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जौहर विश्वविद्यालयः अफ़साना दो मुहम्म्दों का

जौहर विश्वविद्यालयः अफ़साना दो मुहम्म्दों का

बजाय रामपुर के यदि लाहौर में जौहर यूनिवर्सिटी बनती तो अधिक वाजिब होता

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

 के. विक्रम राव

बजाय रामपुर के यदि लाहौर में जौहर यूनिवर्सिटी बनती तो अधिक वाजिब होता. पंजाब की इस राजधानी में आठ दशक बीते, पाकिस्तान की माँग (1940) का प्रस्ताव बेगम अमजदी बानो जौहर ने पेश किया था. मुस्लिम लीग के सदर मोहम्मद अल्ली जिन्ना ने हाबिया हाल (इस्लामिया कॉलेज) मंच से लीग के सत्ताइसवें अधिवेशन में कार्य समिति की इस एकमात्र महिला सदस्या बेगम अमजदी बानो जौहर का मुक्त कंठ से गुणगान किया था.
जिन्ना ने कहा था : “अगर हर मुस्लिम महिला बेगम जौहर जैसे जांबाज हो जाय तो पृथक इस्लामी कौम का बनना अटल हो जायेगा.” अगले सप्ताह (23 मार्च) बेगम जौहर के तक़रीर की अस्सीवीं वार्षिकी होगी. उन्हीं दिनों लाहौर का एक यादगार ग्रुप फोटो भी साया हुआ था. बेगम उसमें काला बुर्का (चेहरा ढका हुआ) ओढ़े थीं. मुखड़ा नामालूम रहा. उन्होंने तमन्ना व्यक्त की थी कि लाल किले पर धारीदार वाले बर्तानवी परचम की जगह लहराते चाँद-सितारे वाले झण्डे को सलाम करें. उनकी नातिन (गुलनार की बेटी) अजीज फातिमा काजी, जो पाकिस्तान हिजरत कर गई थीं, ने कराची में न्यूज़रील को बताया था कि उनके ससुराल भोपाल में कैसे हिन्दू-बहुल ग्वालियर से गुजरती ट्रेनों में मुस्लिम युवतियों से बलात्कार और फिर उनकी हत्या होती रहीं. स्टेशन पर वे लाशें देखती रहीं. बाद में जौहर का पूरा खानदान इस्लामी पाकिस्तान में बस गया था. मगर, मुहम्मद अली जौहर की अंतिम इच्छा अधूरी रह गई. वे चाहते थे कि दारुल हर्ब (शत्रु भूमि ) में वे दफन न हों. हिंदुस्तान तब गुलाम मुल्क था. पाकिस्तान उनके इंतकाल के सोलह साल बाद बना था. हालाँकि, बैतूल मुकद्दस (येरुशलम) में उनकी मजार बनी है. मगर अरब फिलिस्तीन का यह भूभाग अब यहूदी इजराइल का हो गया है. दारुल हर्ब है.
मुहम्मद अली जौहर की भूमिका हिंदुस्तान की जंगे आजादी में विवादास्पद रही. विरोधाभासी भी. वे मुस्लिम लीग के 1906 में ढाका अधिवेशन से संस्थापक नेता रहे. सीमान्त प्रान्त के पठान थे जिनके कुटुम्बीजन नजीबाबाद (रामपुर राज) में बस गये थे. खास बात यह रही कि जब प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की (ओटोमन सल्तनत) के सैंतीसवें तथा अंतिम सम्राट शाहबाबा मोहम्मद चतुर्थ वाहिदुद्दीन को परास्त कर ब्रिटेन ने अपदस्थ कर दिया था तो आलमी इस्लाम के इस खलीफा को पुनर्स्थापित करने हेतु भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आन्दोलन (1921) चलाया था. तब मौलाना जौहर उसके पुरोधा थे. महात्मा गाँधी ने मुसलमानों के समर्थन में कांग्रेसियों को जोड़ा था. पहली बार 1857 के बाद हिन्दू-मुस्लिम एकता प्रगाढ़ बनी, मगर मुस्तफा कमाल ने सुल्तान को हटा कर तुर्की को सेक्युलर गणराज्य घोषित कर दिया. खिलाफत आन्दोलन मर गया. तभी से वे कट्टर जिन्नावादी मुस्लिम लीग के झन्डा बरदार बन गए.
