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लाख की खेती लाख की, पर्यावरण की सेहत को भी रखता है तंदुरुस्त

लाख की खेती लाख की, पर्यावरण की सेहत को भी रखता है तंदुरुस्त
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

डॉ. बीके द्विवेदी

उत्तर प्रदेश में लाख की खेती को बढ़ावा देने के लिए बायोवेद शोध संस्थान पिछले कई सालों से प्रयासरत है। लाख की खेती से जहां एक ओर देश के गरीब आयहीन, साधनहीन लोगों को स्वरोजगार के साथ-साथ अतिरिक्त आय होने लगी है , वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक धरोहरों- जल, मिट्टी, वन एवं पर्यावरण का भी संरक्षण स्वतः प्रारम्भ हो गया है। इस काम के लिए लाख की खेती, लाख पोषक वृक्षों की नर्सरी उत्पादन एवं पौधरोपड़ तथा लाख से मूल्यवर्द्धित वस्तुओं के निर्माण हेतु प्रशिक्षण, प्रदर्शन एवं लाख के क्रय-विक्रय का कार्य कई वर्षों से संस्थान कर रहा है। कृषकों द्वारा पैदा होने वाली लाख को खरीद रहा है और लाख से बनी हुई वस्तुओं को भी खरीदने का कार्य करता है। कृषकों द्वारा पैदा की गयी लाख से सीड लैक, सेल लैक, बटन लैक, लैक डाई, एल्यूरिक एसिड, लाख वारनिश आदि अन्य मूल्यवर्द्धित वस्तुओं का निर्माण करा रहा है। उत्तर प्रदेश में ही नहीं मध्यप्रदेश , बिहार, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश आदि में बायोवेद शोध संस्थान द्वारा स्थापित यह प्रथम आधुनिक लाख प्रसंस्करण इकाई है।
लाख क्या है
लाख एक प्राकृतिक राल है जो केरिया लैक्का नामक कीट द्वारा मुख्य रूप से प्रजनन के पश्चात स्राव के फल स्वरूप बनता है। इस कीट को कुछ विशेष वृक्ष की टहनियों पर पालते हैं। लाख कीट अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए एक प्रकार का तरल पदार्थ निकालता है, जो सूखकर कवच बना लेता है और उसी के भीतर कीट जीवित रहता है। इसी कवच को लाख या लाह कहते हैं। यह कीट मोम का भी स्राव करता है इस कीट के रक्त में उपस्थित रंग का भी औद्योगिक महत्व है।
विश्व में लाख के उत्पादन का महत्व
विश्व में भारत लाख उत्पादन का सबसे बड़ा देश है, भारत पूरे विश्व की लाख की मांग का 55-60 प्रतिशत आपूर्ति करता है। भारत में उत्पादित 80 प्रतिशत लाख का निर्यात किया जाता है । भारतीय प्रजाति केरिया लैक्का से उत्पादित भारतीय लाख बहाव, ठंड एवं गरम एल्कोहल में अघुलनशीलता, रंग, सूचकांक, ताप बहुलता, समय, विरंजन, सूचकांक एवं चिकनाई व चमक की दृष्टि से मुख्य लाख उत्पादक देशों जैसे चीन, इंडोनेशिया एवं थाइलैण्ड से प्राप्त लाख कीे तुलना में उत्कृष्ट पायी गयी है ।  भारत में 20 सितम्बर 1924 को रांची में भारतीय लाख अनुसंधान संस्थान की स्थापना अंग्रेजों द्वारा की गयी थी। अप्रैल 1966 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने इसे अपने अनुशासन में लिया। 19 मार्च 2007 को भारतीय लाख अनुसंधान संस्थान का नाम बदलकर भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान कर दिया गया है।
लाख की खेती को पुर्नजीवित करने में बायोवेद की भूमिका
बायोवेद शोध संस्थान ने भारत में लाख का प्रयोग घरेलू वस्तुओं के मूल्य संवर्द्धन में 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने का प्रयास प्रारम्भ किया जिसके अप्रत्याशित लाभ से आम कृषक ही नहीं बल्कि आम आदमी भी इसके गुणों से प्रभावित होने लगा और लाख से मूल्यवर्द्धित वस्तुओं के उपयोग एवं उपभोग पर अधिक बल देने लगा। लाख का एक न्यूनतम निर्धारित मूल्य 400 रुपया प्रति किग्रा की संरक्षा, सुरक्षा एवं जबावदेही से अधिकांश कृषक  इसकी खेती की ओर उन्मुख हो रहे हैं। लाख के दैनिक उपयोग से आयहीन, साधनहीन आम आदमी को न्यूनतम प्रति माह 4500-6000 रुपया की आय की पूरे वर्ष सुनिश्चितता से आत्मविश्वास बढ़ने के कारण इसका उत्पादन दिन दूनी रात चैगुनी गति से बढ़ने लगा है। गांव में अधिकांश बेकार पड़ी वस्तुओं का लाख के संयुक्त प्रयोग मूल्य संवर्द्धन होने के कारण पर्यावरणीय प्रदूषण का खतरा भी समाप्त होने लगा है।
बायोवेद कृषि एवं प्रौद्योगिकी शोध संस्थान से भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अधीन कार्यरत भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान, रांची ने लाख की खेती को बढ़ावा देने एवं लाख से मूल्यवर्द्धित वस्तुओं के बनाने हेतु प्रशिक्षण के लिए एक समझौता किया है। झारखण्ड सरकार के झारक्राफ्ट द्वारा लाख से बने मूल्यवर्द्धित वस्तुओं के क्रय एवं विक्रय हेतु भी एक अनुबन्ध हुआ है।
