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आजाद के देशप्रेम और बलिदान का इस्तेमाल करके राजनैतिक रोटियां ही सेक रही सरकारः महंत बजरंगमुनि

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
प्रयागराज सिर्फ न्याय, शिक्षा और धार्मिक कार्यों के लिए ही नहीं जाना जाता है. यह वही धरती हैं जहां अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद ने देश के लिए प्राणों की आहूति दे दी. लोकतंत्र में नेता उनकी आहूति को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं जबकि उनसे जुड़ीं यादों को सहेजने और उसे राष्ट्रीय स्तर पर आजादी के आंदोलन के पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने में कोई रुचि नहीं है. यदि आजाद और अन्य शहीदों से जुड़े स्थलों को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित कर प्रचारित किया जाए तो युवा पीढ़ी गौरवशाली इतिहास और भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने में प्राणों की बाजी लगाने वाले भारत वीरों के बारे में भी जान सकेगी.
रसूलाबाद के महंत बजरंग मुनि ने यह कहते हुए क्षोभ प्रकट किया कि सभी राजनेताओं, पदाधिकारियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों से पत्राचार एवं व्यक्तिगत मुलाकात के बाद भी इस प्रकरण को लेकर कोई सुनने को तैयार नहीं है. भारत के महान वीर आज़ाद के वास्तविक सम्मान के लिए उनकी प्रतिमाओं पर पुष्प चढ़ाने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि उनको आने वाली पीढ़ी किस प्रकार याद रखे. यही एक वीर एवं स्वतंत्रता सेनानी के उचित सम्मान की रक्षा है.

उनका कहना है कि कुम्भ में पूरे शहर को सजाया गया परन्तु आजाद जी के दाह स्थल को अफसर भूल गए. जबकि उनकी छवि का प्रयोग करके वाहवाही बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई.
यहां दिल्ली और सूबाई राजधानियों में अक्सर अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें बनती हैं। यह जरूरी नहीं कि उनके विचार मेल खाते हों, परंतु राष्ट्रभक्ति की भावना भी क्या अलग-अलग हो सकती है? जिस संविधान की शपथ लेकर हमारे हुक्मरां सिंहासनों पर विराजते हैं, वह तो एक ही है। और किसी मामले में न सही, कम से कम नक्सलवाद व आतंकवाद के मसले पर वे एक राय कायम कर सकते हैं? अफसोस, इसका उल्टा हो रहा है।।
महंत बजरंगमुनि ने कहा कि प्रयागराज के रसूलाबाद घाट पर उस अमर शूरवीर की अंत्येष्टि स्थल है. इस स्थान के सौंदर्यीकरण एवं इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के लिए सभी पार्टियों के पदाधिकारिओं के साथ ही सूबे के मुखिया, राष्ट्र के प्रधानसेवक एवं राष्ट्रपति को कई पत्र लिखे. हर बार सिर्फ सांत्वना मिलती रही किंतु इस राष्ट्रीय प्रकरण पर कोई भी संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं हुआ.
उनका कहना है कि सहयोगी छात्र एवं छात्र नेताओं के साथ मिलकर इस स्मारक को कुछ हद तक साफ रखने एवं जीर्णशीर्ण पड़े स्मारक को पुनः सुधारने का कार्य किया है. मेरी ये लड़ाई अंत तक जारी रहेगी. जब तक वीर की वीरता को उचित स्थान नहीं प्राप्त हो जाता है.
महंत बजरंग मुनि ने आरोप लगाया कि सरकार की नजर में शहीद आजाद का कोई महत्व नहीं? आज तक उनके अन्त्येष्टि स्थल पर आजाद की एक प्रतिमा तक स्थापित नहीं हो सकी है.
बजरंग मुनि ने सवाल उठाया कि नई-नई प्रतिमाएं बनवाकर युवाओं को लुभाने में राजनीतिक पार्टियों को विश्वास है या फिर सच में शहीद आजाद का सम्मान करना चाहती है. यदि नेताओं को आजाद से लगाव है तो उनसे जुड़े हुए स्थलों को सर्व प्रथम सुरक्षित करें. कहा कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकारें आजाद के नाम का प्रयोग कर के युवाओं का वोट बैंक बनाना चाहती हैं.
महंत बजरंगमुनि उदासीन ने बताया कि पिछले 9 वर्ष के अंदर कम से कम 3 हजार पत्र विभिन्न्र राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को भेजा ,वहाँ से कई बार जवाब आया परंतु उसका कोई सार्थक परिणाम नहीं मिला. राष्ट्रपति के संज्ञान लेने पर भी कुछ नही हुआ.
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