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किसान और युवा कम लागत में ऐसे बढ़ाएं आय

किसान और युवा कम लागत में ऐसे बढ़ाएं आय

रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर अतिरिक्त आय में बढ़ोतरी से ही क्रय शक्ति में इजाफा किया जा सकता है

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
अजोला के उपयोग से न सिर्फ दूध के उत्पादन में वृद्धि होती है बल्कि भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है

डॉ. बीके द्विवेदी

रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर अतिरिक्त आय में बढ़ोतरी से ही क्रय शक्ति में इजाफा किया जा सकता है। जब देश की जनसंख्या लगातार बढ़ रही हो और जोत का आकार कम होता जा रहा हो , ऐसी स्थिति में तो यह और भी जरूरी हो जाता है। प्रयागराज स्थिति बायोवेद कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान शोध संस्थान ने लोगों की जरूरत के अनुसार , पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए तकनीकी प्रशिक्षण देकर अधिकांश व्यक्तियों को खेतीबारी और पशुधन के जरिए स्वरोजगार और अतिरिक्त आय उपलब्ध करा रहा है।
दूध का उत्पादन भी बढ़ जाता है
पशुओं के संतुलित आहार को लेकर बायोवेद शोध संस्थान अजोला की खेती पर बल दे रहा है। अजोला पोषक तत्वों से भरपूर एक छोटा जलीय फर्न पौधा है जो स्थिर पानी में तैरता हुआ होता है। अजोला में सभी प्रकार के पोषक तत्व जैसे कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, जिंक, कोबाल्ट, मैग्नीशियम, पर्याप्त मात्रा में विटामिन, प्रोटीन, एमिनो एसिड और खनिज पदार्थ होते हैं। अजोला की खेती कम लागत में अधिक लाभ देने वाली होती है । इसे पशुओं को खिलाने से दूध उत्पादन में 15 से 25 फीसदी की वृद्धि होती है , साथ ही साथ वसा की मात्रा भी 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
पशु रहते हैं स्वस्थ्य , उत्पादन भी बढ़ता है
किसान के पास उपलब्ध भूसा, पैरा एवं अन्य भोज्य पदार्थों में संतुलित पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने में अजोला जिसे वाटर फर्न  एवं डकवीड अथवा मॉस्किटो फर्न कहते हैं , इसे पालतू पशु एवं दुधारू पशुओं को खिलाकर उच्च गुणवत्ता युक्त दूध की प्राप्ति की जा सकती है । इसके सेवन से पशु स्वस्थ्य भी रहते हैं। उत्तर प्रदेश में औसतन दुग्ध उत्पादन 2.5 लीटर प्रति गाय एवं 4.5 लीटर प्रति भैंस है जो हाइब्रिड प्रजाति की तुलना में काफी कम है।  पशुओं के दूध उत्पादन की क्षमता को अजोला के प्रयोग से कम लागत एवं परिश्रम में बढ़ाया जा सकता है । अजोला को गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी, मछली, खरगोश, बत्तख को भी संतुलित आहार के रूप में दिया जा सकता है।
अजोला धीरे-धीरे अल्प  मात्रा से ज्यादा मात्रा में खिलाना लाभकारी होता है । धान की खेती में जैव उर्वरक की तरह अजोला का प्रयोग नाइट्रोजन की पूर्ति हेतु प्रयोग किया जाता है। जब हम इसे धान के खेत में डालते हैं तो वायुमंडल से नाइट्रोजन को खींचकर मिट्टी में संग्रहित करता है । नील हरित शैवाल( एनाबिना अजोली ) के साथ सहजीवी के रूप में बढ़ता है तथा नाइट्रोजन बढ़ाने में सहायक होता है।  इसे सजीव नाइट्रोजन उत्पादन फैक्ट्री भी कहा जाता है। यह 2-4 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन 20-30 डिग्री सेल्सियस के तापक्रम एवं 65 – 80   प्रतिशत आद्रता एवं 5-7 पी. एच मान के अनुकूल होने पर पैदा करता है । अजोला भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने एवं बायोफ्यूल के उत्पादन में भी सहायक होता है एवं ग्रीन हाउस गैसों को कम करने में भी भूमिका निभाता है।  अजोला की मुख्य तीन प्रजातियां होती हैं , जैसे अजोला पिन्नाटा,  अजोला फिलीक्युलोइडिस, अजोला अफ़्रीकाना  , इन तीनों प्रजातियों में अजोला पिन्नाटा ही जैव उर्वरक एवं ग्रीन उर्वरक धान की खेती एवं पशुओं के संतुलित आहार हेतु प्रयुक्त किया जाता है।

