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प्रवासी मज़दूरों पर सरकारें ही नहीं, उनके खून-पसीने से फूले उद्योग जगत भी बेनकाब

प्रवासी मज़दूरों पर सरकारें ही नहीं, उनके खून-पसीने से फूले उद्योग जगत भी बेनकाब
 सौरभ सिंह सोमवंशी
प्रतापगढ़ः सरकारें होती हैं जनता की भलाई के लिए। संकट में साथ खड़े होने के लिए। लेकिन महामारी आपदा के दौरान प्रवासी कामगारों के साथ जो हुआ, वह किसी अनिष्ट से कम नहीं है। लॉकडाउन के दौरान कल-कारखानों के मालिकों ने ही प्रवासियों को उनके हाल पर नहीं छोड़ा, संपन्न राज्यों की सरकारों ने भी उनसे कोई सरोकार नहीं रखा। भुखमरी की नौबत आने पर जो जहां जैसे था, प्रवासियों को ठिकाना छोड़ना पड़ा। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में प्रवासियों के साथ हुए कुछ हादसों ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों का ध्यान खींचा लेकिन वह भी राजनीति से ऊपर नहीं उठ सका।
देश के ज्यादातर हिस्सों में पूरे लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। काफी समय बीत जाने के बाद उनकी सुध ली गई, लेकिन तब तक देर हो गई। एक समस्या यह भी आई कि  प्रवासी मजदूर जहां काम करते हैं वह वहां के मतदाता नहीं होते और जहां के स्थायी निवासी हैं वहां पर वह मतदान के दौरान वोट नहींं देते। उनकी समस्या के पीछे शायद यह भी एक बड़ा कारण था। अन्यथा लॉकडाउन के तत्काल बाद विदेशियों को लाने के लिए मिशन वंदेभारत जैसा कदम उठाया गया और उनको विदेश से लाया गया। परंतु जो मजदूर भारत की जीडीपी में 10% का योगदान देते हैं और भारत के कुल श्रम में उनका 28% का योगदान होता है, उनकी कोई सुध लेने में पूरे महीनेभर की देर हो गई।
उत्तर प्रदेश में भले ही कोटा, प्रयागराज से प्रतियोगी छात्र घर पहुंचाए गए। हरियाणा और मध्य प्रदेश से कामगार वापस लाए गए। लेकिन अन्य राज्य सरकारें तब तक प्रवासी समस्या के बारे में सोच भी नहीं सकी थीं। केंद्र से प्रवासियों को घर वापसी की अनुमति मिलने के बाद यूपी को छोड़ राजस्थान, पंजाब, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश ने हाथ खड़े कर लिए। सभी ने केंद्र सरकार से गुजारिश की कि प्रवासियों की वापसी के लिए उनके पास संसाधन नहीं नहीं हैं। इसलिए प्रवासियों के लिए ट्रेनें चलाई जाएं।
ट्रेनों से प्रवासियों की वापसी शुरू हुई तो पहले 10 दिनों तक किराये को लेकर ऐसी राजनीति देखी देखने को मिली जो शर्मनाक थी। रोचक यह कि यूपी में प्रवासियों की समस्या उठाने वाली कांग्रेस ने राजस्थान और पंजाब में फंसे यूपी और बिहार के प्रवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया। पश्चिम बंगाल ने अपने ही लोगों की धर वापसी में तमाम नुक्ता-चीनी की। महाराष्ट्र और गुजरात ने प्रवासियों को उनके घरों को भेजने की अनुमति तो दी लेकिन ट्रेनों में सवार करने के लिए ऐसी हड़बोंग मचाई कि ट्रेनों में सवार होने वाले प्रवासियों की ढंग से जांच भी नहीं की गई। हालत ऐसे उपजे कि पंजाब और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को महाराष्ट्र सरकार की आलोचना करनी पड़ी। राजनीति यहां भी पुरजोर हुई।
हालांकि, इस बीच हजारों की संख्या में मजदूर पैदल, किराये की ट्रकों, ऑटो, दुपहिया और साइकिल से ही चल चुके थे। भारत की संसद में भारत सरकार ने ही लाकडाउन के कुछ दिनों पहले मार्च में ही सत्र के दौरान बयान दिया था कि भारत में लगभग 10 करोड़ से अधिक प्रवासी मजदूर विभिन्न प्रदेशों में रहते हैं।
हमें यह सोचना होगा कि सरकारें लाकडाउन के बाद 3 महीने तक मुफ्त भोजन देने की घोषणाओं के बावजूद सरकारी प्रवासी मजदूरों को रोकने में क्यों नाकाम साबित हुई? शायद ऐसा इसलिए था क्योंकि प्रवासी मजदूर सरकारों और अपने मालिकों के ऊपर विश्वास करने की स्थिति में नहीं थे, क्योंकि प्रवासी मजदूरों की मेहनत के परिणाम स्वरूप जीएसटी पाने वाली सरकार और प्रॉफिट कमाने वाले मालिक ने उनको उनके हाल पर एक माह तक छोड़ दिया था।
उत्तर प्रदेश सरकार के अलावा आज भी कोई राज्य सरकार प्रवासी मजदूरों के लिए कोई ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत नहीं कर पाया है, सिवाय उनको मनरेगा में एडजस्ट करने के। इस तरह की स्थिति में प्रवासी मजदूरों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। इस स्थिति में सरकारों की कारगुजारी उजागर हो गई है।
