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कवि कैलाश गौतम की जयंतीः मैं वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझ पर वार करो

कवि कैलाश गौतम की जयंतीः मैं वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझ पर वार करो
11 अक्टूबर 2019 की तारीख थी , प्रयागराज स्थान था और अवसर था सुप्रसिद्ध कवि कैलाश गौतम की 75वीं जयंती के उपलक्ष्य में श्रृंखलाबद्ध सात कार्यक्रमों की प्रथम पुष्पांजलि का। इस अवसर पर कवि सम्मेलन के साथ ही सम्मान समारोह ” अंधेरे उजाले ” के तहत न्यायमूर्ति पंकज मित्तल को कैलाश गौतम सहित्यनुरागी सम्मान और डॉ. प्रकाश खेतान को कैलाश गौतम सृजन सम्मान से नवाजा गया। इस अवसर पर अन्य कवियों की उपस्थिति में लखनऊ से आए वरिष्ठ कवि डॉ. नरेश कात्यायन के मुख से रावण द्वारा राम से प्रश्न पूछना मन को छू लेने वाला था। हम आपके लिए भी प्रस्तुत करते हैं-
इस बार राम ने जैसे ही दशकंधर को ललकारा है ।
तरकश  से तीखे तीर लिए काँधे से धनुष उतारा है ॥
वैसे ही छुब्ध दशानन का आकुल विद्रोही मन डोला ।\
वाणी में विस्फोटक भरके वह राघव से ऐसे बोला ।
रावण पर बाण चलाने का हे राम उपाय नहीं करना ।
हे दशरथ नंदन सावधान ऐसा अन्याय नहीं करना ॥
तुम मर्यादापुरुषोत्तम हो करुनानिधान कहलाते हो ।
दुष्टों का करते हो विनाश धरती से पाप  मिटाते हो ॥
दुनियाका सारा पाप ताप क्या मुझ में ही दिखलाया है ।
केवल मुझ पर ही बार बार तुमने धनु बाण उठाया है ॥
पहले सागर उस पार मिली अब सागर के इस पार मिली ।
अपराधकिया था एक बार पर सज़ा हज़ारों बार मिली ॥
मैं  रक्ष संस्कृति का स्वामी मैंने तो अपना काम किया ।
है आर्य पुत्र नाहक मुझको इस दुनिया ने बदनाम किया ॥
तुम नायक हो मैं खलनायक बेशक मुझ पर तुम वार करो ।
भारत के क्रूर दरिंदों का लेकिन पहले संहार  करो ॥
माना मैंने धर साधु वेष  वैदेही का अपहरण  किया ।
लेकिन मर्यादा के विरुद्ध मैंने न कभी आचरण किया ॥
सीता अशोक वाटिका रही मेरा इतना ही नाता था ।
मेरी पटरानी बन जाओ इतना कह कर समझाता था ॥
मैं  राक्षस हूँ मेरा स्वभाव वैदेही को धमकाता था ।
पर जब जाता था पास कभी पत्नी को लेकर जाता था ॥
जिसको अपराध कहोगे तुम ऐसा तो कुछ भी हुआ नहीं ।
लंका में मैंने सीता को इक उंगली से भी छुआ नहीं ॥
लेकिन जिस भारत को अपनी तुम मातृभूमि   बतलाते हो ।
जिसके आगे तुम सोने की मेरी लंका ठुकराते हो ॥
उस भारत में हे राघवेन्द्र पापों की नदी बह रही है ।
जिसको तुम माता कहते हो वह कितने दुःख सह रही है  ॥
हैं नहीं सुरक्षित अबलायें हे राम तुम्हारे भारत में ।
नित लूटी  जातीं बालाएं हे राम तुम्हारे भारत में ॥
कर दिया कलंकित साधु  वेष भारत के नमक हरामों ने ,
अपराधी क्रूर कामियों ने गुरमीतों  आशारामों ने।
नगरों से लेकर गावों तक बेख़ौफ़ भेड़िये घूम रहे ।
साम्राज्य वासना का फैला दुर्दांत नशे में झूम रहे ॥
मर्यादा की सब सीमाएं हे राघव टूटी जाती हैं ।
कितनी दामिनियाँ निर्भय हो सड़कों पर लूटी जाती हैं ॥
हे राघवेन्द्र इन दुष्टों पर क्यों धनु टंकार नहीं करते ।
इन पापी अधम पिशाचों पर क्यों बाण प्रहार नहीं करते ॥
अस्मत के क्रूर लुटेरों के सीने  पर  प्रथम प्रहार करो ।
मैं वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझ पर वार करो ॥
है याद तुम्हे जब लक्ष्मण के सीने में शक्ति समाई थी ।
मेरे  सुषेण ने ही  जाकर तब उनकी जान बचाई थी ॥
क्या राज वैद्य ने दुश्मन को उपचार उचित था दिया नहीं ।
यह लंका की मर्यादा थी बदले में कुछ भी लिया नहीं ॥
