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सुप्रीम कोर्ट में `बाबरनामा` पढ़कर मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद होने का दिया तर्क

सुप्रीम कोर्ट में `बाबरनामा` पढ़कर मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद होने का दिया तर्क
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई के 28वेंक दिन मुस्लिम पक्ष के वकील राजीवन धवन ने बाबरनामा के अलग-अलग संस्करणों का सहारा लिया. राजीव धवन ने इसके अनुवाद से यह साबित करने की कोशिश की कि मस्जिद को बाबर ने ही बनवाया था. धवन उन दस्तावेजों को पढ़ रहे हैं, जिसके मुताबिक विवादित संरचना पर अरबी और फारसी में अल्लाह लिखा था.
धवन ने कहा कि 1989 में न्यास ने मामले में दावेदारी पेश की और उन्ही दिनों कार सेवक सक्रिय हुए और फिर ढांचा तोड़ दिया गया, ताकि मंदिर बनाया जा सके. उन्‍होंने कहा कि जानबूझकर मस्जिद तोड़ा गया, ताकि वहां मंदिर बनाया जा सके. न्यास के दावे के बाद ही कर सेवा शुरू किया गया और ढांचा तोड़ा गया.
राजीव धवन ने कहा कि 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने का मकसद हकीकत को मिटाया जाना था, इसके बाद हिन्दू पक्ष कोर्ट में दावा कर रहा हैं. सोची-समझी चाल के तहत इसके लिए बाकायदा 1985 में रामजन्मभूमि न्यास का गठन किया गया. 1989 में इसको लेकर मुकदमा दायर किया, वहीं दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद ने देश भर में हिंदुओं से शिला इकट्ठी करने का अभियान शुरू कर दिया. माहौल इस कदर खराब कर दिया गया कि उसका नतीजा 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंश के तौर पर सामने आया. धवन ने ये भी कहा कि श्रीराम जन्म स्थान के नाम से याचिका दाखिल करने का मकसद मुस्लिम पक्ष को ज़मीन से पूरी तरह बाहर करना था.
राजीव धवन ने मामले के एक पक्षकार गोपाल सिंह विशारद की ओर से दायर केस में 22 अगस्त 1950 को एडवोकेट कमिश्नर बशीर अहमद की ओर से पेश रिपोर्ट का हवाला दिया. धवन के मुताबिक इस रिपोर्ट में विवादित ढांचे पर मौजूद कई शिलालेख का जिक्र था. इन शिलालेखों के मुताबिक बाबर के निर्देश पर ही उनके कमांडर मीर बाकी ने ही बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था.
राजीव धवन ने आरोप लगाया कि इन शिलालेखों पर हिंदू पक्ष आपत्ति जता रहा है, लेकिन उनकी आपत्ति निराधार है. इन शिलालेखों का वर्णन बकायदा विदेशी यात्रियों के यात्रा संस्मरण और गजेटियर जैसे सरकारी दस्तावेजों में है. धवन ने कहा कि अपनी दलीलों के समर्थन में इन्हीं यात्रा- संस्मरणों और शिलालेखों का हवाला देने वाला हिंदू पक्ष कैसे इन शिलालेखों को नकार सकता है.
राजीव धवन ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन शिलालेखों के बीच विरोधाभास को मानते हुए शिलालेखों को नकार दिया, जो सही नहीं है. सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबड़े ने राजीव धवन से सवाल पूछा कि कई पुरानी मस्जिदों में संस्कृत में भी कुछ लिखा हुआ मिला है, वो कैसे संभव हुआ?
जवाब में राजीव धवन ने कहा कि ऐसा इसलिए संभव है कि इमारत बनाने वाले मजदूर कारीगर हिन्दू होते थे, वे अपने तरीके से इमारत बनाते थे, बनाने का काम शुरू करने से पहले वो विश्वकर्मा और अन्य तरह की पूजा भी करते थे, काम पूरा होने के बाद यादगार के तौर पर कुछ लेख भी अंकित कर दिया करते थे.
अब, आयोध्‍या मामले में अगली सुनवाई सोमवार को होगी. सुप्रीम कोर्ट सोमवार को शाम 5 बजे तक सुनवाई करेगा. वैसे सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शाम 4 बजे तक होती है. चूंकि, सोमवार को चार नए जजों की भी शपथ लेनी है, इसलिए उस दिन सुनवाई देर से शुरू होगी.

 

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