यह कहानी तब और स्पष्ट हो गई है भारत सरकार के द्वारा 20 लाख करोड़ के पैकेज में प्रवासी मजदूरों के लिए पांचवीं किस्त में जाकर घोषणा की गई। वह भी नकद के रूप में नहीं बल्कि कर्ज के रूप में उसकी घोषणा की गई। जबकि अन्य राष्ट्रों में इस तरह की सीधी मदद दी गई‌। यदि केंद्र सरकार चाहती तो 13.9 करोड मजदूरों को 25000 रूपये प्रति मजदूर सीधा मदद कर सकती थी। तब भी इस मद में कुल 3.47 लाख करोड़ खर्च आता जो उसके द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ का छठा हिस्सा होता। परंतु वह नहीं हुआ।
जहां तक बात उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की करें तो उत्तर प्रदेश में कुल 27 लाख प्रवासी मजदूर अभी तक आ चुके हैं और लगातार आ रहे हैं। इसमें से सिर्फ एक लाख लोगों को मनरेगा में काम मिल पाया है। इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 66 प्रकार के कौशल अर्थात अलग-अलग कार्यों की सूची तैयार की है, जिसके अनुसार उनको रोजगार दिया जाएगा।
यह एक सराहनीय कदम है, परंतु अन्य प्रदेशों में प्रवासी मजदूरों को किस तरह से रोजगार देकर उनकी रोजी-रोटी के संकट को बचाया जा सकेगा, यह और डरावना हो जाता है जब यह पता चलता है कि अभी तक इसकी कोई निश्चित कार्य योजना नहीं बनाई गई है। इस तरह की घटनाएं प्रदर्शित करती हैं कि हम आज भी अपने लोगों की कितना चिंता करते हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर सर्वाधिक मात्रा में पलायन करते हैं जबकि इन्हीं दोनों प्रदेशों में सर्वाधिक मिट्टी कृषि योग्य है। परंतु किसान खेती छोड़ रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमारी सरकारों ने न तो कभी किसानों की सुध ली न ही प्रवासी मजदूरों की। क्योंकि यदि किसानों की सुध ली गई होती तो किसान प्रवासी मजदूर न बनता। यदि प्रवासी मजदूरों की सुध ली गई होती तो सड़कों पर देश की हकीकत ना दिखती।
8 मई को भारत सरकार ने सूचना के अधिकार के एक कार्यकर्ता को सूचना दी थी। भारत सरकार के किसी भी एजेंडे में प्रवासी मजदूरों का कोई डाटा नहीं है। अर्थात यह प्रवासी मजदूर भारत सरकार के किसी भी आंकड़े में दर्ज नहीं है।यह समस्या सिर्फ केंद्र तक ही सीमित नहीं है। देश के किसी भी राज्य ने प्रवासियों को लेकर कोई नीति ही नहीं बनाई। न राज्य से जाने वालों की और न दूसरे प्रदेशों से राज्य में आने वालों की।
अर्थात इनकी संख्या कितनी है, ये दर्ज नहीं है। यह उस देश की हकीकत है जो देश 1991 से ही उच्च विकास दर का जश्न मनाता रहा है। परंतु, जिन श्रमिकों की मेहनत से यह विकास दर लगातार बढ़ी उनकी पूछने वाला कोई नहीं है। ये एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है। मार्च में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाकडाउन की घोषणा की गई तब बहुत सारे मजदूर ऐसे थे, जो होली के तत्काल बाद अपने घर से वापस आए थे।
इसके अलावा कुछ मजदूर ऐसे भी थे, जिन्हें 2 या 3 माह से पगार नहीं मिली थी। उनकी भी कोई पूछने वाला नहीं था। प्रवासी मजदूर तो अपने गांव चले गए हैं और उनकी किसी ना किसी तरह से गांव में बीत जाएगी। क्योंकि आज भी गांव में लोग भूख से नहीं मरते। आज भी गांव अक्षय पात्र हैं। परंतु उन कंपनी वालों का क्या होगा, जो बिना श्रमिक के एक कदम भी नहीं चल सकते हैं।
इसके अलावा पंजाब जैसे प्रदेश जहां पर सिर्फ खेती करने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग जाया करते थे। वहां का क्या होगा,यदि वहां की राज्य सरकार और वहां के उद्योग जगत ने इनका साथ दिया होता तो यह अपने गांव आने को विवश ना होते। आखिर वहां की राज्य सरकारें और वहां के उद्योग जगत ने इन मजदूरों से बहुत सारा लाभ प्राप्त किया है। आज वहां का विकास और विकास दर इन्ही की देन है। कोरोनावायरस की महामारी निश्चित रूप से चली जाएगी, परंतु हमको और हमारी सरकारों को भविष्य में इस बात के लिए सचेत रहना होगा कि वर्तमान में हम इस तरह की योजनाएं बनाएं जो हमारे सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकें।

 


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