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साहित्यः माँ कभी मस्जिद नहीं गई

साहित्यः माँ कभी मस्जिद नहीं गई

अदनान कफ़ील दरवेश

बलिया जिले के गड़वार निवासी जामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली में हिंदी साहित्य में परास्नातक के छात्र युवा कवि अदनान कफील दरवेश को उनकी कविता ‘किबला’ के लिए 2018 में ‘भारत भूषण अग्रवाल’ पुरस्कार के लिए चुना गया। साहित्य जगत में बलिया के लाल के चयन से हर क्षेत्र में खुशी थी। परिवार में खुशी थी। सभी ने एक दूसरे को मिठाइयां खिलाकर खुशी प्रकट किए। उनके पिता डॉ. एहतशाम जाफर जावेद व दादा सिराजुद्दीन साहब ने कहा कि उसे बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। देवस्थली विद्यापीठ से हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में स्नातक की डिग्री हासिल किया।
तीन भाइयों में सबसे छोटे है अदनान। एक भाई दुबई में रहते हैं तथा दूसरा बैंगलोर में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं , बहन अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रही है। इसके पूर्व भी अदनान को ‘डॉ रविशंकर उपाध्याय युवा कवि सम्मान’ मिल चुका है। यह कविता धर्म में स्त्री के योगदान व उपेक्षा को रेखांकित करती है। प्रसिद्ध लेखक अरुण कमल, अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश, पुरुषोत्तम अग्रवाल व अनामिका की जूरी प्रत्येक वर्ष एक सर्वश्रेष्ठ कविता को यह पुरस्कार देती है।
अदनान की यह कविता माँ की दिनचर्या के आत्मीय, सहज चित्र के जरिेए “माँ और उसके जैसी तमाम औरतों” के जीवन-वास्तव को रेखांकित करती है। अपने रोजमर्रा के वास्तविक जीवन अनुभव के आधार पर गढ़े गये इस शब्द-चित्र में अदनान आस्था और उसके तंत्र यानि संगठित धर्म के बीच के संबंध की विडंबना को रेखांकित करते हैं।
क़िबला’ इसलामी आस्था में प्रार्थना की दिशा का संकेतक होता है, लेकिन आस्था के तंत्र में ख़ुदा का घर सिर्फ मर्दों की इबादतगाह में बदल जाता है, माँ और उसके जैसी तमाम औरतों का क़िबला मक्के में नहीं रसोईघर में सीमित हो कर रह जाता है। स्त्री-सशक्तिकरण की वास्तविकता को नकारे बिना, सच यही है कि स्त्री के श्रम और सभ्यता-निर्माण में उसके योगदान की पूरी पहचान होने की मंजिल अभी बहुत बहुत दूर है—आस्थातंत्र के साथ ही सामाजिक संरचना की इस समस्या पर भी कविता की निगाह बनी हुई है।अदनान की यह कविता सभ्यता, संस्कृति और धर्म में स्त्री के योगदान को, इसकी उपेक्षा को पुरजोर ढंग से रेखांकित करती है। उनकी अन्य कविताओं में भी आस-पास के जीवन, रोजमर्रा के अनुभवों को प्रभावी शब्द-संयोजन में ढालने की सामर्थ्य दिखती है।
क़िबला
माँ कभी मस्जिद नहीं गई
कम से कम जब से मैं जानता हूँ माँ को
हालाँकि नमाज़ पढ़ने औरतें मस्जिदें नहीं जाया करतीं हमारे यहाँ
क्यूंकि मस्जिद ख़ुदा का घर है और सिर्फ़ मर्दों की इबादतगाह
लेकिन औरतें मिन्नतें-मुरादें मांगने और ताखा भरने मस्जिदें जा सकती थीं
लेकिन माँ कभी नहीं गई
शायद उसके पास मन्नत माँगने के लिए भी समय न रहा हो
या उसकी कोई मन्नत रही ही नहीं कभी
ये कह पाना मेरे लिए बड़ा मुश्किल है
यूँ तो माँ नइहर भी कम ही जा पाती
लेकिन रोज़ देखा है मैंने माँ को
पौ फटने के बाद से ही देर रात तक
उस अँधेरे-करियाये रसोईघर में काम करते हुए
सब कुछ करीने से सईंतते-सम्हारते-लीपते-बुहारते हुए
जहाँ उजाला भी जाने से ख़ासा कतराता था
माँ का रोज़ रसोईघर में काम करना
ठीक वैसा ही था जैसे सूरज का रोज़ निकलना
शायद किसी दिन थका-माँदा सूरज न भी निकलता
फिर भी माँ रसोईघर में सुबह-सुबह ही हाज़िरी लगाती
रोज़ धुएँ के बीच अँगीठी-सी दिन-रात जलती थी माँ
जिसपर पकती थीं गरम रोटियाँ और हमें निवाला नसीब होता
माँ की दुनिया में चिड़ियाँ, पहाड़, नदियाँ
अख़बार और छुट्टियाँ बिलकुल नहीं थे
उसकी दुनिया में चौका-बेलन, सूप, खरल, ओखरी और जाँता थे
जूठन से बजबजाती बाल्टी थी
जली उँगलियाँ थीं, फटी बिवाई थी
उसकी दुनिया में फूल और इत्र की ख़ुश्बू लगभग नदारद थे
बल्कि उसके पास कभी न सूखने वाला टप्-टप् चूता पसीना था