उसी दौर में एक घटना हुई थी जिसने हिन्दुओं को पीड़ित किया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के काकीनाडा (आन्ध्र) में हुए प्रतिनिधि अधिवेशन (1923) में नवनिर्वाचित अध्यक्ष मौलाना जौहर अचानक खड़े हुए और संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगंबर पलुस्कर को वन्दे मातरम के पारम्परिक गायन को तत्काल बंद करने का आदेश दिया. पलुस्कर ने इनकार किया और कहा यह (राष्ट्र गीत) गाना कांग्रेस अधिवेशन की परम्परा है. मौलाना का विरोध था कि इस राष्ट्रगीत में बुतपरस्ती की बदबू है. अतः एक इस्लामी होने के नाते मौलाना वाक्-आउट कर गए. तबसे कांग्रेसियों ने भी वन्दे मातरम के केवल प्रथम छंद तक ही अपने को सीमित कर दिया. मुस्लिम तुष्टीकरण की यह इब्तिदा थी. मौलाना साहब की इस्लामी कट्टरता का निकृष्टतम नमूना पेश आया जब उन्होंने बापू के विषय में कहा: “एक जेना (व्यभिचारी) मुसलमान के मजहबी नियमों को मैं पसंद करुँगा, बनिस्बत हिन्दू गाँधी के धार्मिक सिद्धांतों को.” (नेहरू : स्टैनली वालपोर्ट, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1996, पृष्ठ 66). अर्थात् इस्लामिस्ट अपरिवर्तनीय हैं. ठस ही रहेंगे. गंगा-जमुनी सोच भद्दा मजाक है, फरेब है.
अब तनिक उल्लेख हो मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखे, उत्तर प्रदेश के करदाताओं के कष्टार्जित धन से निर्मित रामपुर-स्थित विश्वविद्यालय का. जौहर विश्वविद्यालय को शासकीय मान्यता भी बड़ी आपाधापी में मिली. चंद दिनों के लिए कार्यवाहक राज्यपाल बनकर मोहम्मद अजीज कुरैशी भोपाली लखनऊ के राजभवन में डबल ड्यूटी पर भेजे गए. तब उत्तराखंड के राज्यपाल पद पर भी आसीन थे. शपथ के तुरंत बाद पहला काम उन्होंने किया कि आजम खान की इस जागीर पर स्वामित्व की मुहर लगा दी. उन्हें आजीवन कुलाधिपति नामित कर दिया. अनुदान राशि को दस लाख से बढ़ा कर दो करोड़ रूपये कर दिया. बेइन्तिहा भूमि, जिससे किसानों को बेदखल किया गया था, भी आबंटित कर दिया गया. अनियमितता की जांच प्रक्रिया की शर्तें इतनी कठोर बना दी गयीं कि विधान सभा और परिषद् के दो तिहाई के बजाय तीन चौथाई मतों से, केवल हाईकोर्ट जज, न कि किसी शासकीय अधिकारी द्वारा, ही मुमकिन होगा| अर्थात् जांच नामुमकिन कर दी गई. दो राज्यपालों (दोनों कांग्रेस द्वारा नियुक्त) टीवी राजेश्वर तथा बनवारीलाल जोशी ने सात सालों तक इस मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय बिल 2007 को स्वीकृति नहीं दी. मगर पहाड़ से मैदान (लखनऊ) पर उतरे मो. अजीज कुरैशी ने मो. आजम खान पर चन्द लमहों में ही इनायत (11 जुलाई 2014 ) बख्श दी. अवैध जमीन कब्जों और अनियमितता को लेकर जौहर विश्वविद्यालय के खिलाफ यूपी सरकार की कार्रवाई विभिन्न स्तरों पर चल रही है.
कार्यकाल समाप्त होने पर लखनऊ से कुरैशी अपने शहर भोपाल गए. वहाँ कमलनाथ सरकार ने उन्हें मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की चेयरमैनी (24 जनवरी 2020) से नवाजा. सप्ताहभर बाद वे लखनऊ के घंटाघर तशरीफ़ लाये और नागरिकता कानून को अवांछनीय करार दिया. भाषण तीखा था. गोमतीनगर (लखनऊ) पुलिस ने (4 फरवरी 2020 को) उनके विरुद्ध दण्ड संहिता के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली. अब शायद भोपाल में उनकी कांग्रेस पार्टी का तख्ता पलटा तो कुरैशी की चेयरमैनी भी जा सकती है. भाजपायी निर्मम होते हैं. हों भी क्यों ना? कुरैशी के उद्गार थे कि चुनाव जीतने हेतु नरेंद्र मोदी ने पुलवामा त्रासदी करवाई. वे बोले कि: “बयालीस शहीद सैनिकों के भस्म से मोदी राजतिलक नहीं कर पाएंगे” (12 अप्रेल 2019). पर वोटरों ने इसे ख़ारिज कर दिया. भाजपा के 285 थे, अब 303 सांसद हो गये.
अतः मसला है कि एक जिन्नावादी, कट्टर मुस्लिम लीगी और अलहदा इस्लामी राष्ट्र के शिल्पी मौलाना मोहम्मद अली जौहर का भारत में सम्मान हो? अथवा पाकिस्तान में? खान मोहम्मद आजम खान (जेल में हैं) के पास जवाब होगा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कर चुके हैं- E-mail –[email protected])

 


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