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जम्मू-कश्मीर में नहीं चलेगा जमात-ए-इस्लामी का सिक्का, 70 ठिकाने होंगे सील

जम्मू-कश्मीर में नहीं चलेगा जमात-ए-इस्लामी का सिक्का, 70 ठिकाने होंगे सील
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
जम्मू एवं कश्मीर में आतंकियों के सुरक्षित पनाहगाह के रूप में पहचाने गए जमात-ए-इस्लामी के ठिकाने अब संचालित नहीं होंगे. पिछले तीन दिनों से लगातार चल रही छापेमारी में करीब 70 ऐसे ठिकानों की पहचान की गई है जिनका इस्तेमाल जमात-ए-इस्लामी करता रहा है. जमात-ए-इस्लामी को हिज्बुल मुजाहिद्दीन का संस्थापक माना जाता है. आरोप है कि जमात देश के अंदर और बाहर से विभिन्न स्रोतों से धन इकट्ठा कर हिज्बुल के आतंकियों की फंडिंग करने का काम करता है.
टेरर फंडिंग की जांच कर रही एनआईए की अगुवाई में कश्मीर घाटी में आतंकियों को बड़े स्तर पर फंडिंग करने वाले जमात-ए-इस्लामी पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई चल रही है. शुक्रवार को छह सदस्य गिरफ्तार किए गए थे. बताया जा रहा है कि अब तक 20 से ज्यादा लोग हिरासत में हैं. इनमें से कइयों की पहचान पत्थरबाजों को जुटाने वालों के रूप में भी की गई है. जमात-ए-इस्लामी पर शिकंजा कसने के लिए उसके कई नेताओं को कश्मीर पुलिस ने हिरासत में ले लिया है.
यही नहीं, जम्मू और कश्मीर में उसकी जुटाई गई करीब 52 करोड़ रुपये से ज्‍यादा की संपत्‍त‍ि सील करने के लिए 70 से ज्‍यादा परिसरों की पहचान की गई है. संपत्‍त‍ि सील करने की कार्रवाई UAPA प्रॉपर्टी और एसेट्स प्रोविजन के तहत की जा रही है. जमात-ए-इस्लामी की कई संस्‍थाओं की पहचान की गई है, जिसमें कई शैक्षणिक संस्‍थाएं, दफ्तर, स्‍कूल भी शामिल हैं. बताते हैं कि जमात कट्टरपंथियों को भड़काने, पत्थरबाजों और आतंकियों को धन मुहैया कराने, धार्मिक शिक्षा की आड़ में आतंक की पाठशाला चलाने का काम करता है.
इससे पहले भी दो बार जमात-ए-इस्लामी संगठन को देशविरोधी गतिविधियों के कारण प्रतिबंधित किया जा चुका है. पहली बार जम्मू- कश्मीर सरकार ने इस संगठन को 1975 में दो साल के लिए प्रतिबंधित किया था. दूसरी बार केंद्र सरकार ने 1990 में इसे प्रतिबंधित किया था जो दिसंबर1993 तक जारी रहा था.
पता चला  कि जमात-ए-इस्लामी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकियों को कश्मीर घाटी में बड़े स्तर पर फंडिंग करता था. ऐसी तमाम जानकारियों के बाद गृह मंत्रालय ने कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक केबाद कड़ा कदम उठाते हुए जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया है. ऐसी चर्चाएं भी हैं कि सरकार पाकिस्तान समर्थक हुर्रियत पर भी प्रतिबंध लगा सकती है.
दरअसल जमात-ए-इस्लामी जम्मू कश्मीर का मिलिटेंट विंग है. यह जम्मू कश्मीर में अलगाववादी विचारधारा और आतंकवादी मानसिकता के प्रसार के लिए प्रमुख जिम्मेदार संगठन है. आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन को जमात-ए-इस्लामी ने ही खड़ा किया है. हिज्बुल मुजाहिदीन को इस संगठन ने हर तरह की सहायता की.
पाकिस्तान के संरक्षण में फल-फूल रहे हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकियों को ट्रेंड करना, फंडिंग करना, शरण देने समेत आने-जाने की सुविधा मुहैया कराना जैसे काम जमात-ए-इस्लामी संगठन कर रहा था.
पुलवामा आतंकी हमले के बाद एनआईए की जांच कई दिशाओं में चल रही है. एनआईए ने सीआरपीएफ काफिले पर हमले में इस्तेमाल की गई गाड़ी के अंतिम मालिक और अब जैश का आतंकी बने युवक के घर भी छापेमारी कर चुकी है. 26 फरवरी को पाकिस्तान स्थित आतंकी शिविरों पर एयर स्ट्राइक के साथ ही सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीर घाटी के कई जिलों में भी छापे मारी शुरू कर दी थी.
हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठन ही नहीं, ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे अलगाववादी और उग्रवादी विचारधाराओं के संगठन को खड़ा करने में भी जमात-ए-इस्लामी का हाथ माना जाता है. इस संगठन को जमात-ए-इस्लामी जम्मू- कश्मीर ने पाकिस्तान के समर्थन से स्थापित किया है.

 

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