उसकी तेज़ गंध थी
जिससे मैं माँ को अक्सर पहचानता
ख़ाली वक़्तों में माँ चावल बीनती
और गीत गुनगुनाती-
“..लेले अईहS बालम बजरिया से चुनरी”
और हम, “कुच्छु चाहीं, कुच्छु चाहीं…” रटते रहते
और माँ डिब्बे टटोलती
कभी खोवा, कभी गुड़, कभी मलीदा
कभी मेथऊरा, कभी तिलवा और कभी जनेरे की दरी लाकर देती
एक दिन चावल बीनते-बीनते माँ की आँखें पथरा गयीं
ज़मीन पर देर तक काम करते-करते उसके पाँव में गठिया हो गया
माँ फिर भी एक टाँग पर खटती रही
बहनों की रोज़ बढ़ती उम्र से हलकान
दिन में पाँच बार सिर पटकती ख़ुदा के सामने
माँ के लिए दुनिया में क्यों नहीं लिखा गया अब तक कोई मर्सिया, कोई नौहा ?
मेरी माँ का ख़ुदा इतना निर्दयी क्यूँ है ?
माँ के श्रम की क़ीमत कब मिलेगी आख़िर इस दुनिया में ?
मेरी माँ की उम्र क्या कोई सरकार, किसी मुल्क का आईन वापिस कर सकता है ?
मेरी माँ के खोये स्वप्न क्या कोई उसकी आँख में
ठीक उसी जगह फिर रख सकता है जहाँ वे थे ?
माँ यूँ तो कभी मक्का नहीं गई
वो जाना चाहती थी भी या नहीं
ये कभी मैं पूछ नहीं सका
लेकिन मैं इतना भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि
माँ और उसके जैसी तमाम औरतों का क़िबला मक्के में नहीं
रसोईघर में था…
नोटः वागर्थ, मासिक पत्रिका, अंक 266, सितंबर 2017 से
गमछा…
पिता जब कभी शहर को जाते
माँ झट से अलमारी से गमछा निकालकर
पिता के कन्धों पर धर देती
जैसे अपनी शुभकामनाएँ लपेट कर दे रही हो
कि सकुशल घर लौट आना
मुन्हार होने से पहले।
जब माँ अपने यौवन में ही ब्याह कर आई थी पिता के घर
तब भी शायद उसने अपने सारे स्वप्नों को एक गमछे में लपेटकर
पिता को सौंप दिया था
पिता ……..
जो दुनियादारी के कामों में अक्सर चूक जाते
गच्चा खा जाते
कई बार भूल जाते अपना चश्मा
अपनी क़लम
दुकान की चाबी और तमाम चीज़ें
शायद उसी तरह माँ के स्वप्नों की पोटली भी
कहीं खो आए
शहर जाते हुए किसी दिन।
माँ
जिसे मैंने टीवी और फिल्मों में दिखने वाली
पत्नियों की तरह व्यवहार करते हुए कभी नहीं देखा
कभी कुछ खुल कर माँगते-मनवाते नहीं देखा
माँ जो सिर्फ़ माँ ही थी
शायद पिता के लिए भी
कभी न पूछ सकी पिता से कि वे कहाँ उसके
स्वप्नों की पोटली छोड़ आए…
जब एक दिन ट्रेन पकड़ने के लिए घर से निकला
माँ ने मेरे
कन्धों पर भी गमछा डाल दिया
और मैंने सहसा अपने कन्धों पर काफी वज़न महसूस किया
जब स्टेशन पर अकेले किसी कोने में बैठा
ट्रेन का इन्तज़ार कर रहा था
कन्धे पर पड़े गमछे की तरफ मेरी नज़र गई
जिसका मुँह मेरी ही तरह लटका हुआ था
और मैंने महसूस किया माँ के हाथ का दबाव
जो वैसे का वैसा ही अब भी गमछे में लिपटा पड़ा था
माँ का विदा में उठा हाथ याद आया मुझे
और पिता का थका कंधा भी
जो अब गमछे के वज़न से भी अक्सर झुक जाता था…
गमछा जो अब पूरे रास्ते मेरा साथी बनने वाला था
मैंने उसपर हाथ फेरा
और उसे देखकर शुक्रिया अदा करने की मुद्रा में मुस्कुराया.
गाँव से हज़ारों मीलों दूर
इस महानगर में जब कभी बाहर धूप में निकलता हूँ
तो अपने उदास और कड़े दिनों के साथी
अपने गमछे को उठाता हूँ और उसे ओढ़ लेता हूँ
क्यूँकि मुझे यक़ीन है इस गमछे पर
इसके एक-एक रेशे पर
जिसमें मेरा ही नमक जज़्ब है !
और
सच कहूँ तो
एक पुरबिहा के लिए गमछा
महज़ एक कपड़े का टुकड़ा भर ही नहीं है
बल्कि उसके कन्धों पर बर्फ़ की तरह
जमा उसका समय भी है !
—————————————
अचानक
वो अचानक नहीं आता
बता कर ही आता है
क्योंकि उसे मालूम है
कि मुझे
किसी चीज़ का अचानक होना
कोई ख़ास पसन्द नहीं

मुझे
वो सुख
ज़्यादा प्रिय है
जो अपनी
ख़बर पहले भिजवा दे

और दुःख
जो धीरे-धीरे
अन्धकार में उतरते हों
और जब
मैं उससे कहता हूँ —
“..सुनो !
मुझे मृत्यु भी
धीरे-धीरे ही चाहिए..”
तो वो
कई-कई रोज़
मेरे घर नहीं आता
अचानक भी नहीं !
अदनान कफ़ील ‘दरवेश’
जन्म: 30 जुलाई 1994
जन्म स्थान: ग्राम-गड़वार, ज़िला-बलिया, उत्तर प्रदेश
शिक्षा: कंप्यूटर साइंस आनर्स (स्नातक), दिल्ली विश्वविद्यालय
प्रकाशन: हिंदी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं तथा वेब ब्लॉग्स पर प्रकाशित

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