भारत के कितने महावैद्य जो विशेषज्ञ कहलाते हैं ।
हे राम जानते हो कैसे वह सेवा धर्म  निभाते हैं ।।
भूखे नंगे बीमारों से पहले धन जमा कराते हैं ।
तब जाकर यह सेवाधर्मी रोगी को हाथ लगाते हैं ॥
जो इन अपराधी वैद्यों की कुल फीस नहीं भर पाते हैं ।
कितने ही शल्य चिकित्सा की मेजों पर ही मर जाते हैं ॥
यह नहीं चिकित्सक हैं राघव यह सारे क्रूर लुटेरे हैं ।
हे दशरथनंदन यह पापी सारे भारत को घेरे हैं।
पहले इन राजरोगियों की बीमारी का  उपचार करो ।
मैं वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझ पर वार करो ॥
मैं भी लंका का राजा था दुनिया का वैभव ले आया ।
अपनी लंका को सोने से मैंने दुनिया में चमकाया ॥
लंका का कोई व्यक्ति कभी हे राम भूख से मरा नहीं ।
मैंने लंका का धन लेकर दूसरे देश में भरा नहीं ॥
भारत के धन कुबेर पैसा भारत में पचा नहीं पाए ।
तुम तो भारत के रक्षक थे अपना धन बचा नहीं पाए ॥
चोरी से और दलाली से जनता का शोषण करते हैं ।
यह नए लुटेरे भारत का पैसा विदेश में भरते हैं ॥
यह उजले उजले अपराधी ईमान धरम सब भूल गए ।
इनके कारण कितने किसान बेबस  फांसी पर झूल गए ॥
सत्ता इनके कब्ज़े में है इस लिए शान से ऐंठे हैं ।
नीचे से लेकर ऊपर तक यह भ्रष्टाचारी  बैठे हैं ॥
पहले इन भ्रष्ट पापियों का हे राघवेन्द्र संहार करो ।
मैं वक्ष खोल कर खडा राम तब मेरे ऊपर वार करो ॥
मेरी लंका के वाशिंदे लंका पर मर मिट जाते थे ।
लेकिन दुश्मन तक कभी नहीं घर की ख़बरें पहुचाते थे।।
लंका के लाखों वीरों ने रण में खुद को बलिदान किया।
मै अच्छा था या बुरा किन्तु,मेरी जिद का सम्मान किया।।
हाँ एक विभीषण था जिसने दुश्मन को गले लगाया था।
मैंने उस लंका द्रोही को लंका से दूर भगाया था।।
भारत के वीर सिपाही जो सीमा पर हैं तैनात खड़े।
हिम से,वर्षा से,गर्मी से, दुश्मन से हो बेख़ौफ़ लड़े।।
उन बांके वीर सैनिको ने,तन-मन-धन सब कुर्बान किया।
भारत माता की रक्षा में प्राणों का भी बलिदान किया।।
लेकिन कुछ देशद्रोहियों ने दुश्मन से हाथ मिलाया है।
आतंकवादियों को घर में इन नीचो ने ठहराया है।।
हे राघवेन्द्र हत्यारों ने ऐसा षड़यंत्र रचाया है।
घर-घर विस्फोट बमों के हैं,आतंकवाद का साया है।।
इनके कारन निर्दोषों का सड़कों पर लहू बह रहा है।
वह चीख-चीख कर कौशलेश,तुमसे बस यही कह रहा है।।
यह लाशों के हैं व्यापारी हैं,पहले इनका संहार करो।
मै वक्ष खोल कर खड़ा राम,तब बेशक मुझ पर वार करो।।
रावण से भी सौगुना बड़े,यह पापी,अत्याचारी हैं।
लज्जा के धन के अपहर्ता,अपराधी,भ्रष्टाचारी हैं।।
फिर से मेरा वध  करने का संकल्प ह्रदय में पाल लिया।
तुमने बस रावण को देखा,अपना धनुबाण संभाल लिया।।
आखिर कब तक बस मेरा ही,राघव संहार करोगे तुम।
कर चुके मेरा वध एक बार,और कितनी बार करोगे तुम।।
तुम मर्यादा के पालक हो,कैसे मर्यादा तोड़ोगे।
एक ही पाप की सज़ा मुझे,सौ  बार भला कैसे दोगे।।
यदि कुछ कर सकते हो राघव,तो बाण शरासन पर धारो।
भारत के क्रूर दरिंदो को गिन-गिन करके पहले मारो।।
हे कमलनयन हो सावधान,अवसर है नयन भिगोने का।
कुछ लोगो को विश्वास नहीं,हे राम तुम्हारे होने का।।
अपने भारत को एकबार कुछ ऐसा कर दिखलाओ तुम।
अपने धनु की टंकारो से,अपनी पहचान कराओ तुम।।
भारत माता की पीड़ा का उपचार नहीं होने वाला।
मेरा वध करके,भारत का उद्धार नहीं होने वाला।।
पहले नीचों से भारत की धरती का हल्का भार करो।
मै वक्ष खोल कर खड़ा हुआ राघव तब मुझ पर वार करो।।

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