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वह #VIKRAMSarabhai ही थे जिन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान को दिलाई अंतरराष्ट्रीय ख्याति

वह #VIKRAMSarabhai ही थे जिन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान को दिलाई अंतरराष्ट्रीय ख्याति
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
भारत में गगनयान को चांद पर पहुंचाने की राह में है तो इसे दुनियाभर में ख्याति दिलाने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान की शुरुआत का श्रेय महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई को ही है. यह जगप्रसिद्ध है कि वह विक्रम साराभाई ही थे जिन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थान दिलाया, लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने अन्य क्षेत्रों जैसे वस्त्र, भेषज, आणविक ऊर्जा, इलेक्ट्रानिक्स और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी बराबर का योगदान किया.
डॉ॰ साराभाई एक महान संस्थान निर्माता थे. उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी संख्या में संस्थान स्थापित करने में अपना सहयोग दिया. साराभाई ने सबसे पहले अहमदाबाद वस्त्र उद्योग की अनुसंधान एसोसिएशन (एटीआईआरए) के गठन में अपना सहयोग प्रदान किया. यह कार्य उन्होंने कैम्ब्रिज से कॉस्मिक रे भौतिकी में डाक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त कर लौटने के तत्काल बाद हाथ में लिया. हालांकि, उन्होंने वस्त्र प्रौद्योगिकी में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था. एटीआईआरए का गठन भारत में वस्त्र उद्योग के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. उस समय कपड़े की अधिकांश मिलों में गुणवत्ता नियंत्रण की कोई तकनीक नहीं थी. डॉ॰ साराभाई द्वारा स्थापित कुछ सर्वाधिक जानी-मानी संस्थाओं के नाम इस प्रकार हैं- भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद; भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद; सामुदायिक विज्ञान केन्द्र; अहमदाबाद, दर्पण अकादमी फॉर परफार्मिंग आट्र्स, अहमदाबाद; विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र, तिरूवनंतपुरम; स्पेस एप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद; फास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) कलपक्कम; वैरीएबल एनर्जी साईक्लोट्रोन प्रोजक्ट, कोलकाता; भारतीय इलेक्ट्रानिक निगम लिमिटेड (ईसीआईएल) हैदराबाद और भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यूसीआईएल) जादुगुडा, बिहार.
विक्रम अंबालाल साराभाई 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद के एक समृद्ध जैन परिवार में जन्मे थे. 86 वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे और 40 संस्थान खोले. साराभाई को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी क्षेत्र में 1966 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था. गुजरात से ही प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद विक्रम साराभाई 1937 में कैम्ब्रिज (इंग्लैंड) चले गए जहां 1940 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपोज डिग्री प्राप्त की. द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर वे भारत लौट आए और बंगलौर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में नौकरी करने लगे जहां वह सीवी रमण की देखरेख में कॉसमिक रेज़ पर अनुसंधान करने लगे. उन्होंने अपना पहला अनुसंधान लेख टाइम डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ कास्मिक रेज़ न्न भारतीय विज्ञान अकादमी की कार्यविवरणिका में प्रकाशित किया.
डॉ॰ साराभाई एक स्वप्नद्रष्टा थे और उनमें कठोर परिश्रम की असाधारण क्षमता थी. फ्रांसीसी भौतिक वैज्ञानिक पीएरे क्यूरी, जिन्होंने अपनी पत्नी मैरी क्यूरी (1867-1934) के साथ मिलकर पोलोनियम और रेडियम का आविष्कार किया था, के अनुसार डॉ॰ साराभाई का उद्देश्य जीवन को स्वप्न बनाना और उस स्वप्न को वास्तविक रूप देना था. इसके अलावा डॉ॰ साराभाई ने अन्य अनेक लोगों को स्वप्न देखना और उस स्वप्न को वास्तविक बनाने के लिए काम करना सिखाया. भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता इसका प्रमाण है. डॉ॰ साराभाई को युवा वर्ग की क्षमताओं में अत्यधिक विश्वास था. यही कारण था कि वे उन्हें अवसर और स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए सदा तैयार रहते थे.
विज्ञान और संस्कृति
डॉ॰ होमी जे. भाभा की जनवरी, 1966 में मृत्यु के बाद डॉ॰ साराभाई को परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष का कार्यभार संभालने को कहा गया. साराभाई ने सामाजिक और आर्थिक विकास की विभिन्न गतिविधियों के लिए अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी में छिपी हुई व्यापक क्षमताओं को पहचान लिया था. इन गतिविधियों में संचार, मौसम विज्ञान, मौसम संबंधी भविष्यवाणी और प्राकृतिक संसाधनों के लिए अन्वेषण आदि शामिल हैं. डॉ॰ साराभाई द्वारा स्थापित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद ने अंतरिक्ष विज्ञान में और बाद में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में अनुसंधान का पथ प्रदर्शन किया. साराभाई ने देश की रॉकेट प्रौद्योगिकी को भी आगे बढाया. उन्होंने भारत में उपग्रह टेलीविजन प्रसारण के विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाई.
डॉ॰ साराभाई भारत में भेषज उद्योग के भी अग्रदूत थे. यह साराभाई ही थे जिन्होंने भेषज उद्योग में इलेक्ट्रानिक आंकड़ा प्रसंस्करण और संचालन अनुसंधान तकनीकों को लागू किया. उन्होंने भारत के भेषज उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने और अनेक दवाइयों और उपकरणों को देश में ही बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. साराभाई देश में विज्ञान की शिक्षा की स्थिति के बारे में बहुत चिन्तित थे. इस स्थिति में सुधार लाने के लिए उन्होंने सामुदायिक विज्ञान केन्द्र की स्थापना की थी.
डॉ॰ साराभाई सांस्कृतिक गतिविधियों में भी गहरी रूचि रखते थे. वे संगीत, फोटोग्राफी, पुरातत्व, ललित कलाओं और अन्य अनेक क्षेत्रों से जुड़े रहे. अपनी पत्नी मृणालिनी के साथ मिलकर उन्होंने मंचन कलाओं की संस्था दर्पण का गठन किया. उनकी बेटी मल्लिका साराभाई बड़ी होकर भरतनाट्यम और कुचीपुड्डी की प्रसिद्ध नृत्यांग्ना बनीं.
डॉ॰ साराभाई का कोवलम, तिरूवनंतपुरम (केरल) में 30 दिसम्बर 1971 को देहांत हो गया। इस महान वैज्ञानिक के सम्मान में तिरूवनंतपुरम में स्थापित थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लाँचिंग स्टेशन (टीईआरएलएस) और सम्बध्द अंतरिक्ष संस्थाओं का नाम बदल कर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र रख दिया गया. यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एक प्रमुख अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र के रूप में उभरा है. 1974 में सिडनी स्थित अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान संघ ने निर्णय लिया कि ‘सी ऑफ सेरेनिटी’ पर स्थित बेसल नामक मून क्रेटर अब साराभाई क्रेटर के नाम से जाना जाएगा. भारतीय टपाल विभाग द्वारा उनकी मृत्युँकी पहली वरसी पर 1972 मेँ एक डाक टिकट जारी किया गया.

 

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