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बड़ा सवालः यूूपी की जिम्मेदारी कितनी निभा पाएंगी प्रियंका?

बड़ा सवालः यूूपी की जिम्मेदारी कितनी निभा पाएंगी प्रियंका?
न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

अमरीश मनीश शुक्ला

प्रियंका गांधी पर इस चुनाव में पूर्वी यूपी की पूरी जिम्मेदारी है कि वह अपना जादू इन सीटों पर दिखाएं। 17 मार्च से चुनावी समर को धार देने के लिये प्रियंका यूपी में दौड़ शुरू करेंगी। प्रियंका की इमेज अभी तक टीवी अखबारों ने जो दिखाई है वहीं लोगों तक धुंधली और आधी अधूरी पहुंची है, लेकिन यह पहली बार होगा जब प्रियंका अपनी कहानी के साथ खुद गांव गांव पहुंचेंगी। जनता से मिलेंगी और लोग खुद जानेंगे कि आखिर प्रियंका में क्या खास है। राहुल का कुछ खास असर बीते कुछ सालों में देखने को नहीं मिला और जनता में उनकी इमेज अभी तक एक परिपक्व राजनेता की नहीं बन पायी है, ऐसे में दिल्ली की कुर्सी के लिये मोदी के अलावा क्या कोई विकल्प होगा ? यह प्रियंका के प्रभाव पर बहुत कुछ निर्भर करने वाला है। इसमें कोई शक नहीं कि अगर महागठबंधन में कांग्रेस भी होती तो सियासत का समीकरण अलग होता, परन्तु अपने दम पर चुनाव लड़ने और अपनी खोई साख को वापस पाने के लिये कांग्रेस की यह जद्दोजहद भविष्य की बेहतरीन तैयारी के तौर पर दिख रही है।
देश को पहला प्रधानमंत्री देने वाला शहर इलाहाबाद (प्रयागराज ) नेहरू जी की जन्मस्थली है, कांग्रेस की शुरूआत यहीं से हुई। कांग्रेस का सबसे मजबूत किला भी यहीं रहा। एकतरफा वोटिंग, एक तरफा लोकप्रियता की बानगी आाजादी के बाद कांग्रेस के ही हिस्से में आयी। पंडित नेहरू की उसी पुरानी चमक को देखने के लिये तरस रही कांग्रेस के लिये इलाहाबाद में वापसी जरूरी भी और खास भी। क्योंकि पूर्वांचल को अपना संदेश देने वाली फूलपुर व इलाहाबाद लोकसभा की सीट खोने के बाद ही कांग्रेस के बुरे दिन भी शुरू हो गये थे, जिसका क्रम अब थमने का नाम नहीं ले रहा। अपने परनाना की कर्मभूमि से आशीर्वाद लेकर अपने अभियान की शुरूआत कर रही प्रियंका भी इन दोनों सीटों की अहमियत जानती हैं, इसलिये वह शुरूआत भी यहीं से कर रही हैं।
आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने भी इलाहाबाद को अपनी प्रथम वरीयता पर रखा। यहां भाजपा की बैठक से लेकर सारे बड़े संगठनात्मक कार्य हुये और लोगों को एहसास कराया गया कि इलाहाबाद के लिये भाजपा कुछ भी करेगी। ऐसे में प्रियंका भी उसी रणनीति पर चले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा और प्रयागराज के रास्ते वह पीएम मोदी के गढ़ वाराणसी को भी ढहने के लिये जल मार्ग का प्रयोग कर रही हैं। यह एक तरह का प्रयोग भी है क्योंकि अभी तक इस तरह का प्रचार किसी दल की ओर देखने को नहीं मिला था। प्रियंका जल मार्ग के सहारे उन अनछुये इलाकों तक पहुंचने का प्रयास करेंगी, जहां अभी तक जाना संभव नहीं हो पाता था।

 

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