बोध कराने वाला ही गुरु, जानिए गुरुपूर्णिमा का महत्व

आचार्य गोपाल शरण ( राजा ) पांडेय

भदैनी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश )
27 जुलाई यानी शुक्रवार को गुरु पूर्णिमा है. इन श्लोक से ही गुरु की महिमा साफ हो जाती है-
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
भावार्थ : गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम.
धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः ।
तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते ॥
भावार्थ : धर्म को जानने वाले, धर्म मुताबिक आचरण करने वाले, धर्मपरायण और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं.
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च ।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ॥
भावार्थ : बहुत कहने से क्या ? करोड़ों शास्त्रों से भी क्या ? चित्त की परम् शांति, गुरु के बिना मिलना दुर्लभ है.
प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा । शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥
भावार्थ : प्रेरणा देने वाले, सूचना देने वाले, (सच) बताने वाले, (रास्ता) दिखाने वाले, शिक्षा देने वाले, और बोध कराने वाले – ये सब गुरु समान हैं.
गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकार स्तेज उच्यते ।
अन्धकार निरोधत्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥
भावार्थ : ‘गु’कार याने अंधकार, और ‘रु’कार याने तेज; जो अंधकार का (ज्ञान का प्रकाश देकर) निरोध करता है, वही गुरु कहा जाता है.
जब भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा, नारद जी जहां बैठे थे उस स्थान को गोबर से लीप दो
एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए. भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया . जब नारद जी वापस गए तो विष्णुजी ने कहा -हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे . उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो .
जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे . उन्होंने सब सुन लिया और वापस आ गए व विष्णु भगवान जी से पूछा -हे भगवान जब मैं आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मैं जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो .
भगवान ने कहा- हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है . आप निगुरे हैं. जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है.
यह सुनकर नारद जी ने कहा- हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मैं गुरु किसे बनाऊं. नारायण बोले – हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मान लो .
नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए . जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला . नारद जी वापस नारायण के पास चले गए और कहा – महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता, में उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ?
यह सुनकर भगवान ने कहा – नारद जी अपना प्रण पूरा करो .नारद जी वापस आये और उस मछुवारे से कहा – मेरे गुरु बन जाओ. पहले तो मछुवारा नहीं माना, बाद में बहुत मनाने से मान गया.
मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापस भगवान के पास गए और कहा- हे भगवान मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखाएंगे . यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा- हे नारद गुरु निंदा करते हो , जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको 84 लाख योनियों में घूमना पड़ेगा.
यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान- इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये .भगवान नारायण ने कहा – इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो . नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई . गुरूजी ने कहा- भगवान से कहना 84 लाख योनियों की तस्वीरें धरती पर बना दें फिर उस पर लेटकर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना 84 लाख योनियों में घूम आया.
मुझे माफ़ कर दो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही कहा. उनसे कहा- 84 लाख योनियां धरती पर बना दीजिए और फिर उन पर लेट कर घूम लूं. और कहा -नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा .यह सुनकर विष्णु जी ने कहा -देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया. कहा-
नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है.
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस.
अर्थात, गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए . गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा. यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा “स्वयं गुरु” भी नहीं कर सकते .

 

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