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#Chinavirus गरीबी उन्हें खाना नहीं देती और खुद्दारी उन्हें मांगने नहीं देती

#Chinavirus गरीबी उन्हें खाना नहीं देती और खुद्दारी उन्हें मांगने नहीं देती

कभी ये सम्पन्न थे , आज हालात के कारण विवश हैं , प्रतिष्ठा के चक्कर में सहायता के लिए मुंह नहीं खोल पा रहे हैं , हालत दयनीय है , गरीबों के साथ ऐसे लोगों पर भी सरकार, जनप्रतिनिधि ध्यान दें

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
कभी ये सम्पन्न थे , आज हालात के कारण विवश हैं , प्रतिष्ठा के चक्कर में सहायता के लिए मुंह नहीं खोल पा रहे हैं , हालत दयनीय है , गरीबों के साथ ऐसे लोगों पर भी सरकार, जनप्रतिनिधि ध्यान दें।
 आलोक श्रीवास्तव
कोरोना ( कोविड -19 ) ने पूरी दुनिया में तबाही मचा कर रख दिया है। भारत और उसके कई शहरों में से एक प्रयागराज भी अछूता नहीं है। इस जिले का सौभाग्य है कि सारे उथलपुथल के बाद भी अब तक कोरोना का एक भी पॉजिटिव मरीज यहां नहीं पाया गया है। गरीबों को कोई कष्ट न हो सरकार इसका भरपूर ध्यान रख रही है। हमारे यहां काम करने वाली ने आज मुझसे बताया कि मुझे इस बार 35 किलो अनाज मिला है। इसमें 20 किलो चावल और 15 किलो गेहूं है। खाते में 1000 रुपया भी आया है , विधवा पेंशन भी 500 रुपया आ गया है। बताया कि कुछ लोग पांच किलो आटा , ढाई किलो चावल , एक किलो दाल और पाव भर सरसों के तेल का पैकेट बना कर लाए थे। मैंने नहीं लिया। क्योंकि मेरे पास तो महीने भर के खाने के लिए पर्याप्त हो गया है। सब्जी , तेल खरीदने के लिए खाते में पैसा आ ही गया है। उस पैकेट को मैंने उन लोगों को दिलवा दिया जिन्हें इस वक्त काफी जरूरत थी। प्रशासन ने मेरे कहने पर उन जरूरतमंदों को दे भी दिया। उसका यह भी कहना था कि यदि और कोई जरूरतमंद होगा तो हम अपने अनाज में से उसे दे देंगे। इस वक्त एक दूसरे की सहायता की काफी जरूरत है। जो बातें मैंने बताई हैं वो पूर्णतः सत्य है। कहने का आशय है कि सरकार , पुलिस , स्वयंसेवी संस्थाएं गरीबों को भरपूर मदद कर रही हैं। ये हकीकत में गरीब हैं , इन्हें सरकार भी मानती है , स्वयंसेवी संगठन भी मानते हैं और ये खुलकर कहते भी हैं कि हम गरीब हैं , कोई शील संकोच नहीं है। इसलिए ये सभी सुविधाएं पा रहे हैं।
लेकिन कुछ परिवार ऐसे हैं जिनका सबकुछ गोपनीय है । उच्च वर्ग के हैं , ऊपर से तो चिकने चुपड़े हैं , किसी तरह परिवार की गाड़ी खींच रहे थे , इन्हें किसी भी तरह की सरकारी सुविधा भी नहीं मिलती , इन्होंने कभी लेने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा आड़े आ रही थी परंतु कोरोना ने इन्हें दाने-दाने को मोहताज कर दिया है। सबसे ज्यादा परेशान छोटे-छोटे बच्चे हो रहे हैं। दिक्कतों ने इन्हें बेपर्दा के राह में लाकर खड़ा कर दिया है। मैं तो कहूंगा कि ऐसे लोग शील संकोच छोड़कर सामने आएं और अपनी दिक्कतें बताएं। उनकी ओर भी मदद के हाथ जरूर पहुंचेंगे। सरकारी , निजी तंत्र , जनप्रतिनिधियों और पुलिस विभाग को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि पर्दे के पीछे भी भूख से बिलबिलाते कई परिवार हैं। पर्दे के आगे वाले को तो सब जान जा रहे हैं , पीछे कोई नहीं पहुंच पा रहा है। ऐसे परिवार हर जिले में काफी संख्या में मिल जाएंगे। विभिन्न जिलों के कई को तो मैं खुद जानता हूं लेकिन खुलासा करना उचित नहीं होगा । जिनका खुलासा हो गया है उसके बारे में कहा जा सकता है।

यह वाकया कुशीनगर का है

पडरौना में खाने के पैकेट भेजने के लिए मोहल्लेवार गरीबों की सूची बनवाई गई थी। नगरपालिका के चेयरमैन विनय जायसवाल का कहना है कि मैं खुद पैकेट बांट रहा था। एक परिवार में खाना पहुंचाने गया तो वह परिवार अंदर बुला ले गया। फिर छत पर ले गया। मैंने देखा पड़ोस की एक घर की छत पर दो-तीन बच्चे मेरे हाथ में खाने के पैकेट को बड़े गौर से देख रहे थे। मैंने उन्हें बुलाकर पूछा। छोटा बच्चा बोलता उससे पहले बड़ी बहन ने उसे चुप करा दिया। नीचे उतरकर मैं उस परिवार के पास पहुंचा। बात करते हुए उनके किचन में घुसा तो पता चला कि बीती रात घर में कुछ नहीं पका था। बच्चे पिछली शाम से ही भूखे थे। परिवार ने यह बात किसी से साझा नहीं की।

सरकारी लाभ भी नहीं मिल सकता

कभी के ये सम्पन्न थे। इसका इन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ये गरीबों में शुमार नहीं हो पाते। इस वजह से इन्हें सरकारी सुविधाएं भी नहीं मिल पाती हैं। सामान्य दिनों में तो ये निजी नौकरी करके कमा लेते हैं। लॉक डाउन के हालत में सबकुछ बन्द है , इस कारण इनकी हाल दयनीय हो गई है। सामाजिक प्रतिष्ठा में कहीं पलीता न लग जाए , इस वजह से अपने पड़ोसी , परिचित ,  जनप्रतिनिधियों , सरकार और स्वयं सेवी संस्थाओं को बता नहीं रहे हैं। इसके बाद हुई खोजबीन में पूरे शहर में 100 से अधिक परिवार सामने आए हैं। ये कभी खाते-पीते सम्पन्न परिवार रहे हैं। मगर वर्तमान में हालात के आगे मोहताज हैं। गरीबी उन्हें खाने नहीं देती और खुद्दारी उन्हें मांगने नहीं देती। ऐसे परिवार हर शहर और कस्बे में होंगे। गरीब तो हैं लेकिन खुद और समाज की निगाह में गरीब नहीं हैं।

शर्माना छोड़ें  , हकीकत बताएं

लोगों से मेरी अपील है कि प्रतिष्ठा की बात छोड़िए । जीवन में उतार और चढ़ाव आता रहता है। यह शर्माने की बात नहीं है। भोजन के लिए खुलकर किसी से भी कहिए। जीवन रहेगा तो ईमानदारी से मेहनत के बल पर काम करके प्रतिष्ठा और धन दोनों ही फिर से प्राप्त किया जा सकता है।

 


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