6 दिसंबरः कल्याण सिंह इकलौते नेता हैं जिन्होंने राम मंदिर के लिए सत्ता कुर्बान की और सजा भी भुगता

राम मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ चुकी है. अयोध्या आंदोलन ने ही भाजपा के कई नेताओं को राजनीति में पहचान दी है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद राम मंदिर निर्माण के लिए कानून को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशों में जुटे हैं. नौ दिसंबर को दिल्ली में धर्मसभा का आयोजन भी इसी मकसद से किया गया है. उधर, छह दिसंबर होने से आज बरबस यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह मंदिर समर्थकों को याद आ रहे हैं.
अयोध्या आंदोलन और उसके बाद हुई घटनाओं ने बीजेपी के कई नेताओं को देश की राजनीति में एक पहचान दी. सत्ता का दरवाजा भी इसी आंदोलन ने दिखाया है लेकिन राम मंदिर के लिए सबसे बड़ी कुर्बानी भाजपा के किसी नेता ने यदि दी है तो वह हैं कल्याण सिंह. कल्याण भाजपा के इकलौते नेता थे, जिन्होंने  6 दिसंबर 1992 में अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद अपनी सत्ता को बलि चढ़ा दिया था. उन्होंने राम मंदिर के लिए सत्ता ही नहीं गंवाई, बल्कि इस मामले में सजा पाने वाले वे एकमात्र नेता भी हैं.
कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक थे. उनकी पहचान हिंदुत्ववादी और प्रखर वक्ता की रही है. 30 अक्टूबर, 1990 को जब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलवा दी थी. कारसेवकों के साथ प्रशासन के सख्त रवैये से मुकाबले के लिए बीजेपी ने कल्याण सिंह को आगे किया. अटल बिहारी बाजपेयी के बाद कल्याण सिंह ऐसे दूसरे ऐसे नेता थे जिनके भाषणों को सुनने के लिए लोग बेताब रहते थे. 
कल्याण के तेवरों और सांगठनिक क्षमता ने भाजपा को यूपी में ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया जहां से सत्ता बस एक कदम की दूरी पर दिख रही थी. पार्टी ने 1991 में अपने दम पर यूपी में सरकार बना ली. कल्याण सिंह यूपी में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बने. सीबीआई के दायर आरोप पत्र के मुताबिक मुख्यमंत्री बनने के ठीक बाद कल्याण सिंह ने अपने सहयोगियों के साथ अयोध्या का दौरा किया और राम मंदिर का निर्माण करने के लिए शपथ ली.
कल्याण सिंह सरकार के एक साल भी नहीं गुजरे थे कि 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में कारसेवकों ने विवादित ढांचा गिरा दिया. जबकि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र देकर कहा था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में वह मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होने देंगे. इसके बाद भी उसी प्रशासनिक अमले के सामने विवादित ढांचा कारसेवकों ने ढहा दिया जिसने दो साल पहले कारसेवकों पर लाठियां और गोलियां चलाई थीं. अपनी प्रशासनिक क्षमताओं के लिए वर्तमान में भी याद किए जाने वाले कल्याण सिंह के कार्यकाल में अयोध्या-फैजाबाद का प्रशासन उस दिन कैसे इतना ढीला हो गया, यह आज भी लोगों के लिए रहस्य है.
विवादित ढांचे के विध्वंस का जिम्मेदार कल्याण सिंह को जिम्मेदार माना गया. कल्याण ने भी इससे कभी इनकार नहीं किया, उन्होंने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 6 दिसंबर, 1992 को ही मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया. सात दिसंबर को केंद्र की नरसिंम्हा राव की सरकार ने ने यूपी की बीजेपी सरकार को बर्खास्त कर दिया.
कल्याण सिंह ने तब कहा था कि ये सरकार राम मंदिर के नाम पर बनी थी और उसका मकसद पूरा हुआ. ऐसे में सरकार राम मंदिर के नाम पर कुर्बान. बाद में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने और उसकी रक्षा न कर पाने के लिए कल्याण सिंह को एक दिन की सजा मिली. कल्याण सिंह सहित कई नेताओं के खिलाफ सीबीआई ने मुकदमा भी दर्ज किया है.
गौरतलब है कि 26 साल पहले अयोध्या में जो भी हुआ वो खुल्लम-खुल्ला हुआ. हजारों की तादाद में मौजूद कारसेवकों के हाथों हुआ. घटना के दौरान मंच पर मौजूद मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा और लालकृष्ण आडवाणी के सामने हुआ.
भाजपा के नेता राम मंदिर के निर्माण को लेकर चाहे जैसा बयान दें लेकिन यह सच है कि वर्तमान में भाजपा की जो भी सियासत हैं वह राम मंदिर आंदोलन की ही देन है. उस आंदोलन के लिए लालकृष्ण आडवाणी के साथ-साथ कल्याण सिंह की अहम भूमिका रही है. यह अयोध्या की ही देन है कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं. लालकृष्ण आडवाणी ने जब सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली थी तो नरेंद्र मोदी उनके सारथी थे. 2002 में गोधरा में ट्रेन की जो बोगी जलाई गई उसमें मरने वाले भी वो कारसेवक थे, जो अयोध्या से लौट रहे थे. इसके बाद हुए घटनाक्रम का ही उभार नरेंद्र मोदी के रूप में हुआ. फिर, अयोध्या ऐसे मोड़ पर खड़ी है जो भाजपा के लिए 2019 में नफा या नुकसान का कारण बन सकती है.

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