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#LokSabhaElection: तार तार हो रहा गांधी के पंचायती राज का सपना

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
महराजगंज के ब्लाक में कमीशन के पैसे को लेकर बीडीओ और ग्राम प्रधान आमने सामने

अशोक कुमार पांडेय

यूपी के महराजगंज जिले में फरेंदा ब्लाक की घटना से यह सिद्ध होता है कि महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तकों, भाषणों तथा लेखों में जिस पंचायती राज की रूप रेखा का सपना देखा था, उसे ब्लाकों के हुक्मरान चूर चूर कर रहे हैं। विकास खंड ग्राम पंचायतों के विकास के माध्यम है जो गांव के प्रधानों तथा क्षेत्र पंचायत सदस्यों के जरिए गांव के विकास को आयाम देते हैं। पहले गांव के विकास के लिए आज के जितना धन नहीं मुहैया होते थे लेकिन ग्राम प्रधान का अधिकार न्यायाधीश के समतुल्य होता था। धीरे धीरे ग्राम प्रधानों के यह अधिकार छिन गए। बावजूद इसके गांव के विकास का वह एक धुरी बना रहा। जैसे जैसे गांव के विकास का पैसा आता गया वैसे वैसे गांव में भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया। भ्रष्टाचार के पैसे को लेकर यूपी के कई ब्लाकों में बीडीओ व ग्राम प्रधानों के बीच तकरार बढ़ता गया। इस कड़ी में मार पीट और कत्ल के खूनी उदाहरण भी मौजूद हैं।
कमोवेश हाल ही घटित फरेंदा ब्लाक का मामला भी कुछ ऐसा ही है। शुरूआत कुछ क्षेत्र पंचायत सदस्यों द्वारा ब्लाक के बीडीओ प्रदुमन दूबे से मार पीट से हुई। इस मामले में आरोपित क्षेत्र पंचायत सदस्यों का आरोप है कि वे बीडीओ के पास वे अपने अपने गांव के विकास के बारे में जानकारी करने गए थे। इस पर बीडीओ ने सीधे कमीशन की बात की। इसे लेकर उनसे मामूली झड़प हुई थी जिसे उन्होंने तिल का ताड़ बनाकर हम लोगों पर मारपीट सहित अन्य संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया।
बहरहाल मामूली झड़प अथवा मारपीट की घटना ने तब तूल पकड़ लिया जब बीडीओ सीधे ब्लाक प्रमुख राम प्रकाश सिंह से भिड़ गए। उनके एक रिश्तेदार जो सफाई कर्मचारी हैं, के खिलाफ कार्रवाई कर उनसे पंगा ले लिया। इतना ही नहीं बीडीओ दूबे ने जिले पर डीएम की अध्यक्षता में चल रही मीटिंग में अपने साथ मारपीट की घटना में अपने ही सहयोगी एडीओ पंचायत गुलाब पाठक की शिकायत डीएम से कर दी। डीएम अमरनाथ उपाध्याय ने भरी मीटिंग में गुलाब पाठक को पुलिस के हवाले कर दिया। रात भर एडीओ पंचायत को थाने में बैठाए जाने के बाद सुबह बिना किसी कार्रवाई के छोड़ा गया।
अब इस सवाल का जवाब कौन देगा कि बिना किसी गुनाह के गूलाब पाठक के 24 घंटे से अधिक समय तक मानसिक उत्पीड़न का जवाबदेह कौन है? इधर बीडीओ के भ्रष्टाचार के खिलाफ ब्लाक ग्राम प्रधान संघ के अध्यक्ष सुरेमन यादव ने दर्जन भर प्रधानों के हस्ताक्षर से बीडीओ के खिलाफ एक शिकाययती पत्र एसडीीएम का दे दिया। हैरत की बात है कि एसडीएम ने बीडीओ के खिलाफ जांच की जगह प्रधान संघ के अध्यक्ष समेत उन ग्राम प्रधानों के खिलाफ ही जांच शुरू कर दी जो बीडीओ के कमीशनखोरी के खिलाफ शिकायत करने की जुर्रत की।
इन सारी घटनाओं और बीडीओ के मनमानी से जिले भर के ग्राम प्रधानों में भारी गुस्सा पनप रहा है जो कभी भी उग्र रूप धारण कर सकता है। फरेंदा ब्लाक ीक घटना को विभिन्न रूपों में देखा जा रहा है। कोई इसे बीडीओ के परंपरागत कमीशनखोरी की दृष्टि से देख रहा है तो कोई इसे राजनीतिक वर्चस्व को लेकर दो बड़े नेताओं के बीच धींगा मुश्ती के रूप में देख रहा है। लेकिन गांधी के पंचायत राज के स्वच्छ स्वरूप् का सपना तो तार तार हुआ ही।
गांधी जी के सपनों को साकार करने की नियत से ही 1947 में पंचायत राज अधिनियम बनाया गया तथा 15 अगस्त 1949 को गांव सभा का गठन किया गया। कहना न होगा आजादी के इतने वर्षों बाद जहां ग्राम प्रचायतों को और मजबूत होना चाहिए वहीं भारत की ग्राम सभाए कमजोर हुई हैं। पंचायतों को कमजोर करने में अमरीकी भ्ूमिका को भी जिम्मेदार माना जाना चाहिए। सामुदायिक विकास याजनाओं के नाम पर 1951-52 में अमेरिका के ही इशारे पर विकास खंडों के गठन की योजना बनी। इसमें विकास खंड अधिकारियों सहित अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति हुई। गांव के विकास का सारा पैसा खंड विकास अधिकारियों के हाथ आने लगा किंतु वे इस पैसे को अपने विकास में खर्च करने लगे। जब इसके विरूद्ध आवाज उठने लगी तो बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में गठित एक समित की रिर्पोट पर 1960,61 में विकास खंड अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए क्षेत्र समिति प्रमुखों की व्यवस्था की गई।
पूर्व में ब्लाक प्रमुखों का चुनाव ग्राम प्रधान करता था लेकिन 1989 में क्षेत्र पंचायत सदस्यों के गठन के बाद ब्लाक प्रमुखों का चुनाव क्षेत्र पंचायत सदस्य करने लगे। इस तरह गांव के विकास की जिम्मेदारी ़ित्रस्तरीय हो गई। इसीलिए इसे त्रिस्तरीय पंचायत का नाम दिया गया। कहा जा सकता है कि जिस उद्येश्य से ब्लाक प्रमुखों का गठन किया गया, वह अपने उद्येश्य में सफल नहीं हो पा रहे हैं। विकास खंड अधिकारी अपने भ्रष्ट मानसिकता से उबर नहीं पा रहे। गांव के पैसे को वे अधिकसे अधिक से विभिन्न माध्यमों से हड़पना ही चाहते हैं। सच कहा जाय तो वे ही ग्राम प्रधानों को भी भ्रष्टाचार की राह दिखाते हैं।

 

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