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#इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के भवन निर्माण और खरीदारी में करोड़ों का गोलमाल

#इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के भवन निर्माण और खरीदारी में करोड़ों का गोलमाल
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संघटक इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में वित्तीय अनियमितताओं के कई मामले एक-एक कर उजागर हो रहे हैं. पिछले दिनों विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रतनलाल हांगलू ने इविंग क्रिश्चियन कॉलेज से जुड़ी वितीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की जांच के लिए एक कमेटी गठित की थी. विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी ने कुलपति को 25 फरवरी 2019 को जो प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी है. उससे एक-एक करके कई गड़बड़झाला का पर्दाफाश हो रहा है.
पिछले दिनों ईसीसी के पूर्व प्राचार्य का गलत मकान भत्ता लेने का प्रकरण भी प्रकाश में आया था. अब यह बात सामने आई है कि इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में भवन निर्माण और मरम्मत की विभिन्न प्रक्रियाओं में भी काफी अनियमितताएं बरती गई। वर्ष 2017 में इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में 3 विभागों में निर्माण कार्य करवाया गया.  इस पूरे निर्माण कार्य के दौरान भारत सरकार के सामान्य वित्तीय नियम 2005 और 2017 का जान-बूझकर घोर उल्लंघन किया गया.  जीएफआर यानी जेनरल फाइनेंशियल रूल 2005 और 2017 के अनुसार ही कोई भी केंद्रीय संस्था अपना निर्माण कार्य करवाती है. इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में 2017 में संस्कृत, अंग्रेजी और भूगोल विभाग से जुड़े हुए निर्माण कार्य करवाए गए, जिसमें कुल 70,92,198 रुपए का भुगतान किया गया। यह पूरी प्रक्रिया भारत सरकार की वित्तीय प्रक्रियाओं को बाईपास करके की गई.
भूगोल विभाग में तो एक अलग ही तरीके का खेल खेला गया. भूगोल विभाग में भवन निर्माण के लिए कार्य निर्गत आदेश की तिथि 26 अप्रैल 2017 है. जबकि संबंधित फर्म ने 22 मार्च 2017 को ही कार्य पूरा करना दर्शाया है. जब कार्य आदेश जारी ही नहीं हुआ तो फिर उससे पहले किसी फर्म ने कैसे कार्य पूरा कर लिया. स्पष्ट है कि कॉलेज ने पहले किसी फर्म से कार्य करा लिया और बाद में निविदा आमंत्रित करने का षड्यंत्र रचा. इस कारण भूगोल विभाग में निर्माण के लिए संबंधित फर्म को भुगतान किया गया 18,84,805 का बिल अवैध हो जाता है.
गौरतलब है कि किसी सरकारी संस्था में निर्माण कार्य के लिए पहले कोटेशन यानी निविदा आमंत्रित की जाती है. फिर उस कोटेशन के आधार पर उचित फर्म को कार्य आवंटित किया जाता है, परंतु ईसीसी में पहले ही निर्माण कार्य करवा लिया गया और बाद में दिखाने के लिए निविदा आमंत्रित की गई. यही नहीं इन 3 विभागों में जो निर्माण कार्य हुआ.  इस निर्माण कार्य से संबंधित जिन फर्मों ने कोटेशन/निविदा डाला उन्होंने हूबहू एक ही तरह के वाक्यों का प्रयोग किया. इससे संदेह होता है कि यह पूरा षडयंत्र किसी एक व्यक्ति या एक कार्यालय के इशारे पर किया गया.
सबसे हैरानी की बात तो यह है कि किसी भी निविदा यानी कोटेशन पर निविदा खुलने की तिथि और उस संस्था के अधिकृत व्यक्ति के हस्ताक्षर होते हैं. ईसीसी में निर्माण संबंधी जो भी निविदा खुली उस पर न तो तिथि अंकित है और ना ही तत्कालीन प्राचार्य के हस्ताक्षर हैं, जिसके कारण करीब 71 लाख के जिन बिलों का भुगतान किया गया उनकी वैधता संदिग्ध हो जाती है.
भवन निर्माण में वित्तीय अनियमितताओं के अलावा ईसीसी में 2012 से 2017 के बीच तकरीबन सत्तर लाख रुपय के प्रोजेक्टर, फोटोकॉपी आदि की मशीनें खरीदी गई. इस प्रक्रिया में भी किसी नियम कानून का पालन नहीं किया गया. विश्वविद्यालय को प्रारंभिक जांच में ऐसे कई साक्ष्य मिले हैं जिससे वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होती है.

 

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