। चुनौती बड़ी भी थी और इसके लिए संविधान संशोधन भी जरूरी था। संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन को पास कराने के लिए सहयोगी दलों को एकजुट रखने के साथ ही विपक्षी पार्टियों को भी साधने की चुनौती थी।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कसौटी से संशोधन को सफलतापूर्वक सरकार ने पार कर लिया। साथ ही सरकार ने उन आशंकाओं को भी झूठा साबित किया कि इससे कश्मीर में हिंसा बढ़ेगी और हालात बेकाबू हो जाएंगे। सरकार को इसके लिए कश्मीर में थोड़े सख्त कदम भी उठाने पड़े। वैश्विक कूटनीति के मोर्चे पर भी पाकिस्तानी दुष्प्रचार को सरकार ने नाकाम कर डाला।
अयोध्या राम मंदिर विवाद का मुद्दा वैसे तो सुप्रीम कोर्ट के जरिए हल हुआ है लेकिन इसके लिए मोदी सरकार की पहले कार्यकाल में दिखाई गई रणनीतिक चतुर्य और कोर्ट में शीघ्र सुनवाई के लिए किए गए प्रयास से इनकार नहीं किया जा सकता है। सरकार को हालांकि इसका सीधा श्रेय देना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन सांप्रदायिक विभाजन का आधार बना दिए गए इस मुद्दे पर अदालत के फैसले को जिस शांत और संजीदगी से देश ने स्वीकार किया निश्चित रूप से उसका श्रेय सरकार को.मिलता है। सामाजिक और धार्मिक नेताओं को भरोसे में लेकर पहले ही फैसले को स्वीकार करने के लिए जनमानस को तैयार सरकार ने ही किया।
फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर और मस्जिद के लिए अयोध्या से दूर 5 एकड़ जमीन स्वीकृत नहीं करने का दावा कर कुछ लोगों ने अयोध्या विवाद को जिंदा रखने की कोशिश जरूर की, लेकिन वह नाकाम रहे।
1985 में शाहबानो मामले में भारत की प्रगति चेतना को दबाने की भूल का सुधार भी 2019 में सरकार ने संभव कर दिखाया। पहले ही कार्यकाल में अध्यादेश के जरिए तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त करने का संकल्प सरकार ने दिखाया था। लेकिन संसद से पारित होकर कानून बनने के बाद जिस तरह से मुस्लिम समाज ने इसे स्वीकार किया उससे यह साफ हो गया कि मुस्लिम समाज भी भारत की प्रगतिशील चेतना का हिस्सा है।
हालांकि, सीएए और एनपीआर के मामले में ऐसा नहीं हुआ। सीएए कानून पारित होने के बाद देशभर में हिंसक आंदोलन मुस्लिम समाज की ओर से शुरू किया गया। शाहीनबाग में धरने पर बैठी महिलाओं से निपटने में सरकार पूरी तरह लाचार दिखी। सीएए का भले ही भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं रहा। लेकिन विपक्षी नेताओं के लगातार भड़काऊ बयानों का असर यह हुआ की दुनिया भर में भारत की मुस्लिम विरोधी छवि.बनाने की भरसक कोशिश की गई।
देश की सुरक्षा पर भी इससे आंच पड़ी। हालांकि, सरकार वैचारिक मुद्दों पर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। सीएए पर विरोधी प्रदर्शनों का चरम दिल्ली में हुए दंगों पर भी दिखाई पड़ा। दंगे तो काबू हो गए, लेकिन इससे दिलों में एक टीस जरूर उभर आई।
रक्षा मोर्चे पर भी सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इनमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति वर्षों से लंबित साध पूरी होने जैसी है। पिछली सरकार में वन रैंक वन पेंशन विषय का समाधान हुआ था। आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए अस्त्र शस्त्रों का भारत में निजी क्षेत्र के सहयोग से उत्पादन, ऑर्डिनेंस फैक्ट्री को व्यावसायिक दक्षता का स्वरूप देना, आधुनिकतम युद्धक विमान राफेल की उपलब्धता और पूर्णता भारत में निर्मित युद्ध विमान तेजस का वायु सेना में कमीशन.राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से सराहनीय काम माने जा सकते हैं।

 


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