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बसपा ने मुनकाद अली का कद घटाया, लोकसभा में पार्टी नेता की कमान रितेश पांडे को सौंप ब्राह्मण कार्ड खेला

बसपा ने मुनकाद अली का कद घटाया, लोकसभा में पार्टी नेता की कमान रितेश पांडे को सौंप ब्राह्मण कार्ड खेला

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 2007 की कहानी दोहराने की रणनीति बनाई है

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 2007 की कहानी दोहराने की रणनीति बनाई है. बसपा ने महत्वपूर्ण पदों पर ब्राह्मण नेताओं को तवज्जो देना शुरू कर दिया है.पिछले दिनों संगठन में ब्राह्मण बिरादरी को अहम पदों पर बैठाने के फैसले के साथ ही लोकसभा में पार्टी नेता का पद भी ब्राह्मण बिरादरी के खाते में डाल दिया है. इसके साथ ही पार्टी के सबसे कद्दावर नेताओं में शुमार हो चुके मुनकाद अली के पर मायावती ने कतर दिए हैं. अब उनके पास केवल प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी रहेगी.
बसपा प्रमुख मायावती ने सोमवार की शाम को ट्वीटर पर पार्टी के फैसले का ऐलान किया. मायावती के अधिकृत ट्वीटर हैंडल से एक के बाद एक तीन ट्वीट किए गए. तीनों ट्वीट पार्टी में बड़े बदलाव के संदेश से हैं. पहले ट्वीट में मायावती ने कहा कि बीएसपी में सामाजिक सामंजस्य बनाने को मद्देनज़र रखते हुये लोकसभा में पार्टी के नेता व उत्तर प्रदेश के स्टेट अध्यक्ष भी, एक ही समुदाय के होने के नाते इसमें थोड़ा परिवर्तन किया गया है.
https://twitter.com/Mayawati/status/1216701649483227136
दूसरे ट्वीट में बसपा प्रमुख ने मुनकाद अली के कद को कमजोर करने का ऐलान किया. इसमें उन्होंने पहले ट्वीट को आगे बढ़ाते हुए लिखा कि अर्थात् अब लोकसभा में बीएसपी के नेता रितेश पाण्डे को व उपनेता मलूक नागर को बना दिया गया है. लेकिन उत्तर प्रदेश स्टेट के अध्यक्ष मुनकाद अली अपने इसी पद पर बने रहेंगे. तीसरे ट्वीटर बसपा प्रमुख ने कहा कि यहाँ उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीएसपी के नेता लालजी वर्मा, पिछड़े वर्ग से व विधान परिषद में बीएसपी. के नेता दिनेश चन्द्रा, दलित वर्ग से बने रहेंगे अर्थात् यहाँ कुछ भी परिवर्तन नहीं किया गया है.
इस ऐलान से साफ हो गया कि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लड़े गए लोकसभा चुनावों में बसपा शून्य से 10 सीटों तक पहुंच गई. उम्मीद के मुताबिक सीटें भले न मिली हों लेकिन इस जीत का ईनाम मुनकाद अली को मिला. वह उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष होने के साथ ही लोकसभा में भी पार्टी के नेता बन गए. लेकिन पिछले कुछ समय से यह चर्चा है कि बसपा 2007 के यूपी विधानसभा चुनावों में मिले आश्चर्यजनक नतीजों की ओर फिर लौटना चाहती है. तब, बसपा ने दलित-ब्राह्मण और मुस्लिम गठजोड़ से पूर्ण बहुमत हासिल किया था.
बसपा ने सरकार में भी ब्राह्मणों को महत्व दिया लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों को वह स्थान नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी. लिहाजा, ब्राह्मणों ने भी बसपा से दूरी बना ली. नतीजा यह निकला कि यूपी की सत्ता बसपा के हाथ से फिसल गई. बताते हैं कि विधानसभा चुनावों के दो साल बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनावों में शून्य सीटों पर अटक गई बसपा को अब ब्राह्मण मतों की कमी खल रही है. यह परिवर्तन भी उसी का हिस्सा है. पार्टी नेताओं का मानना है कि जिलाध्यक्ष जैसे पदों पर भी ब्राह्मण बिरादरी के नेताओं की नियुक्ति जल्द दिख सकती है. यह तैयारी 2022 के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक ताकत वापस पाने के लिए है.

 


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