अजोला उत्पादन का ये है तरीका

अजोला उगाने के लिए 5 मीटर लंबा , 1 मीटर चौड़ा ,  8-10 इंच गहरा सीमेंट का टैंक या पॉलिथीन की मदद से गड्ढा बनाया जा सकता है।  टैंक  की लंबाई -चौड़ाई आवश्यकता अनुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती है।  टैंक में खेत की 40 किलोग्राम साफ-सुथरी मिट्टी को डालकर 20 लीटर पानी में 2 दिन पुराने गोबर को 4-5 किलोग्राम घोलकर इसमें डाला जाता है । 7 -10 सेंटीमीटर पानी अजोला के अच्छे उत्पादन के लिए रखा जाता है । एक किलोग्राम अजोला कल्चर को एक बार डालना होता है । उसके बाद यह धीरे-धीरे बढ़ने लगता है । 10-12 दिन में अजोला पानी के ऊपर फैलकर एक मोटी हरी चटाई जैसा दिखने लगता है। 12 दिन के बाद एक किलोग्राम अजोला  प्रतिदिन प्लास्टिक की छन्नी से निकाला जाता है । सप्ताह में एक बार गोबर पानी का घोल बनाकर प्रति गड्ढे डालते रहने से अच्छी पैदावार होती है।  पशुओं को खिलाने से पहले अजोला को पानी से निकालने के बाद अच्छी तरह साफ कर लें जिससे गोबर की  गंध ना आए।  अजोला को मुर्गियों को खिलाने से  साधारण चारा खाने वाली मुर्गियों की तुलना में उनका वजन 15 से 20 फीसदी  बढ़ जाता है।

भविष्य के लिए भी रख सकते हैं अजोला को

अजोला में क्रूड प्रोटीन 20 -26 प्रतिशत,  क्रूड फाइबर 8-10 फीसदी, इथर एक्सट्रैक्ट 2.5-3.5 फीसदी , नाइट्रोजन युक्त एक्सट्रैक्ट 45-50 प्रतिशत , कैल्शियम 0.7-1.5 प्रतिशत , फास्फोरस 0.8 से 1.5 प्रतिशत , लाइसिन 0.98 फीसदी, मेथियोनिन 0.32, सिस्टोन 0.1 8 , कार्बोहाइड्रेट 0.2 से 1.0 तथा फैट 4 से 6 फीसदी की शुष्क मात्रा पाई जाती है। बायोवेद कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान शोध संस्थान के शोध वैज्ञानिक हिमांशु द्विवेदी एवं अभय कुमार भारद्वाज ने बताया कि अजोला को उगाने के लिए सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है । गर्मी में आंशिक छाया की भी जरूरत होती है । किसी अच्छे उत्पादन हेतु 25-50 प्रतिशत सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। अजोला की अच्छा उत्पादन हेतु टैंक में न्यूनतम जलस्तर 4 इंच तक रखना आवश्यक है । तापमान 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड एवं आद्रता 65-80 फीसदी तथा जल का पीएच मान 5 से 7  होना आवश्यक है।
छोटे किसानों एवं पशुपालकों के लिए टैंक  का क्षेत्रफल 6×4 फीट उपयुक्त होता है जिससे 1 किलोग्राम अजोला प्रतिदिन आसानी से उत्पादित किया जा सकता है । तालाब /टैंक  की चारों दीवारों का तटबंध ईंटों या मिट्टी द्वारा उठा होना चाहिए।  प्लास्टिक शीट बिछाने के बाद उसे दीवारों पर ईंट रखकर दबा देना चाहिए। लगभग 1 किलोग्राम गोबर और 100 ग्राम सुपर फास्फेट 15 दिन में डालते रहने से अजोला की अच्छी वृद्धि होती है। 6 महीने के उत्पादन के बाद एक बार टैंक को खाली कर देना चाहिए और दोबारा शुरू करने के लिए ताजा मदर कल्चर डालना चाहिए। बरसात के मौसम में टैंक को जाली से ढक देना चाहिए । बरसात में अजोला की वृद्धि बहुत तेज गति से होती है लेकिन पानी का पीएच मान 5 से 7 होना चाहिए , यदि पानी में नमकीन तत्व की मात्रा अधिक होती है तो अजोला की वृद्धि एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
बायोवेद शोध संस्थान  की शोध वैज्ञानिक सौम्या तिवारी ने बताया कि यदि किसान के पास दो गाय है तो उसे 12×4 या 13×3 के टैंक  से 2 किलोग्राम अजोला प्रतिदिन उत्पादित किया जा सकता है । यदि अजोला अधिक मात्रा में पैदा होता है तो उसे छाया में सुखाकर भविष्य के लिए संरक्षित किया जा सकता है तथा पशुओं को ताजा या सूखे चारे के साथ मिलाकर भी दिया जा सकता है। 100 किसानों के साथ शोध अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि 800 ग्राम अजोला प्रतिदिन प्रति गाय को खिलाने से दूध की मात्रा प्रति गाय 5 लीटर बढ़ाई जा सकती है । गाय को स्वाद में लाने के लिए कुछ दिन का समय लगता है , इसलिए प्रारंभ में अजोला को पानी में धोकर चारे  में मिलाकर खिलाया जाता है जिससे गोबर की गंध  समाप्त हो जाती है।  6 ×4 फिट के तालाब को बनाने और रखरखाव का खर्च लगभग  1500 रुपए आता है।  उत्पादित अजोला को 6 महीने तक पशुओं को खिलाने से 15 से 20 फीसदी दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती है , जिससे 10 से 15 हजार रुपए की अतिरिक्त आय किसान को 6 महीने में होती है । अजोला उत्पादन की कीमत 50 से 60 पैसा प्रति किलोग्राम आता है और एक किलोग्राम अजोला को दुधारू पशुओं को आहार के रूप में  खिलाने से 50-60 रूपये की प्रतिदिन अतिरिक्त आय होती है। अधिकतम आय 150- 200 रुपये तक की रोज होती है ।

