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आईये जाने क्या है ‘ ग्रेट बैरियर रीफ ‘

आईये जाने क्या है ‘ ग्रेट बैरियर रीफ ‘

आज हम चर्चा करेंगे विश्व के सबसे बड़े मूंगे की चट्टान ‘ ग्रेट बैरियर रीफ ‘ के विषय पर। 

यह दुनिया का सबसे बड़ा इकोसिस्टम है। इसका विस्तार आस्ट्रेलिया के क्वींसलैण्ड तट के समानान्तर लगभग 1200 मील तक तथा इसकी चौड़ाई 10 से 90 मील तक है। यह कुछ जगहों पर खंडित है और इसका अधिकांश भाग जलमग्न है परंतु कुछ जगहों पर जल से बाहर भी दिख जाता है।
इसके प्राकृतिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया है।
प्राकृतिक महत्व ——-
   यहां तमाम प्रकार के समुद्री जीवों का निवास एवं संरक्षण देखा जा सकता है। यहाँ समुद्री मछलियों एवं सांपों की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती हैं। यह जगह व्हेल, डॉल्फिन, एवं कछुओं की अनेक प्रजाति और उनके  प्रजनन का स्थान है।
हमें कोरल के बारे में थोड़ा समझना चाहिए। 
कोरल का निर्माण पालिप्स नामक जीव से होता है इनके शरीर पर कैल्शियम कार्बोनेट का खोल होता है। कोरल का निर्माण जल के उस स्थान पर होता है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुंच सके ।
इनकी उपयोगिता —
  यदि जैव विविधता के दृष्टिकोण से देखें तो प्रवाल द्वीप बहुत ही उपयोगी है। परंतु जिस प्रकार से वायु परिवर्तन हो रहा है या स्वार्थ की सिद्धि हेतु मानवीय हस्तक्षेप बढ़ा है उससे इनके अस्तित्व पर खतरे का बादल मंडरा रहा है।
इन कोरलों को औषधि कार्य  हेतु इस्तेमाल किया जाता है। इन प्रवाल द्वीप को विश्व का एक अलग एवं समृद्धि वाला पारिस्थितिक तंत्र माना जाता है। अध्ययन करने पर मालूम होगा कि इन मजबूत रीफ का निर्माण करने वाले कोरल पर विलुप्त होने का खतरा बढता जा रहा है।
इनके अस्तित्व को किस प्रकार खतरा है? 
    जिस प्रकार से मानव ने अप्राकृतिक रूप से अपना हस्तक्षेप समुद्री क्षेत्रों में विस्तारित किया है और तमाम प्रकार के परीक्षण या  कार्बन डाई आक्साइड जैसे जहरीले तत्वों की उपस्थिति को बढाने में सहायक रहा है उससे इन प्रवालों के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है।
हमें पता होना चाहिए कि औघोगिक क्रियान्वयन में इस्तेमाल किया गया जल दूषित हो जाता है एवं इसको समुद्र में प्रवाहित करने से भी इन प्रवालों को जहरीला रसायन तत्व के रूप में हानि होता है।
कोरल का क्षय अंतर्राष्ट्रीय घटना चक्र है और इसके जद में भारतीय समुद्र का कुछ क्षेत्र भी आता है। भारत में लक्षद्वीप ,अंडमान निकोबार, कच्छ की खाड़ी एवं मन्नान की खाड़ी आदि जगहों पर हम ‘ कोरल रीफ ‘ की उपस्थिति को देख सकते हैं।
इनकी निगरानी  ” नेचर कंजर्वेशन फाउण्डेशन  ”  नामक संस्था करती है। प्रदूषण एवं अण्डर वाटर फिशिंग के कारण इन प्रवाल चट्टानों की प्रतिरोधी क्षमता का क्षय हो रहा है।
अतः हमें दूरदर्शिता का परिचय देना होगा एवं समय रहते ही प्रकृति द्वारा मुफ्त में प्रदत्त इस अनमोल धरोहर को संरक्षित एवं सुरक्षित बनाने का प्रयास करना होगा क्योंकि हमें भी पता है कि मूंगे की बेशकीमती चट्टानों का निर्माण एक दिन की घटना नहीं है और ना ही इसका निर्माण हम इंसानों द्वारा संभव है।
हमें समुद्री परीक्षण पर लगाम एवं अनावश्यक तथा खतरनाक रासायनिक तत्वों एवं सामानों को समुद्री समुदाय से बहुत दूर रखना होगा तभी हम कुदरत के इस अनमोल धरोहर का फायदा उठा पायेंगे अन्यथा परिणाम कितना भयानक हो सकता है इसका सहज अनुमान हम सामुद्रिक आपदा से ग्रसित देशों की स्थिति को देखकर लगा सकते हैं।
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