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बिहार : शेषन ने बदला, अब कोरोना बदलेगा चुनाव की रूपरेखा

बिहार : शेषन ने बदला, अब कोरोना बदलेगा चुनाव की रूपरेखा

”राजनीतिक दलों को बदले रूप – रंग में आसान नहीं होगा वोटरों के अंतिम पायदान तक पहुंचना , वोटरों में से करीब आधे लोगों के पास इंटरनेट सेवा नहीं है। यह वर्चुएल प्लेटफार्म की राह में बहुत बड़ा रोड़ा है।”

आलोक श्रीवास्तव
बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल बज चुका है। कोरोना काल में होने वाला देश का ही नहीं दुनिया का यह सबसे पहले होने वाला बड़ा चुनाव होगा। यह चुनाव तीन चरणों में होगा। 28 अक्टूबर , 3 नवंबर और 7 नवंबर को 243 सदस्यीय विधानसभा के लिए वोट डाले जाएंगे। परिणाम 10 नवंबर को आएगा। विधानसभा का कार्यकाल 29 नवंबर को खत्म हो रहा है। इसके बाद 3 नवंबर को दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के नए राष्ट्रपति के लिए चुनाव होगा।
बिहार का यह चुनाव अन्य चुनाव की तुलना में काफी बदले रंग और रूप में होगा। 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 के बीच चुनाव का रंग-रूप बदला था , जब टीएन शेषन भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे। उस दौरान चुनाव प्रचार के दौरान कानफोड़ू भोंपुओं की आवाज से बाहर तो क्या घर के अंदर भी एक दूसरे की आवाज को सुनना मुश्किल हो जाता था , व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता था , सिर में दर्द होने लगता था लेकिन नेता और उनके समर्थकों को जनता के दर्द से क्या मतलब , वो अपने में मस्त रहते थे।
1955 बैच के आईएएस और कैबिनेट सेक्रेटरी पद पर रहे देश के शीर्ष नौकरशाह टीएन शेषन हिंदुस्तान के मुख्य चुनाव बने और सारे भोंपू बंद हो गए , बिल्डिंग , पुल और सार्वजनिक स्थलों की दीवारों की खूबसूरती को दागदार बनाने वाले बैनर और पोस्टर भी नदारद हो गए , जनता ने राहत की सांस ली। तब से अब तक जितने भी मुख्य चुनाव आयुक्त हुए शेषन के ही नक्शे कदम पर चल रहे हैं। उस दौरान नेताओं ने शेषन के कदमों का मुखर विरोध किया था। कहा था – इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा। शेषन ने कहा – संशोधन की कोई जरूरत नहीं है। संविधान निर्माताओं ने स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव कराने की व्यवस्था पहले से ही संविधान में कर रखी है , हम सिर्फ उसका अनुपालन कर रहे हैं। नेताओं को भारत का संविधान गहनता से पढ़नी चाहिए , सबकुछ संविधान में लिखा मिल जाएगा। आज से 25 साल पहले शेषन ने चुनाव का रंग-रूप बदला था , इस बार के चुनाव में व्यक्ति का नहीं , रंग – रूप बदलने में वायरस का योगदान है। नेताओं की चाहत नहीं हो पाएगी पूरी नेता , चाहे राष्ट्रीय दल का हो या क्षेत्रीय दल का या निर्दलीय , इच्छा एक ही होती है – शक्ति प्रदर्शन। लेकिन इस चुनाव में शक्ति प्रदर्शन करने का मौका नहीं मिल पाएगा।
चुनावी सभा और रैली ताकत के प्रदर्शन का मुख्य उपकरण है , लेकिन कोरोना प्रोटोकॉल के कारण 100 लोगों से ज्यादा एकत्र नहीं हो सकते , इतने कम लोगों में रैली करने में नेताओं को मजा नहीं आएगा और इसका कोई फायदा भी नहीं है। नामांकन के दौरान भी ताकत का मुज़ाहरा किया जाता है , वह भी करने का मौका नहीं मिलेगा क्योंकि सिर्फ दो गाड़ियां ही एलाउ है और उम्मीदवार के साथ दो से ज्यादा लोग नहीं रह सकते, सो यहां भी बेमजा हो गया।