अजोला की खेती के लाभ

– अजोला बहुत लाभकारी जैविक खाद है जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कम लागत में बढ़ा देती है और पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।
– अजोला जैविक ईंधन उत्पादन में बहुत सहायक है। ग्रीन हाउस गैस के प्रभाव को कम करके वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन में सहायक होता है।
– ताजे अजोला का प्रयोग भूमि की पानी रोकने की क्षमता, ऑर्गेनिक कार्बन, अमोनियम नाइट्रेट, फॉस्फोरस, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम के साथ-साथ अनउपजाऊ जमीन को उपजाऊ बनाने में सहायक होता है तथा मिट्टी के छारीयपन को कम करता है । इस तरह अजोला हरी खाद की भांति कार्य करते हुए पौधों की पैदावार को कई गुना बढ़ा देता है।
– अजोला वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायक होता है और धान की पैदावार में नाइट्रोजन की आपूर्ति करने में सहायक होता है । 13 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की मात्रा की आपूर्ति कर नाइट्रोजन संबंधी उर्वरकों के आवश्यकता को कम करता है ।
– भूमि की मृदा उर्वरता में कार्बनिक पदार्थ एवं नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम की आपूर्ति कर रासायनिक खादों के प्रयोग की मात्रा को कम करता है और पैदावार को 30 से 35 फीसदी बढ़ा देता है।
– अजोला पशुओं के लिए पोषक पदार्थों से युक्त एक सुपर फूड अथवा आदर्श फूड है । यह प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स, कार्बोहाइड्रेट, वसा व अन्य पोषक तत्वों की आपूर्ति कर दुधारू पशुओं के दूध एवं मुर्गी, बत्तख, भेड़, बकरी, सूअर, खरगोश इत्यादि का वजन बढ़ाने में सहायक है।
– अजोला जैविक ऊर्जा अथवा बायोडीजल के उत्पादन में सहायक होता है । यह कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को लेकर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाता है और कार्बन को लिपिड में परिवर्तित कर बायोडीजल या जैव ईंधन के रूप में कार्य करता है।
– अजोला पानी के वाष्पोत्सर्जन को रोकता है  तथा जल संरक्षण में सहायक है । जलीय खरपतवार के वृद्धि को रोकता है । इस तरह धान के खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलती है।
– अजोला पानी में विद्यमान भारी तत्व जैसे क्रोमियम, नीकील, लेड एवं घुले हुए  कीटनाशकों के प्रभाव को नगण्य करता है।
– अजोला पानी के  खारेपन को कम करता है।
लेखकः बायोवेद कृषि प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान शोध संस्थान के निदेशक हैं।
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ईमेल– [email protected]       www.bioved.co.in
मोबाइल न. – 09839337124, 9450631645, 9839619729

 

 


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