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मुद्दाः अब शिव सेना के हिन्दुत्व और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा कौन करेगा?

मुद्दाः अब शिव सेना के हिन्दुत्व और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा कौन करेगा?
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन और सत्ता में भरपूर भागीदारी से शिव सेना ने 56 विधायकों के बूते महाराष्ट्र के शासन पर मातोश्री का कब्जा कर दिखाया है. विधानसभा चुनाव परिणामों को ठेंगा दिखाते और भाजपाई रणनीतिकारों के दंभ को चकनाचूर करते हुए शिव सेना ने पहली बार ठाकरे परिवार को मुख्यमंत्री का पद सौंप दिया है. महाराष्ट्र की राजनीति में यह पहली बार हुआ है कि कभी सांसदों और विधायकों को मंत्रिपद का प्रसाद बांटने वाला ठाकरे परिवार खुद दूसरों की मर्जी का गुलाम बन गया है. यही नहीं, शिवसेना के लिए अपने उन मतदाताओं को समझाना भी आसान नहीं होगा जो उसे भाजपा से भी ज्यादा कट्टर हिन्दुत्ववादी पार्टी मानते हुए पिछले कई दशकों से साथ खड़े थे. हालांकि, कांग्रेस और एनसीपी के उन धर्मनिरपेक्षता वादी दावों को भी इससे चोट पहुंचेगी. वजह, मुंबई के मुसलमान गठबंधन की नींव पड़ते ही यह कहकर विरोध करने लगे थे कि वह जिस शिव सेना के खिलाफ कांग्रेस को वोट देते रहे हैं, अब उसी के समर्थन से कांग्रेस सरकार का हिस्सा बन चुकी है.
विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद पद, लालच और सत्ता की मोह ने सभी पार्टियों को नंगा कर दिया. समर्थक किसी की भी जीत-हार के जश्न में बहक कर बड़बोलापन दिखा सकते हैं या चेहरे लटकाए दिख सकते हैं लेकिन पिछले सप्ताहभर के अंदर जो हुआ उसकी परिकल्पना और लेखन में मुंबइया फिल्मों के लेखक भी पसीना छोड़ देते लेकिन अब यह भारतीय राजनीति के इतिहास का हिस्सा बन चुका है. भाजपा नेता देवेंद्र फणनवीस दूसरी पारी में सिर्फ 80 घंटे के मुख्यमंत्री का तमगा पीठ पर चस्पा कर गद्दी गंवा चुके हैं. फमनवीस की गद्दी जाने में अजीत पवार, आधुनिक राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी-अपनी साख पर खरोंच लगवा चुके हैं. इस पूरी उठापटक में यदि कोई दमदार बनकर उभरा है तो वह हैं शरद पवार.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद शुक्ल कहते हैं कि शरद पवार ने एक ही दांव से कई बड़बोले चेहरों को चित कर दिया है. इसमें अमित शाह और पीएम मोदी भी शामिल हैं. परंतु, महाराष्ट्र में दिखा शरद पवार का दांव राष्ट्रीय राजनीति में सर्वाधिक मुसीबतें सोनिया गांधी परिवार के लिए खड़ी करने वाला है. वह कहते हैं कि यह शरद पवार ही थे जिन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर उनके सामने से प्रधानमंत्री पद की कुर्सी छीन ली थी. नए दांव से अब शरद पवार राष्ट्रीय राजनीति में लंगड़ी दिख रही विपक्ष के लिए नया लड़ाका बनकर उभर सकते हैं. विपक्ष के नेता पवार को सामने कर मोदी-शाह की जोड़ी को महाराष्ट्र से बाहर भी चोट पहुंचाने के लिए एकत्रित हो सकते हैं.
संजीत सिंह कहते हैं कि महाराष्ट्र की कुर्सी की छीनाझपटी में भाजपा भले ही असफल साबित हुई लेकिन इस असफलता में भी वह विजेता बनकर उभरी है. यह विजय उसे विचारधारा के स्तर पर मिली है. भाजपा ने शिवसेना से हिंदूत्व का मुद्दा पूरी तरह से छीन लिया है. वह कहते हैं कि जब से बालासाहेब ठाकरे ने यह स्वीकार किया था कि “हां हमारे शिवसैनिकों ने बाबरी तोड़ी है” तभी से शिवसेना को भाजपा की अपेक्षा अधिक प्रखर हिंदूवादी पार्टी समझा जाना लगा था. हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक शिवसेना की इस प्रखरता से प्यार करने लगे थे. लेकिन वह लोग जो शिवसेना को प्रखर हिंदूवादी दल मानते थे, इस घटनाक्रम से उनको धक्का लगा है.
एक और बात मुंबई में शिव सैनिकों और अल्पसंख्यकों के बीच हमेशा से 36 का संबंध रहा है. सोनिया गांधी की कांग्रेस के लिए भी बाला साहेब ठाकरे अछूत जैसे हो चुके थे. यह अलग बात है कि ठाकरे परिवार को आगे बढ़ाने में कांग्रेस का ही योगदान रहा है. यह सवाल आम हो गया है कि शिव सेना के कट्टर हिन्दुत्व की रक्षा क्या कांग्रेस करेगी या कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा शिव सैनिक करेंगे? यह देखना रोचक होगा कि विपरीत धाराओं वाले दो दलों का सत्ता मिलन भाजपा की राह में कितने कांटे और लगा सकता है. यही नहीं, क्या शरद पवार कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय राजनीति में चुभन पैदा करेंगे या मैदान खाली छोड़ देंगे?

 


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