गांवों में प्रचार के दौरान लग्जरी से लेकर टुटपुंजिया गाड़ियों का लम्बा -चौड़ा काफिला देहात की सड़कों पर धूल उड़ाते हुए सरपट भागता था , इस बार उसका भी दीदार नहीं हो पाएगा , क्योंकि घर घर प्रचार के लिए एक साथ पांच लोग ही जा सकेंगे। इससे एक फायदा है कि दल बड़ा हो या छोटा , साधन संपन्न हो या साधनविहीन या निर्दलीय हो , यदि उसके दो -चार कार्यकर्ता हर गांव में हैं , तो वह उस गांव में दरवाजे दरवाजे प्रचार कर सकता है। यानी इस मामले में एकदम समाजवाद झलकता है। डिजिटली भाषण सुनवाना चुनौती होगा प्रधानमंत्री ने अभी संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक को डिजिटल माध्यम बेबीनार के जरिए संबोधित किया। इस वक्त स्कूल , कालेज , विश्वविद्यालय की पढ़ाई भी ऑनलाइन हो रही है।
सरकारी अधिकारियों और कंपनियों की बैठक भी ऑनलाइन चल रही है , तो इस बार ऑनलाइन संवाद यानी वर्चुअल संवाद पर जोर होगा। सभी दल अपने वर्चुएल संवाद और सम्मेलनों से लोगों को जोड़ने के लिए मोबाइल फोन पर लिंक भेज रहे हैं। सबतक लिंक पहुंच जाए और सब लोग लिंक खोलकर भाषण सुनने लगें , यह आवश्यक नहीं है , लिंक खोलने के बाद कितनी देर तक भाषण सुनेंगे , यह कहना भी मुश्किल है। जबकि चुनावी सभा और रैली में लोग पूरे समय रहते हैं। बिहार की जनसंख्या 2011 में 10 करोड़ 38 लाख 4 हजार 6 सौ सैंतीस थी। दस साल में बिहार की जनसंख्या वृद्धि दर औसतन 25 प्रतिशत है। इस लिहाज से इस वक्त बिहार की जनसंख्या 13 करोड़ के आसपास पहुंच गई होगी।
इस समय बिहार में कुल महिला वोटर 3 करोड़ 39 लाख और पुरुष वोटर 3 करोड़ 79 लाख है। यानी की कुल वोटर 7 करोड़ 18 लाख हैं। अब आपको बताते हैं बिहार में कितने लोग मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। यह संख्या है 6 करोड़ 21 लाख । इनमें से इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 3 करोड़ 93 लाख ही हैं। कई 18 साल से कम उम्र वाले भी होंगे , जो वोटर नहीं हैं , वो भी इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे होंगे। इस प्रकार वोटरों में से करीब -करीब आधे लोगों के पास इंटरनेट सेवा नहीं है। यह वर्चुएल प्लेटफार्म की राह में बहुत बड़ा रोड़ा है। यानी इसके माध्यम से अंतिम पायदान तक पहुंचना बहुत ही मुश्किल है।
अन्य बदलाव भी नजर आएंगे बिहार चुनाव में कोरोना के कारण अन्य बदलाव भी देखने को मिलेंगे। जैसे – बूथों पर मास्क पहनकर जाना अनिवार्य होगा। दस्ताना पहनकर वोटर वोट डालेंगे। मतदानकर्मी पीपीई किट में नजर आएंगे। अब तक असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए सुरक्षाकर्मियों को लगाया जाता था , इस बार इनको सोशल डिस्टनसिंग सुनिश्चित करने के साथ मास्क में छिपे फर्जी वोटरों को भी पहचानना होगा।
अन्य परिवर्तन
उम्मीदवार अपना नामांकन ऑनलाइन कर सकते हैं और वो चुनाव लड़ने के लिए लगने वाली ज़मानत राशि भी ऑनलाइन जमा कर सकते हैं।
– मतदान के दिन अगर किसी मतदाता में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए तो उन्हें एक टोकन दिया जाएगा और उस टोकन के माध्यम से वे मतदान के अंतिम घंटे में अपना वोट डाल पाएँगे।
– एक मतदान केंद्र पर अधिकतम एक हज़ार मतदाता वोट दे पाएँगे , पहले मतदाताओं की अधिकतम संख्या 1500 थी।
– सभी मतदाताओं के लिए मास्क पहनना अनिवार्य होगा, जिसे पहचान ज़ाहिर करने के दौरान थोड़ी देर के लिए उन्हें हटाना होगा।
– कोरोना संक्रमित और क्वारंटीन में रह रहे मरीज़ों को स्वास्थ्य अधिकारियों की मौजूदगी में मतदान के अंतिम घंटे में वोट डालने की इजाज़त होगी। इस दौरान संक्रमण की रोकथाम के लिए तमाम उपाय किए जाएँगे।

 


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