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ना मामा से काना मामा ही बेहतर यानी वैक्सीन न होने से कमजोर वैक्सीन ही बेहतर है

ना मामा से काना मामा ही बेहतर यानी वैक्सीन न होने से कमजोर वैक्सीन ही बेहतर है
रूस के आम लोगों को इस महीने ही मिलने लगेगी कोरोना वैक्सीन ‘स्पूतनिक-5’ , जब तक भारतीय वैक्सीन या दवा नहीं बनती भारत की सरकार को भी इसे खरीदने का प्रयास करना चाहिए , इसी से बाजार , सेहत और आत्मविश्वास सुधरेगा
दुनिया भर में कोरोना वायरस तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। सभी खराब खबरों के बीच रूस की जनता के लिए बेहद ही अच्छी खबर है। कोरोना वैक्सीन  ‘स्पूतनिक-5’  अगले हफ्ते आम जनता के लिए उपलब्ध हो जाएगा। शुरुआत में कुछ वक्त तक यह वैक्सीन फ्रंटलाइन वैरियर को ही उपलब्ध थी।
रूसी न्यूज एजेंसी TASS ने एक्सपर्ट डेनिस लोगुनोव के हवाले से कहा कि ‘स्पूतनिक-5’ वैक्सीन के व्यापक इस्तेमाल के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी है और अब इसे जल्द उपलब्ध कराया जाएगा।
रशियन एकेडमी ऑफ साइंसेस में डेप्युटी डायरेक्टर डेनिस लागुनोव ने कहा, ‘कुछ दिनों में परीक्षण शुरू होगा। इसके कुछ समय बाद ही हमें अनुमति भी लेनी होगी। आम लोगों को वैक्सीन उपलब्ध कराने के लिए निश्चित प्रक्रिया है। 10-13 सितंबर के बीच, नागरिक इस्तेमाल के लिए वैक्सीन के बैच की अनुमति प्राप्त करनी है। उसके बाद से ही जनता को वैक्सीन लगाई जानी शुरू हो जाएगी।’
‘स्पूतनिक-5’ के दो ट्रायल इस साल जून-जुलाई में किए गए थे और इसमें 76 प्रतिभागी शामिल थे। परिणामों में 100 फीसदी एंटीबॉडी विकसित हुई और इसका कोई भी गंभीर दुष्प्रभाव भी सामने नहीं आया।
रूस की वैक्सीन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता क्यों नहीं ?
विचार करने की जरूरत है कि रूस की ओर से खोजी गई वैक्सीन को लेकर डब्ल्यूएचओ मान्यता क्यों नहीं दे रहा है ? अमेरिका सहित अन्य देश भी इसमें ढेर सारी खामियां निकाल रहे हैं कि तीसरे चरण की टेस्टिंग नहीं हुई है। यह एक व्यवसायिक प्रतिद्वंदता का भी मामला हो सकता है क्योंकि दुनिया की नामी गिरानी फार्मास्युटिकल कंपनियां कोरोना के वैक्सीन को बनाने में अरबों रुपया खर्च कर रहीं हैं , यदि रूस की वैक्सीन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई तो दुनिया की अन्य कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। मान्यता तो पहले उसी देश की फार्मास्युटिकल कंपनी को मिलेगा जो धन और बल में ताकतवर होगा।
कभी का सोवियत संघ और आज का रूस विकसित देश है। कभी दुनिया में अमेरिका और रूस दो ताकतवर देश थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद आज भी रूस ताकतवर और विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी देश है। यदि उसने कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन की खोज की है और अपने नागरिकों को वैक्सीन इसी महीने उपलब्ध कराने जा रहा है तो यह उसकी उपलब्धि है। कोई देश अपने नागरिकों को गलत दवा नहीं देगा। शुरुआती दौर में कमजोर वैक्सीन भी आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए कारगर होगी। आत्मविश्वास बढ़ने से अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। वैक्सीन न होने से तो कमजोर वैक्सीन होना बेहतर है। बाद में धीरे-धीरे इसे मजबूत वैक्सीन बनाया जाएगा। शुरुआत में कोई भी तकनीक कमजोर ही होती है जो धीरे धीरे मजबूत होती जाती है। कभी मेडिकल साइंस काफी कमजोर था , समय के साथ एडवांस होता जा रहा है , यही स्थिति सभी क्षेत्रों की है। भारत सरकार को चाहिए कि वह रसिया से वैक्सीन को खरीदे और भारतीयों को वैक्सीन मुहैया कराने की घोषणा करे। ऐसा होते ही आत्मविश्वास बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ लेगी। पूरी तरह से बाजार को खोलना भी आसान होगा। जो जानकारी मिल रही है पोलियो की वैक्सीन भी रसिया की ही खोज है । उस वैक्सीन का भी दो ही परीक्षण हुआ है। इसके बाद ही लोगों को दिया जाने लगा। यह वैक्सीन पूरी दुनिया में सफल है।
भारत में आज भी आयुर्वेद ही इम्यून सिस्टम ठीक रखे है
अंग्रेजी दवा में कोरोना वायरस का कोई इलाज नहीं है। सभी भारतीय तुलसी , हल्दी , अदरख , गिलोय आदि का काढ़ा पीकर ही प्रतिरोधक क्षमता को बनाए हुए हैं। यही कारण है कि भारत में अन्य देशों की तुलना में मृत्युदर काफी कम है। पतंजलि योग पीठ ने कोरोना की दवा कहकर एक दवा लांच कर दी। खलबली मच गई। दवा वही है सिर्फ बेचने का तरीका बदला है। अब बेहतर इम्यून सिस्टम के नाम से यह बेची जा रही है , इस दवा की काफी मांग है। इसके पीछे भी अंतरराष्ट्रीय साजिश हो सकती है । यदि कोरोना की दवा के नाम पर इसकी बिक्री शुरू हो जाती तो वैक्सीन बनाने वाली भारत और दुनिया की बड़ी कंपनियों को काफी घाटा उठाना पड़ता। यदि भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारना है तो भारत सरकार को किसी उचित आयुर्वेद की दवा को मान्यता देनी होगी। ऐसा होते ही बाजार कुलांचे भरने लगेगा। इस दौरान वैक्सीन भी विकसित करते रहिए। कहने का आशय है मामा के न रहने से काना मामा ही बेहतर है।

 


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