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महामारी बनी इंजीनियर्स की बेरोजगारी पर केंद्रित फिल्म अवसान रिलीज, जरूर देखें

महामारी बनी इंजीनियर्स की बेरोजगारी पर केंद्रित फिल्म अवसान रिलीज, जरूर देखें

देश में कौशल विकास के दौर के दिनों में लाखों रुपये खर्च कर तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के रोजगार और नौकरियों में भ्रष्टाचार पर केंद्रित हिन्दी फीचर फिल्म अवसान रिलीज हो गई है

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
देश में कौशल विकास के दौर के दिनों में लाखों रुपये खर्च कर तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के रोजगार और नौकरियों में भ्रष्टाचार पर केंद्रित हिन्दी फीचर फिल्म अवसान रिलीज हो गई है. उत्तर प्रदेश के ही विभिन्न शहरों में फिल्माई गई फिल्म अवसान बांग्ला फिल्मों के मशहूर युवा कलाकार अर्जुन चक्रबारती ने तकनीकी शिक्षा लेकर नौकरियों की तलाश में निकले बेरोजगार युवक की भूमिका को दमदारी के साथ प्रस्तुत किया है. फिल्म में कुलजिंदर सिंह सिंधू, अम्रुता पोरे, संगीता पंवार और संतोष कौशिक ने भी अपनी भूमिकाओं में दम दिखाया है.
यह फिल्म तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता, कारपोरेट की नौकरियों में उसके शोषण और नौकरी दिलाने के नाम पर बाजार से लेकर सरकारी दफ्तरों व सरकारों में फैले भ्रष्टाचार पर केंद्रित है. सिर्फ तकनीकी विद्यार्थियों ही नहीं, आम युवकों को भी यह फिल्म देखनी चाहिए. फिल्म कितना व्यवसाय करेगी, यह दर्शकों पर निर्भर करेगा लेकिन देश में कुरीति की तरह में फैली एक भीषण समस्या को शानदार तरीके से उजागर किया गया है. देश के बड़े हिस्से में तकनीकी शिक्षण संस्थानों के फैले जाल और उनसे निकले हुनरमंद छात्रों को मनरेगा दिहाड़ी से भी कम की नौकरी के ऑफर को सुव्यवस्थित तरीके से पिरोया गया है.
फिल्म का संपादन प्रवीण आंगरे ने किया है. गीत डॉ सागर, संगीत निर्देशन विपिन पटवा के साथ आवाज जुबिन नौटियाल और अल्तमश फरीदी की है. फिल्म का लेखन और निर्देशन रजत कुमार चतुर्वेदी और एक्जीक्यूटिव प्रोडयूसर शिवम सिंह राजपूत हैं. फिल्म के पोस्टर को भी खास तरीके से डिजाइन किया गया है, जिसमें बेरोजगारी रूपी काल के मुंह में इंजीनियर को समाते दिखाया गया है.
फ़िल्म के प्रोड्यूसर हरिशंकर शर्मा का कहना है कि उनकी तमन्ना बचपन से ही कुछ अलग करने की थी. पिताजी किसान थे, सो बचपन गांव में ही बीता. सबसे पहले ईंट भट्ठे का काम किया. इसके अलावा भी कई अन्य काम किए लेकिन संतुष्टि नहीं मिली. इसके बाद फ़िल्म इंडस्ट्रीज के कई नामी गिरामी लोगों से मुलाकात हुई और उनसे संपर्क बढ़ा. फिर, इस फ़िल्म को बनाने का विचार मन में आया.
उन्होंने बताया कि इंजीनियर को लेकर इसलिए फ़िल्म बनाई कि रोजगार को लेकर उनकी स्थिति बहुत ही दयनीय है. बीटेक किए हुए बच्चे 5-5 हजार रुपये पर नौकरी करने को मजबूर हैं. माता-पिता और बच्चों की तमन्ना कुछ और रहती है लेकिन बाजार में उन्हें निराशा मिलती है. उनकी इच्छा है कि सरकार, मंत्री, नेता और बड़े पद पर बैठे अधिकारी उन पर ध्यान दें जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सके. उनकी फिल्म इलाहाबाद , लखनऊ, गोरखपुर, कानपुर, नोएडा, ग्रेटर नोएडा , रामपुर, शाहजहांपुर आदि में रिलीज हो गई है. जल्द ही यह फिल्म वाराणमी समेत पूर्वांचल और बिहार के सिनेमाघरों में भी रिलीज की जाएगी.
वह प्रयागराज जिले के मेजा क्षेत्र के कठौली गांव के रहने वाले हैं और सामाजिक कामों में हर वक्त तत्पर रहते हैं. गांव वालों से भी उनको काफी सहयोग मिलता है. वर्तमान में उनकी पत्नी प्रधान है और बहू जिला पंचायत सदस्य है.

 


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