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भीमा कोरेगांव मामले को लेकर महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार में विवाद, शरद पवार ने उद्धव ठाकरे सरकार पर उठाए सवाल

भीमा कोरेगांव मामले को लेकर महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार में विवाद, शरद पवार ने उद्धव ठाकरे सरकार पर उठाए सवाल

भीमा-कोरेगांव मामले में यलगार परिषद को लेकर चार महीने पुरानी गठबंधन सरकार पर राकांपा प्रमुख शरद पवार ने सवाल उठाए हैं

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
भीमा-कोरेगांव मामले में यलगार परिषद को लेकर चार महीने पुरानी गठबंधन सरकार पर राकांपा प्रमुख शरद पवार ने सवाल उठाए हैं. इस मामले की जांच महाराष्ट्र पुलिस से लेकर केंद्रीय एजेंसी एनआईए के हवाले कर दी गई है. इसे लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने उद्धव ठाकरे सरकार की आलोचना की है. शरद पवार का कहना है कि कानून व्यवस्था का मामला राज्य का है और राज्य सरकार को केंद्र के ऐसे निर्णय का समर्थन नहीं करना चाहिए.
शरद पवार ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर में इस मसले पर खुलकर बात की. उन्होंने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर जांच को राज्य से वापस अपने हाथ में लेने का आरोप लगाया है. पवार का कहना है कि भीमा कोरेगांव मामले में महाराष्ट्र सरकार कुछ एक्शन लेने वाली थी. इसलिए केंद्र ने यलगार परिषद के मामले को अपने हाथ में ले लिया.
‘उद्धव सरकार ने नहीं किया विरोध’
एनसीपी प्रमुख ने कहा कि कानून व्यवस्था पूरी तरह से राज्य के हाथ में होनी चाहिए, हैरानी वाली बात है कि राज्य सरकार ने केंद्र के इस फैसले का पुरजोर विरोध नहीं किया. गौरतलब है  कि महाराष्ट्र में एनसीपी सरकार का हिस्सा है और शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी मिलकर सरकार चला रहे हैं.
राज्य पुलिस से एनआईए को गई जांच
इससे पहले गुरुवार को ही शरद पवार ने महाराष्ट्र सरकार में गृह मंत्री अनिल देशमुख को चिट्ठी लिखी थी. इसमें उन्होंने वीआईपी मूवमेंट के दौरान पुलिस वालों की कुछ समस्याएं गिनाई थीं. शरद पवार का ये बयान तब आया है, जब एक दिन पहले ही राज्य सरकार के गृह सचिव ने केंद्र के फैसले पर कोई आपत्ति नहीं जताई. पहले इस मसले की जांच पुणे पुलिस कर रही थी, लेकिन जनवरी महीने में ये जांच NIA के हाथ में चली गई थी.
दरअसल, 31 दिसंबर 2017 को महाराष्ट्र के पुणे में यलगार परिषद की एक बैठक हुई थी. आरोप था कि इस बैठक में भड़काऊ भाषण दिए गए थे, जिसके बाद भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़क गई थी और दंगों जैसी स्थिति आई थी. बैठक को समर्थन देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई अधिवक्ताओं और वामपंथी नेताओं के नाम भी सामने आए थे. इसी घटना की जांच के दौरान पुणे पुलिस और दिल्ली पुलिस ने अलग-अलग खुलासों में दावा किया था कि नक्सलियों ने प्रधानमंत्री पर हमले की साजिश रची थी. बाद में इस मामले को लेकर भारी राजनीतिक बवाल भी हुआ.
फिलहाल, इस नए घटनाक्रम से महाराष्ट्र सरकार के दो मजबूत सहयोगी दलों के बीच मतभेद के स्वर उभरते दिख रहे हैं. शिवसेना शुरुआत से ही नक्सली हिंसा का विरोध करती रही है लेकिन गठबंधन सरकार का हिस्सा बनने के बाद उसने इस मामले पर खामोशी ओढ़ ली है.

 


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