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लोकसभा चुनाव-2019ः जनता भगवान के हाथ `मजबूत या मजबूर` सरकार का फैसला

लोकसभा चुनाव-2019ः  जनता भगवान के हाथ `मजबूत या मजबूर` सरकार का फैसला
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
लोकसभा चुनाव-2019 घोषित हो चुका है. सत्रहवीं लोकसभा के लिए नए सदस्यों को चुनने का समय आ गया है. देश के लिए मजबूत और विकास के लिए चौकस रहने वाली सरकार चुनने के लिए मतदाता भगवान दिमाग की बत्ती अब जला लें. पिछले चुनावों के वक्त कई बार ऐसे मौके आए हैं जब छोटे-छोटे लाभ के लिए देश के दीर्घकालिक फायदों को जनता ने वोट देने के वक्त बिसरा दिया. नतीजतन पांच साल चलने वाली सरकारों ने मध्यावधि चुनाव में देश को धकेल दिया. इसका असर देश के विकास पर पड़ा. कई राज्यों में मजबूत सरकारों के चयन और मिलीजुली सरकारों के कामकाज के परिणामों से भी इस फर्क को महसूस किया जा सकता है. मजबूत सरकार का मतलब स्पष्ट जनादेश वाली निर्णायक सरकार.
कई दशकों के आंकड़ों से भी यह समझा जा सकता है कि मिलीजुली सरकारें वह नतीजा नहीं दे पातीं जो विकास स्पष्ट बहुमत वाली सरकारें देती आई हैं. स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों में योजनाओं और नीतियों को बनाने से लेकर उनके क्रियान्वयन तक कोई रोड़ा सामने नहीं आता है. मजबूर सरकारों के साथ ऐसा नहीं हो पाता, जिसके कारण आम जनता का कल्याण प्रभावित होता है. योजनाएं लंबित रह जाती हैं. इससे उनकी लागत बढ़ती है और राष्ट्र का विकास अवरुद्ध होता है.

मजबूत सरकार
मजबूत सरकार वह है जिसे जनता स्पष्ट जनादेश देती है. ऐसी सरकार को जनता के हित में उठाने वाले किसी भी कदम में राजनीतिक परेशानी नहीं उठानी पड़ती है. सरकार मुक्त रूप से देश के आर्थिक विकास को तेज करने के लिए हर कदम उठाने को स्वतंत्र होती है. गठबंधन की राजनीति से इतर इसमें सरकार राष्ट्र के विकास पर ध्यान केंद्रित कर पाती है.
अतीत के आईने से
समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के शामिल होने से गठबंधन सरकार के सहज रूप से काम करने की संभावना थोड़ी अधिक होती है. हालांकि, इनमें भी कई अवसरों पर दलीय खींचतान का इतिहास रहा है. केरल और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकारें इसका उदाहरण रही हैं. 1999 की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भी इसमें शामिल किया जा सकता है. इस सरकार में शामिल दलों ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर विकास को गति दी.
गठबंधन के दूसरे हिस्सें में जब किसी दल विशेष या गठबंधन को सत्ता से दूर रखने के लिए असमान विचारों वाली कई राजनीतिक पार्टियां गठजोड़ बनाकर सामने आती हैं तो फौरी तौर पर तो इनमें एकता दिखती है, क्योंकि उस समय उनका लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी दल या नेता को नुकसान पहुंचाना होता है. इस मंसूबे के पूरा होते ही कुछ ही महीनों में ऐसी सरकारें बिखर जाती है. ऐसे में उनमें जनता और देश से जुड़ी बड़ी नीतियों और योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का न समय मिल पाता है और न ही लय.
गठबंधन की गांठ
गठबंधन सरकार में शामिल क्षेत्रीय पार्टियों के अपने स्थानीय हित होते हैं जो व्यापक राष्ट्रीय हित के आड़े खड़े हो जाते हैं. क्षेत्रीय पार्टियों के अपने वोट बैंक को साधने के लिए परस्पर हितों से कमजोर सरकारों के मंसूबे चूर होते देश ने कई बार देखा है. ऐसी सरकारों का जीवनकाल लंबा नहीं चल पाता है. सरकार गिरने पर या तो नेतृत्व बदलता है या फिर चुनाव कराया जाता है. अतीत में इसका असर जनता की कल्याणकारी योजनाओं, देश के लिए विकास परक कार्यों और विदेश में राष्ट्र की मजबूती पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता देखा गया है.
केंद्र का बिखराव
करीब एक चौथाई सदी बाद 2014 में केंद्र सरकार के लिए किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला. हालांकि, इसमें भी चुनाव पूर्व गठबंधन था लेकिन एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलने से कई समस्याओं ने सिर नहीं उठाया. कांग्रेस के रूप में एक दल के आधिपत्य से अधिक प्रतिस्पर्धी बहुदलीय प्रणाली का यह बदलाव किसी एक दल को बहुमत के करीब पहुंचने में बड़ी बाधा रहा है. लिहाजा 1989 के आम चुनाव के बाद तकरीबन लगातार गठबंधन सरकारों का बनना केंद्र का नसीब बन चुका है. ‘कांग्रेस प्रणाली’ में कांग्रेस पार्टी का केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर प्रभुत्व था. 1989 के बाद की नए पार्टी सिस्टम में कांग्रेस भी अन्य खिलाड़ियों की कतार में खड़ी हो गई. तब से सभी सरकारें गठबंधन करके सरकार बनाने पर विवश रहीं. जिन सरकारों ने समान विचारधारा वाले दलों के साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर काम किया, उनमें विकास का फायदा लोगों तक पहुंचा.
राज्यों की प्रवृत्ति
गठबंधन या साझा सरकारें राज्यों की सरकारों में भी बनती आई हैं। एक अध्ययन के मुताबिक 1967 से 1999 के बीच ऐसी 43 गठबंधन सरकारें थीं।
भारत के लिए निर्णायक सरकार की दरकार 
मैकेंजी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का मध्य वर्ग बहुत तेजी से बढ़ रहा है। 2005 में इसका आकार 14 फीसद था, 2015 में यह बढ़कर 29 फीसद हो गया। अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो 2025 तक देश की 44 फीसद आबादी मध्य वर्ग के दायरे में होगी।
राजनीतिक स्थिरता व आर्थिक विकास
आजादी के भारत की अर्थव्यवस्था को सुविधा के लिए दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला 1951-52 से 1990-91 और दूसरा उदारीकरण से अब तक। भारतीय अर्थव्यवस्था के पहले हिस्से के चालीस साल के दौरान जीडीपी 4.2 फीसद सालाना के दर से बढ़ी। प्रति व्यक्ति सालाना आय में दो फीसद इजाफा हुआ। 1969-70 से 1990-91 यानी करीब दो दशक के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 8.2 फीसद वृद्धि हुई। 1980-81 से 1990-91 के दस साल के दौरान केंद्र सरकार का वित्त घाटा औसतन 6.5 फीसद रहा। यही नहीं, उदारीकरण से पहले तक हमारा विदेशी कर्ज जीडीपी का 28.7 फीसद तक रहा।

 

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