लाख की खेती से लाभ
1.लाख एवं अन्य अवशिष्ट पदार्थो जैसे- गोबर, मूत्र, सींग, हड्डी, बेकार पड़ी जड़े, लकड़ी, पत्ती के संयुक्त प्रयोग से गांव में विभिन्न कुटीर उद्योगों की स्थापना होगी।
2.लाख से निर्मित जैविक खाद एवं जैव कीटनाशी के प्रयोग से अन्य फसलों, अनाज, दलहन, तिलहन एवं फल-फूल के उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत बढ़ोतरी।
3.जल, जमीन, जंगल का स्थायी एवं टिकाऊ संरक्षण।
4.लाख की खेती को बढ़ावा मिलने से ग्रीन हाऊस गैस के उत्पादन में अप्रत्याशित रोक के कारण अल्प कार्बन जीवन शैली के प्रचलन को बढ़ावा।
5.लाख से निर्मित वस्तुओं के अधिकाधिक प्रयोग से त्वचा रोगों से छुटकारा। स्वस्थ समाज में 40 से 50 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी।
6.कम लागत से अधिक आय देने वाली लाख की खेती के बढ़ावा से देश की जनता का विकास दिन दूना रात चौगुना गति से बढ़ेगा।
7.आम गरीब एवं आदिवासी लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से प्रत्येक परिवार खुशहाल होगा।
8.पेड़ो के न कटने से हरियाली के कारण खुशहाली होगी, वातावरण के शुद्धिकरण के कारण पूरे संसार का ध्यान आकर्षित होगा। एक वृक्ष लगाने का पुण्य दस पुत्रों के समान होता है। एक मनुष्य के जीवन काल में वाँछित आक्सीजन एवं लकड़ी की आवश्यकता की पूर्ति मात्र 3 वृ़क्षों द्वारा होती है। एक वृक्ष 50 वर्ष की अवधि में प्राणवायु (आक्सीजन) -15 लाख रुपया ,  वायु प्रदूषण नियंत्रण-31 लाख रूपये, भूमिक्षरण नियंत्रण 16 लाख रुपये , जल संरक्षण-19लाख, पशु पक्षियों का आश्रय -16.4 लाख एवं लकड़ी, फल, चारा आदि – 3.6 लाख रुपये , इस तरह कुल मिलाकर एक करोड़ एक लाख रुपये का योगदान करता है। इसलिए कोई भी व्यक्ति एक पेड़ लगाकर पुत्रवत उसका पालन व रक्षण कर समाज को एक करोड़ रुपये की धनराशि देकर पुण्य कमा सकता है।
9.यदि कोई भी व्यक्ति लाख से बनी मूल्यवर्द्धित वस्तुओं का प्रयोग अधिक से अधिक करता है तो वह पेड़ों को कटने से रोकता है, कई बेरोजगारों को रोजगार के साथ कम से कम एक टन कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा प्रति वर्ष वातावरण में मिलने से रोकता है। इस तरह प्रयोगात्मक एवं प्रत्यक्ष रूप से पूरे वातावरण को स्वच्छ रखने एवं स्वयं स्वस्थ रहने हेतु अपना योगदान करता है।
10.आयहीन, साधनहीन एवं गरीब लोगों के स्वावलम्बन, क्रय शक्ति बढ़ने के कारण नक्सलवाद, आतंकवाद का समूल नाश होगा और इसके नियंत्रण पर होने वाला खर्च शून्य होगा। अधिकांश लोगों की सम्पन्नता से आपस में भेद-भाव, लड़ाई झगड़ा, द्वेष समाप्त होगा,  जिससे शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, विधायिका के कार्यो में काफी कमी होगी। पूरा देश इस सफल माॅडल का अनुसरण करे तो पूरे देश में खुशहाली बढ़ेगी।
संभव है ये कारोबार
जानवरों के गोबर, मूत्र में लाख के प्रयोग से कई मूल्यवर्धित वस्तुएँ बनाई जा रही हैं। इन वस्तुओं में— गोबर का गमला, लक्ष्मी-गणेश, कलमदान, कूड़ादान, मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती, जैव रसायनों का निर्माण, मोमबत्ती एवं अगरबत्ती स्टैण्ड व पुरस्कार में दी जाने वाली ट्रॉफियों का निर्माण आदि शामिल हैं।
लाख की खेती में अन्य फसलों की अपेक्षा बहुत ही दक्षता एवं समय की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी खेती में बहुत ही आसान प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। यदि लाख की खेती को वैज्ञानिक तरीके अपना कर किया जाये तो यह अधिक आय एवं रोजगार का स्रोत होगा जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के लिये पलायन की समस्या को कम करेगा। लाख पोषक वृक्ष जो कि बहुतायत में बंजर भूमि में उपलब्ध है या ऐसी भूमि पर पोषक वृक्षों को लगाया जा सकता है जो कि खेती के लिये अनुपयुक्त समझी जाती है। लाख की खेती से प्राप्त आय किसानों द्वारा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं एवं अन्य कृषि आगतों को खरीदने में प्रयोग किया जाता है।

(नोटः लेखक बायोवेद कृषि एवं प्रौद्योगिकी शोध संस्थान, प्रयागराज के निदेशक हैं।)

 

 

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