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अक्षय की #केसरी रिलीज, पढ़िए महानतम #सारागढ़ी युद्ध की कहानी जिस पर बनी है ये फिल्म

अक्षय की #केसरी रिलीज, पढ़िए महानतम #सारागढ़ी युद्ध की कहानी जिस पर बनी है ये फिल्म
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
दुनियाभर में हौसले और बहादुरी के साथ लड़े गए सारागढ़ी युद्ध पर आधारित फिल्म केसरी होली के दिन ही सिनेमाघरों में पहुंच गई है. अभिनेता अक्षय कुमार की यह फिल्म दुनियाभर में 4200 स्कीन्स पर एक साथ रिलीज हुई है. इस होली पर प्रशंसकों को अक्की का केसरी अवतार देखने को मिलेगा और यह दर्शकों के लिए एक विशेष उपचार की तरह लग रहा है.
प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक तरण आदर्श ने ट्विटर पर फिल्म से जुड़ी जानकारियां साझा किया है. उन्होंने लिखा: “#केसरी स्क्रीन काउंट … भारत: ३६००, प्रवासी: 600 और दुनिया भर में कुल: 4200 स्क्रीन.” 
अक्षय कुमार की यह फिल्म ब्रिटिश सेना के सिख रेजीमेंट के 21 सिखों और 10 हजार अफगानों के बीच लड़ी गई थी. सारागढ़ी के युद्ध को दुनिया के सबसे महान युद्धों में से एक माना जाता है. इस युद्ध में अफगानी कबीलों ने सारागढ़ी पर कब्जा कर लिया लेकिन रणनीतिक तौर पर ब्रिटिश सेना की जीत मानी जाती है.
अक्षय ने फिल्म में हवलदार ईशर सिंह की भूमिका निभाई है, जिन्होंने अपनी बेटी के सम्मान में अफगानों से लड़ाई लड़ी. ‘केसरी’ में अक्षय और परिणीति चोपड़ा मुख्य भूमिकाओं में हैं. यह पहली बार है जब परिणीति को खिलाडी कुमार के साथ जोड़ा गया है. फिल्म का निर्देशन अनुराग सिंह ने किया है. यह धर्मा प्रोडक्शंस द्वारा निर्मित और गिरीश कोहली और अनुराग सिंह द्वारा लिखित है.

जानिये सारागढ़ी के युद्ध के बारे में

सारगढ़ी युद्ध १२ सितम्बर 1897 को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफगान ओराक्ज़ई जनजातियों के मध्य तिराह अभियान से पहले लड़ा गया. यह उत्तर-पश्चिम फ्रण्टियर प्रान्त (वर्तमान खैबर-पखतुन्खवा, पाकिस्तान में) में हुआ था. ब्रितानी भारतीय सैन्यदल में 36 सैनिक (सिख रेजीमेंट की चौथी बटालियन) थे. इसमें 21 सिख सैनिक थे. इन पर 12000 अफ़्ग़ानों ने हमला किया. सिखों का नेतृत्व कर रहे हवलदार ईशर सिंह ने दुश्मनों की बड़ी संख्या को देखने के बाद भी मैदान से भागने के बजाय मृत्यु पर्यन्त युद्ध करने का निर्णय लिया. इसे सैन्य इतिहास के सबसे महानतम युद्धों में से एक माना जाता है. युद्ध के दो दिन बाद अन्य ब्रिटिश भारतीय सेना द्वारा उस स्थान पर पुनः अधिकार प्राप्त किया गया.

सारागढ़ी यहां है

सारागढ़ी समाना रेंज पर स्थित कोहाट जिले का सीमावर्ती इलाके का एक छोटा सा गाँव है जो वर्तमान पाकिस्तान में है. इस किले को 21 अप्रैल 1894 को ब्रिटिश भारतीय सेना के 36वीं सिख रेजिमेंट के कर्नल जे कुक की कमान में बनाया गया था. अगस्त 1897 में लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन हैटन की कमान में 36वीं सिख रेजिमेंट की पांच कंपनियों को ब्रिटिश-इंडिया (वर्तमान में खैबर पख्तूनख्वा) के उत्तरपश्चिमी सीमा पर भेजा गया था और समाना हिल्स, कुराग, संगर, सहटॉप धर और सारागढ़ी में उनकी तैनाती की गई.
सैन्य तैनाती से ब्रिटिश इस अस्थिर और अशांत क्षेत्र पर नियंत्रण पाने में आंशिक रूप से तो सफल रहे, लेकिन वहाँ के मूल निवासी पश्तूनों ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों पर हमला करना जारी रखा. इसलिए ब्रिटिश राज ने किलों की एक श्रृंखला को मरम्मत करके अपनी स्थिति मजबूत करनी चाही. ये वो किले थे जो मूल रूप से सिख शासक महाराजा रंजीत सिंह द्वारा बनाए गए थे. इनमें से दो किले फोर्ट लॉकहार्ट (हिंदूकुश पहाड़ों की समाना रेंज पर) और फोर्ट गुलिस्तान (सुलेमान रेंज) ऐसे थे जो एक-दूसरे से कुछ मील की दूरी पर स्थित थे. पहाड़ी इलाका होने के कारण इन किलों को एक-दूसरे से दिखाई नहीं देने के कारण सारागढ़ी को इन किलों के मध्य में बनाया गया था और इसका प्रयोग एक हेलियोग्राफ़िक संचार पोस्ट के रूप में किया जाने लगा. सारागढ़ी पोस्ट को एक चट्टानी पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया, जिसमें एक छोटा सा ब्लॉक हाउस, किले की दीवार और एक सिग्नलिंग टॉवर का निर्माण किया गया.

