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क्या आपने पढ़ी है कवि अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता- मैं वीर पुत्र मेरी… अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हें मीना बाजार

क्या आपने पढ़ी है कवि अटल बिहारी वाजपेयी की ये कविता-  मैं वीर पुत्र मेरी… अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हें मीना बाजार
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
एक प्रखर वक्ता , कवि , पत्रकार , नेता , देश में अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों को साथ लेकर चलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। यह उनके बोलने का अंदाज और सारगर्भित भाषण की कला का जादू था कि उनकी अपनी पार्टी के लोग ही नहीं विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। वह अक्सर अपने दिल की बातों को कविताओं के जरिए जाहिर करते थे। ऐसी ही एक कविता के जरिए उन्होंने खुद के हिंदू होने का परिचय दिया था । उनकी मशहूर कविता ” हिन्दू तन मन….” कुछ इस प्रकार है –
मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार
डमरू की वह प्रलय ध्वनि हूं नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मैं दुर्गा का उन्मत्त हास
मैं यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती में आग लगा दूं मैं
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड़ चेतन तो कैसा विस्मय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय॥
मैं आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भू पर
पय पीकर सब मरते आए मैं अमर हुआ लो विष पीकर
अधरों की प्यास बुझाई है मैंने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर में ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मैं नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमें कुछ संशय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
मैं अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैंने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर , मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सका ठहर
मेरा स्वर्णभ में घहर घहर, सागर के जल में छहर छहर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मैं
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
मैं तेज पुंज तम लीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है मैंने अपना जीवन देकर
विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहली के खण्डहर सदियों की निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दू की जय तो क्या विस्मय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मैं आया तभी द्रवित होकर, मैं आया ज्ञान दीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तों से थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढ़ निश्चय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
मैंने छाती का लहू पिला पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव में भेद नहीं मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयों का वह राज मुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
मैं वीरपुत्र मेरी जननी के जगती में जौहर अपार
अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हें मीना बाजार
क्या याद उन्हें चित्तौड़ दुर्ग में जलने वाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रों माताएं तिल तिल कर जल कर हो गईं अमर
वह बुझने वाली आग नहीं रग रग में उसे समाए हूं
यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
होकर स्वतन्त्र मैंने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैंने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम
गोपाल, राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दू करने घर घर में नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नहीं शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
मैं एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दू समाज
मेरा इसका संबन्ध अमर मैं व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैंने पाया तन मन इससे मैंने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दूं सब कुछ इसके अर्पण
मैं तो समाज की थाती हूं मैं तो समाज का हूं सेवक
मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन रग रग हिन्दू मेरा परिचय।।
( इस कविता को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उस वक्त लिखी थी जब वह दसवीं कक्षा के छात्र थे.)

 


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