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दलित-मुस्लिम राजनीति के अगुवा थे जोगेंद्रनाथ मंडल, स्वार्थ में ऐसे बिखर गए ख्वाब

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

रणविजय सिंह

भारत में लोकसभा चुनाव-2019 के सिर्फ छठें और सातवें चरण बचे हैं लेकिन इन दो चरणों में भी दलित मतों को लेकर भी भारी खींचतान चल रही है. उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी की सक्रियता, वामपंथी पार्टियों की ओर से दलितों को उकसाने और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के दलित-मुस्लिम गठजोड़ ने दलित राजनीति को फिर उभार दिया है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेता भी दलितों के मतों को लेकर पुरजोर कोशिशों में लगे हैं. इसी बीच अभिनेत्री पायल रोहतगी ने ट्वीट कर लिखा है कि भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर को गुलाम भारत के दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल का किस्सा सुनाया. जोगेंद्र नाथ मंडल भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त मोहम्मद अली जिन्ना के साथ खड़े थे. वह वर्तमान पाकिस्तान के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और पाकिस्तान के पहले कानून व श्रम मंत्री भी थे लेकिन उन्हें मुस्लिम नेताओं ने इस कदर तंग किया कि वह बंटवारे के वक्त पाकिस्तान जाने के फैसले पर पश्चाताप और गुमनामी का जीवन व्यतीत करते हुए पश्चिम बंगाल में 5 अक्टूबर 1968 को अंतिम सांस तक रहे.

पाकिस्तान की खोली थी कलई

जोगेन्द्र नाथ मंडल पाकिस्तान के प्रमुख संस्थापक पिता में से एक थे और देश के पहले कानून मंत्री और श्रमिक के रूप में सेवा करने वाले विधायक थे और यह राष्ट्रमंडल और कश्मीर मामलों के दूसरे मंत्री भी थे. अनुसूचित जातियों (दलितों) के नेता के रूप में जोगेंद्रनाथ ने मुस्लिम लीग के साथ पाकिस्तान के लिए अपनी मांग को उठाया था. वह उम्मीद करते थे कि अनुसूचित जातियों को इसका लाभ मिलेगा. वह अपनी दलित राजनीति की लालसा को लेकर पाकिस्तान के पहले कैबिनेट में शामिल हो गए थे. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा सौंप दिया. पाकिस्तान के विभाजन के कुछ सालों बाद वह भारत लौट आए और पाकिस्तानी प्रशासन के कथित हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह का चिट्ठा खोला लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

भारत लौटें (1950)

1950 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान  को अपना इस्तीफा देने के बाद मंडल वापस भारत लौट आए. इस्तीफे में भी उन्होंने पाकिस्तानी प्रशासन के विरोधी हिंदू पूर्वाग्रह का हवाला दिया गया था. उन्होंने अपने इस्तीफे पत्र में सामाजिक अन्याय और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार से संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया.
बताते हैं कि पाकिस्तान बनने पर लाखों दलित पाकिस्तान चले गए जिन्हें विश्वास था कि मुसलमान उनका साथ देंगे, उन्हें अपनाएंगे. परंतु उनके साथ क्या हुआ, इसे जानना जरूरी है. दिल दहला देने वाली इस सच्चाई को वहां के कानून मंत्री ने ही लिखा था. दलित-मुस्लिम भाईचारे के पैरोकार जोगेंद्र नाथ मंडल का मानना था कि मुसलमानों ने उन्हें धोखा दिया.

कांग्रेस से चिढ़कर जिन्ना से जुड़े

सन 1937 में जिला काउन्सिल और इसी वर्ष उन्हें बंगाल लेजिस्लेटिव काउन्सिल का सदस्य चुना गया. सन 1939-40 तक वे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के करीब आये मगर, जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि कांग्रेस के एजेंडे में उनके अपने समाज के लिए ज्यादा कुछ करने की इच्छा नहीं है. इसके बाद वो मुस्लिम लीग से जुड़ गए. 1946 में चुनाव के ब्रिटिशराज में अंतिम सरकार बनी तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना जो कि मंत्री के तौर पर सरकार में काम करेंगे. मुस्लिम लीग ने जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम भेजा. जिन्ना को जोगेंद्र नाथ मंडल पर भरोसा था और वे मुहम्मद अली जिन्ना के काफी करीबी थे.

मंडल की ताकत से असम का सयलहेट पाकिस्तान में गया

माना जाता है कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने ही अपनी ताकत से असम के सयलहेट को पाकिस्तान में मिला दिया था. 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट को जनमत संग्रह से यह तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का. उस इलाके में हिंदू-मुस्लिम की संख्या बराबर थी. जिन्ना ने इलाके में मंडल को भेजा. मंडल ने वहां दलितों का मत पाकिस्तान के पक्ष में झुका दिया. इसके बाद सयलहेट पाकिस्तान का हिस्सा बना जो आज बांग्लादेश में हैं.

