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लद्दाख को अलग राज्य बनाने के लिए लेह में जोरदार प्रदर्शन

लद्दाख को अलग राज्य बनाने के लिए लेह में जोरदार प्रदर्शन
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
जम्मू-कश्मीर से जुड़े और राज्य की विकास योजनाओं से दूर लद्दाख के लिए अब अलग राज्य की मांग उठने लगी है. बुधवार को लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन और क्षेत्र के अन्य संगठनों ने लेह में रैली निकालकर बड़ा प्रदर्शन किया है. स्थानीय लोगों की मांग है कि लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग राज्य घोषित कर केंद्र शासित राज्य की मान्यता दी जाए. वर्तमान में लद्दाख के एकमात्र लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. लद्दाख के लोगों की शिकायत है कि राज्य की योजनाओं में उन्हें उपेक्षित रखा जाता है. वर्तमान में यह क्षेत्रफल के हिसाब से देश का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र है. इसका क्षेत्रफल 1.74 लाख वर्ग किलोमीटर है. 2019 के आम चुनाव में अलग राज्य का मुद्दा गंभीर होता दिख रहा है.

लद्दाख लोकसभा सीट जम्मू और कश्मीर की 6 लोकसभा सीटों में से एक है. यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित है. एलओसी पर स्थित यह लोकसभा क्षेत्र कारगिल युद्ध के बाद राजनीतिक रूप से कमजोर और अस्थिर हो गया था. हिमालय की गोद में बसा यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण विश्व विख्यात है. यहां देश-दुनिया से पर्यटक घूमने आते हैं. यही कारण है कि इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर्यटन है.
सूबे के दो जिलों कारगिल और लेह में यह लोकसभा क्षेत्र फैला हुआ है. यह दोनों जिले जम्मू-कश्मीर के सबसे कम आबादी वाले जिले हैं. इस सीट के अन्तर्गत चार विधानसभा सीट आती है. 2014 के चुनाव में पहली बार इस सीट पर कमल खिला था. बीजेपी के थुपस्तान छेवांग जीते थे. इससे पहले छेवांग, निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 2004 का चुनाव जीते चुके हैं. हालांकि, 15 नवंबर, 2018 को उन्होंने सांसद पद और बीजेपी से इस्तीफा दे दिया था.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
1967 और 1971 का चुनाव कांग्रेस के टिकट पर केजी बकुला जीते थे. कांग्रेस के ही टिकट पर 1977 में पार्वती देवी और 1980 व 1984 में पी. नामग्याल संसद पहुंचे. 1989 का चुनाव निर्दलीय मोहम्मद हसन कमांडर जीतने में कामयाब हुए. 1991 में यहां चुनाव नहीं हुआ. 1996 में तीसरी बार कांग्रेस के टिकट पर पी. नामग्याल चुनाव जीते. इसके बाद इस सीट पर पहली बार नेशनल कांफ्रेंस जीती. 1998 में नेशनल कांफ्रेंस के टिकट पर सैयद हुसैन और 1999 में हसन खान संसद पहुंचे.
2004 में इस सीट से निर्दलीय प्रत्याशी थुपस्तान छेवांग जीते. 2009 में यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई और इस सीट से निर्दलीय प्रत्याशी हसन खान जीतकर दूसरी बार संसद पहुंचे. 2014 में इस सीट से थुपस्तान छेवांग ने वापसी की और बीजेपी के टिकट पर जीतकर वह भी दूसरी बार संसद पहुंच गए.
इस लोकसभा सीट पर मतदाताओं की संख्या 1.66 लाख है. इनमें 86 हजार पुरुष और 80 हजार महिला वोटर हैं. पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां की अधिकांश आबादी आदिवासी और बौद्धिस्ट है. यही कारण है कि 2009 में इस सीट को अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित कर दिया गया था. 2014 में यहां 70 फीसदी मतदान हुआ था.
2014 का जनादेश
लोकसभा चुनाव 2014 में इस सीट पर बीजेपी और निर्दलीय प्रत्याशी में कड़ी टक्कर हुई थी. बीजेपी के थुपस्तान छेवांग ने निर्दलीय प्रत्याशी गुलाम रजा को महज 36 वोटों से हराया था. छेवांग को 31,111 और गुलाम रजा को 31, 075 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर निर्दलीय प्रत्याशी सैयद मोहम्मद काजिम (28, 234 वोट) और चौथे नंबर पर कांग्रेस के सेरिंग सेम्फेल (26, 402 वोट) थे. छेवांग ने नवंबर 2018 में लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था और पार्टी नेतृत्व से असहमति का हवाला देते हुए भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी थी.

 

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