विद्रोह और युद्ध

1897 में अफगानों द्वारा एक विद्रोह शुरू हुआ और 27 अगस्त से 11 सितंबर के बीच पश्तूनों द्वारा किलों को कब्ज़ा करने के कई बड़े प्रयासों को 36वीं सिख रेजिमेंट ने विफल कर दिया. 1897 में विद्रोह और आकस्मिक गतिविधियां बढ़ गई थीं.  3 तथा 9 सितंबर को अफरीदी आदिवासियों ने अफगानों के साथ मिल करके फोर्ट गुलिस्तान पर हमला किया. दोनों हमलों को नाकाम कर दिया गया था. पश्तूनों और अफगानों नेतृत्व गुल बादशाह कर रहा था.

१९६० में ११वीं सिख रेजिमेंट के सदस्य (विकीपीडिया से लिया गया चित्र)
सारागढ़ी की लड़ाई के विवरण को काफी सटीक माना जाता है, क्योंकि सिपाही गुरमुख सिंह ने युद्ध के दौरान फोर्ट लॉकहार्ट को हेलियोग्राफ़ संकेतों के रूप में किले में होने वाली घटनाओं का संकेत दिया था. गुरमुख सिंह हेलीकॉफ से फोर्ट लॉकहार्ट के संकेतों के अनुसार यथार्थता से ज्ञात माना जाता है.

सारगढ़ी युद्ध का विवरण 

  • सुबह ९:०० बजे के लगभग १०,००० अफगानों के सारागढ़ी पोस्ट पर पहुँचने का संकेत दिया.
  • गुरमुख सिंह के अनुसार लोकहार्ट किले में कर्नल हौथटन को सूचना मिली कि उन पर हमला हुआ है.
  • कर्नल हौथटन के अनुसार सारागढ़ी में तुरन्त सहायता नहीं भेज सकते थे.
  • सारागढ़ी में तैनात सैनिकों ने अन्तिम साँस तक लड़ने का निर्णय लिया.
  • भगवान सिंह सबसे पहले घायल हुये और लाल सिंह गम्भीर रूप से घायल हुए.
  • सैनिक लाल सिंह और जिवा सिंह कथित तौर पर भगवान सिंह के शरीर को पोस्ट के अन्दर लेकर आए।
  • अफगानों ने घेरे की दीवार के एक भाग को तोड़ दिया.
  • कर्नल हौथटन ने संकेत दिया कि उसके अनुमानों के अनुसार सारागढ़ी पर 10000 से 14000 पश्तों ने हमला किया है.
  • अफगान सेना का अधिनायक सिख सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए लुभाता रहा.
  • कथित तौर पर मुख्य द्वार को खोलने के लिए दो बार प्रयास किया गया लेकिन असफल रहे.
  • उसके बाद दीवार टूट गयी.
  • उसके बाद आमने-सामने की भयंकर लड़ाई हुई.
  • असाधारण बहादुरी दिखाते हुये ईशर सिंह ने अपने सैनिकों को पीछे की तरफ हटने का आदेश दिया जिससे लड़ाई को जारी रखा जा सके. हालाँकि इसमें बाकी सभी सैनिक अन्दर की तरफ चले गये लेकिन पश्तों के साथ एक सैनिक मारा गया.
  • गुरमुख सिंह, जो कर्नल हौथटन को युद्ध समाचारों से अवगत करा रहे थे, अन्तिम सिख रक्षक थे. ऐसा माना जाता है कि उन्होंने 20 अफगान सैनिकों को मारा. पश्तों ने गुरमुख को मारने के लिए आग के गोलों से हमला किया. मरते दम तक वह लगातार “बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” बोलते रहे.

युद्ध में 4800 लोग मारे गए

सारागढ़ी को तबाह करने के पश्चात अफगानों ने गुलिस्तां किले पर निगाहें डाली, लेकिन इसमें उन्होंने काफी देर कर दी. 13-14 सितम्बर की रात्रि में अतिरिक्त सेना वहाँ पहुँच गयी और किले पर पुनः कब्जा कर लिया. इसके बाद पश्तों ने स्वीकार किया कि 21 सिखों के साथ युद्ध में उनके 180 सैनिक मारे गए और बहुत से सैनिक घायल हुए लेकिन बचाव दल के वहाँ पहुँचने पर युद्ध वाली जगह पर 600 शव मिले. बाद में सिख रेजीमेंट ने १४ सितम्बर को बड़ी मात्रा में तोपखानों से आग लगाकर किले पर दुबारा कब्जा कर लिया, जिसके कारण जनहानि हो सकती है. इस युद्ध में कुल 4800 लोग मारे गए थे.

सारागढ़ी दिवस

सारागढ़ी दिवस एक सिख सैन्य स्मारक दिवस है जो हर साल 12 सितंबर को सारागढ़ी की लड़ाई की याद में मनाया जाता है. सिख सैन्यकर्मी और नागरिक 12 सितंबर को हर साल दुनिया भर में लड़ाई की याद करते हैं. सिख रेजिमेंट की सभी टुकड़ियां हर साल सारागढ़ी दिवस को रेजिमेंटल बैटल ऑनर्स डे के रूप में मनाती हैं. विदेशों में भी भारतियों खासकर सिखों द्वारा सारागढ़ी दिवस बड़े गर्व से मनाया जाता है.

 

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