दलित-मुस्लिम एकता का ख्वाब टूटा

दूसरी ओर पाकिस्तान निर्माण के कुछ वक्त बाद ही गैर मुस्लिमों को निशाना बनाया जाने लगा. हिन्दुओं के साथ लूटमार, बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगीं. मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी. बल्कि जोगेंद्र नाथ मंडल को मंत्रिमंडल से बाहर करने के लिए उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा. मंडल को इस बात का एहसास हुआ जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था वो उनके रहने लायक नहीं है. मंडल बहुत आहत हुए. उन्हें विश्वास था कि पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा लेकिन करीब दो सालों में ही दलित-मुस्लिम एकता का मंडल का ख्बाब टूट गया.

मंडल का खत खड़े कर देगा रोंगटे

मंडल ने अपने खत में मुस्लिम लीग से जुड़ने और अपने इस्तीफे की वजह को स्पष्ट किया, जिसके कुछ अंश यहां है. मंडल ने अपने खत में लिखा, ‘बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी. दोनों ही पिछड़े, मछुआरे, अशिक्षित थे. मुझे आश्वस्त किया गया था कि लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जाएंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा. हम मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहादर्य बढ़ेगा. इन्हीं कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया. 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिए मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया, जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए.  कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत हजारों हिन्दुओं की हत्याएं हुईं. बड़ी संख्या में हिन्दुओं को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया गया. हिंदू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया. इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया. मैंने हिन्दुओं के भयानक दुःख देखे, जिनसे दुखी हूँ. फिरभी, मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा.
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. मैंने ख्वाजा नजीममुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगों को शामिल करने का अनुरोध किया. उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा किया, लेकिन इसे टाल दिया गया जिससे मैं बहुत हताश हुआ.
मंडल ने अपने खत में पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं जिक्र किया. उन्होंने अपने आप से पूछा, ‘क्या मै इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था.” तथ्य की बात यह है पाकिस्तान में न कोई न्याय है, न कानून का राज इसीलिए हिंदू चिंतित हैं.
जोगेंद्र नाथ मंडल ने अंत में लिखा, ‘पाकिस्तान की पूर्ण तस्वीर तथा उस निर्दयी एवं कठोर अन्याय को एक तरफ रखते हुए मेरा अपना तजुर्बा भी कुछ कम दुखदायी, पीड़ादायक नहीं है. आपने अपने प्रधानमंत्री और संसदीय पार्टी के पद का उपयोग करते हुए मुझसे एक वक्तव्य जारी करवाया था, जो मैंने 8 सितम्बर को दिया था. आप जानतें हैं कि मेरी ऐसी मंशा नहीं थी कि मैं ऐसे असत्य और असत्य से भी बुरे अर्धसत्य भरा वक्तव्य जारी करूं. जब तक मै मंत्री के रूप में आपके साथ और आपके नेतृत्व में काम कर रहा था, मेरे लिये आपके आग्रह को ठुकरा देना मुमकिन नहीं था. अब मैं इससे ज्यादा झूठे दिखावे तथा असत्य के बोझ को अपनी अंतरात्मा पर नहीं लाद सकता.

भारत में राजनीतिक कैरियर (1937-1947)

मंडल ने 1937 के भारतीय प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया. उन्होंने बखरागंज उत्तर पूर्व ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र से बंगाल विधान सभा में एक सीट पर चुनाव लड़ा. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला समिति के अध्यक्ष सरकल कुमार दत्ता को पराजित किया. सरकल (कांग्रेस) और स्वदेशी नेता अश्विनी कुमार दत्ता के भतीजे थे.
सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस दोनों ने मंडल को काफी प्रभावित किया था. 1940 में कांग्रेस से निष्कासित होने पर मंडल मुस्लिम लीग के साथ जुड़ गए, जो उस वक्त एकमात्र अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पार्टी थी. साथ ही मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के मंत्रिमंडल में एक मंत्री बने.
मंडल और दलितों के दूसरे बड़े नेता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जाति संघ की बंगाल शाखा की स्थापना की, जो स्वयं राजनीतिक सत्ता की इच्छा रखते थे. प्रांत की राजनीति में दलित और मुस्लिम लोगों का वर्चस्व था. जब 1946 में देश के कई हिस्सों में दंगे फैल गए तो मंडल ने पूर्वी बंगाल के चारों ओर यात्रा की ताकि दलितों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग न लेने से रोका जा सके. उन्होंने तर्क दिया कि मुस्लिम लीग के साथ अपने विवाद में कांग्रेस द्वारा उन्हें प्यादे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.

पाकिस्तान में राजनीतिक कैरियर (1947-1950)

15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद मंडल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने. साथ ही कानून और श्रम के लिए नए राज्य के पहले मंत्री के रूप में सेवा करने पर सहमत हो गए. सरकार के उच्चतम स्थान वाले हिंदू सदस्य के रूप में 1947 से 1950 तक वह पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची के बंदरगाह शहर में रहते थे.

बंगाल में जन्मे थे मंडल

जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म बंगाल के बरीसल जिले के मइसकड़ी में हुआ था. वो एक पिछड़ी जाति से आते थे. इनकी माता का नाम संध्या और पिताजी का नाम रामदयाल मंडल था. छह भाई-बहन में सबसे छोटे जोगेन्द्रनाथ मंडल ने सन 1924 में इंटर और सन 1929 में बीए पास कर पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पहले ढाका और बाद में कलकत्ता विश्व विद्यालय से पूरी की थी.
स्रोतः विकीपीडिया

 

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