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क्या अनुभवी बन गए हैं अखिलेश यादव? बोले- 2022 में अकेले लड़ेंगे चुनाव

क्या अनुभवी बन गए हैं अखिलेश यादव? बोले- 2022 में अकेले लड़ेंगे चुनाव
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

आलोक श्रीवास्तव

प्रयागराज। सन 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव के ठीक पहले मुलायम सिहं यादव ने ऐतराज जताया लेकिन अखिलेश यादव ने परिपक्व और अनुभवी पिता की बात अनसुनी कर कांग्रेस से समझौता कर लिया. परिणाम निकलने पर समाजवादी पार्टी रसातल में पहुंचती दिखी. दो साल बाद आम लोकसभा चुनाव में फिर मुलायम सिंह यादव की नापसंदगी के बाद भी अखिलेश यादव बहुजन समाज पार्टी से समझौता कर बैठे. नतीजा, विधानसभा चुनावों में न्यूनतम सीटों पर सिमटी बसपा 10 लोकसभा सदस्यों को जिता ले गई. सपा घर की भी एक सीट गंवा बैठी. वह 5 सीटों पर ही सिमटी रह गई. दोनों चुनाव परिणामों को उनकी अनुभवहीनता के रूप में देखा गया. दो चुनाव परिणामों को देख विरोधियों के भी पंख निकल आए. कहने वाले तो यह तंज भी कसने लगे कि अखिलेश यादव लोकदल के नेता अजीत सिंह की राह पर बढ़ चले हैं. कभी यूपी की राजनीति के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजीत सिंह को अब पिछलग्गू नेता का दर्जा मिल चुका है. हालत ऐसी हो गई है कि उन्हें खुद अपनी और बेटे जयंत सिंह की सीटें बचाने के लिए भी राजनीतिक दलों की मनुहार करनी पड़ती है.
समाजवादी पार्टी के लिए दिवास्वप्न सरीखे रहे दो बड़े चुनावों के परिणामों ने कार्यकर्ताओं के जोश को भले ही ठंडा न किया हो लेकिन नेता को दिन में ही तारे दिखने लगे. इसके साथ ही अब वह फैसले लेने में भी आगे-पीछे करने लगे हैं. स्थिति यह हो चली है कि परिवार से बिदक कर अलग दल बना चुके चाचा शिव गोपाल यादव के तल्खी छोड़ देने और मेल-मिलाप के खुली विनती जैसे भावों पर भी अखिलेश यादव टिप्पणियां करने से बचने लगे हैं. अब वह अखाड़े के युवा पहलवान की तरह ताल ठोंकने वाले नेता से ज्यादा खुद को परिपक्व राजनेता की तरह पेश करने में जुटे हैं. प्रयागराज के एक वैवाहिक समारोह में पहुंचे अखिलेश यादव ने इसी किस्म की परिपक्वता दिखाने की कोशिश की. मौके पर पहुंचे संवाददाताओं के तमाम कुरेदने के बाद भी उन्होंने राजनीति पर ज्यादा बोलने से बचते रहे. चाचा शिव पाल यादव को लेकर किए गए सवालों को भी वह टाल गए. उनके इस बदले व्यवहार पर तमाम नेताओं ने प्रतिक्रिया भी दी कि नेताजी अब अनुभवी हो गए हैं.
गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के वक्त सपा अध्यक्ष और उस वक्त मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव और कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे राहुल गांधी ने एक साथ, एक ही गाड़ी की छत पर सवार होकर इलाहाबाद में रैली निकाली थी. परिणाम और समय के साथ सपा और कांग्रेस का गठबंधन टूट गया. अब आया 2019 का लोकसभा चुनाव. लखनऊ में 02 जून 1995 को हुए गेस्टहाउस हाउस कांड के बाद एक दूसरे को फूटी आंख भी न देखने वाले सपा और बसपा ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा.
जब सपा और बसपा ने हाथ मिलाया था तो राजनीतिक हल्कों में चर्चा थी कि दोनों के वोट भाजपा को हराने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन भाजपा की रणनीति और कार्यकर्ताओं ने मेहनत ने 49 फीसदी वोट शेयर कर लिए. जब 50 फीसदी वोट एक ही दल को मिल जाए तो उसका जीतना तय है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कुल 80 सीटों में से भाजपा को 62, उसके सहयोगी अपना दल को 2, कांग्रेस को एक, बसपा को 10 और सपा को 5 सीटें मिलीं. हार के बाद वही हुआ बुआ-बबुआ यानी मायावती और अखिलेश का गठबंधन एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हुए टूट गया.

अब अखिलेश का अनुभव बोल रहा

इन दो घटनाओं से लगता है अखिलेश यादव ने बहुत कुछ सीखा है , तभी तो 21 नवंबर , 2019 को प्रयागराज आए सपा अध्यक्ष अखिलेश ने स्पष्टतौर पर कहा कि समाजवादी पार्टी 2022 का विधानसभा चुनाव अकेले और खुद के दम पर लड़ेगी. वह किसी भी दल से समझौता नहीं करेंगे. उनका कांग्रेस और बसपा से मिलकर चुनाव लड़ने का अनुभव अच्छा नहीं रहा. चाचा शिवपाल यादव के पार्टी में शामिल होने या उनकी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी से समझौते के बारे में पूछे गए सवालों पर पहले तो उन्होंने टालमटोल की लेकिन बाद में कहा कि इस बारे में वह फिलहाल कुछ नहीं बोलना चाहते और सही वक्त आने पर ही इस पर कोई जवाब देंगे. कुरुदने पर कहा कि समाजवादी पार्टी अभी से सरकार बनाने की तैयारी में जुट गई है. 2022 का परिणाम सपा के पक्ष में होगा.

 


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