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#बेगूसराय : लिनिनग्राद ऑफ़ इंडिया

न्यूज डेस्क, नेशनलव्हील्स

-सिद्धार्थ शर्मा, बेगूसराय से

ख़म ठोक ठेलता  है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है !!
बेगूसराय । बुद्ध महावीर की विहारस्थली, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की धरती, गंगा की कृपा से भारत की सबसे उर्वरा भूमि में से एक, अंग्रेज हुकूमत से भी पंगा लेकर उनके गंगा पर चलने वाले जहाज़ों को रोककर  चुंगी वसूलने का दुर्दम साहस रखने वाले चकवारों की राजधानी, स्वतन्त्र भारत के शुरुआती दौर के औद्योगीकरण का प्रयोग क्षेत्र, वर्षा ऋतु में महीनों तक बाढ़ में डूबे दुनिया से कटे दियारे, बड़े बड़े जमींदारों से लेकर भूमिहीन खेतिहर मजदूरों का हुजूम, इंटरनेशनल स्कूल चलाने वाले धनाढ्यों से लेकर औद्योगिक कचरा उठाने वाले जीविकोपार्जियों का जमघट । गर्म मिजाज, कुटीर शस्त्र उद्योग में कुख्यात, सामंतवाद का गढ़, दबंगई, रंगदारी -सब मिलकर बेगूसराय है -असली भारत का जीवंत प्रतीक।

राष्ट्रद्रोही बनाम राष्ट्रप्रेमी का बैरोमीटर बनेगा चुनाव

इस लोकसभा चुनाव में भारत भर की नजरें बेगूसराय पर है।  क्योंकि बेगूसराय का चुनाव पिछले पांच साल के भाजपा के राष्ट्रद्रोही बनाम राष्ट्रप्रेमी के बाइनरी की जनस्वीकृति का बैरोमीटर बनेगा।  एक तरफ कन्हैया कुमार हैं, जिनपर मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के प्रारम्भ में ही देशद्रोही का लेबल चस्पा कर दिया था, तो दूसरी ओर भाजपा की उग्रता के जीवंत प्रतीक गिरिराज सिंह हैं, जो हर गैर भाजपाई को पाकिस्तान भेजने के टिकट एजेंट का प्रतिरूप बन चुके हैं।  इस खौलती कड़ाही को क्षेत्रीय दल राजद भी अपनी भरसक ऊष्मा दे रहा है।

औद्योगिक नगरी भी है तो बिन बिजली व सड़क के गांव भी

बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र में एक ओर जहाँ सघन जनसंख्या वाला बेगूसराय शहर आता है ,तो औद्योगिक नगर बरौनी भी आता है, बिना सड़क,  बिजली , शौचालय के शाम्हो, अकबरपुर , बरारी के कई देहात भी आते हैं।  स्वतन्त्र भारत के प्रारभिक दौर में ही बेगूसराय को औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया गया।  बरौनी में रिफाइनरी, फर्टिलाइजर, थर्मल पावर, डेरी आदि के बड़े बड़े उपक्रम बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के प्रयासों से स्थापित हुए,  जिसके चलते बेगूसराय बिहार की औद्योगिक राजधानी बन गया।  आज भी बेगूसराय में 4000 से अधिक औद्योगिक इकाइयां कार्यरत हैं। दूसरी तरफ मां गंगा की अनुकम्पा से बेगूसराय में खेती भी बम्पर होती है।  यहां की 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गेहूं की उपज पंजाब की उपज के टक्कर की है।  पर सच्चाई ये भी है की सरकारी खरीद की लचर व्यवस्था के चलते 2000 रुपये प्रति किवंटल सरकारी समर्थन मूल्य के बावजूद किसान 1600 रुपये पर दलालों को बेचने पर मजबूर हैं,  क्योंकि किसान के पास बम्पर फसल को भंडारण करने का इतना विशाल गोदाम नहीं होता।

भूमिहार जीत में निभाता है निर्णायक भूमिका

बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र में कुल करीब 17 लाख मतदाता हैं, जो 7 विधानसभा क्षेत्रों में फैले हुए हैं। कुल 250 पंचायतों में करीब 1200 गाँव देहात भी आते हैं।  साक्षरता 60 प्रतिशत से नीचे है।  मतदान औसतन 60 फीसदी होता है।  भारत के घोषित पिछड़े जिलों में से एक है।  पुरुष महिला अनुपात 875 है। प्रति व्यक्ति आय 18000 रुपये है ,जो कि बिहार के 13000 रुपये से अधिक है। कुल सात विधानसभा क्षेत्रों में से मौजूदा स्थिति में दो विधायक कांग्रेस के, दो जदयू के तथा दो राजद से हैं।  2015 विधानसभा चुनावों में भाजपा को यहां 20 फीसदी , जदयू को 15,  कांग्रेस को 14 ,राजद को 20 , लोजपा को 10 तथा सीपीआई को 10 प्रतिशत मत मिले थे। 2014 की लोकसभा चुनाव में भाजपा और जदयू को 40 प्रतिशत, राजद को 35,  सीपीआई को 18 प्रतिशत मत मिले थे। ध्यान रहे कि भारी औद्योगिकीकरण एवं स्थापित सामंतवाद के कारण बेगूसराय पारम्परिक रूप से सीपीआई का ठोस वोटबैंक रहा है तथा उसे 2009 के लोकसभा चुनावों में भी 33 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे।  बेगूसराय को ऐसे ही लिटिल मॉस्को या लिनिनग्राद ऑफ़ इंडिया की संज्ञा नहीं प्राप्त हुई है।
यदि जातीय समीकरण की दृष्टि से देखें तो सबसे अधिक मिश्रित दलित समुदाय 25 फीसदी , फिर भूमिहार 21 ,यादव 14 , मुस्लिम 13, अन्य सवर्ण 11,  कुशवाहा 6 और निषाद के रूप में 3 प्रतिशत मतदाता हैं ।  पारम्परिक तौर पर यादव औऱ मुस्लिम मत राजद के खेमे में जाते हैं,  दलित मत सीपीआई को तथा भूमिहार व अन्य सवर्ण मत कांग्रेस और भाजपा में बंटता है। भूमिहार समाज संख्या में भी, प्रभाव में भी तथा दबंगई में भी आगे होने की दृष्टि से जीत में निर्णायक सिद्ध होता है।

सीपीआई ने हासिल की प्रारंभिक बढ़त!

सीपीआई ने स्थानीय युवा भूमिहार कन्हैया कुमार को चुनाव से बहुत पहले ही अपना प्रत्याशी बनाकर समीकरण में प्रारम्भिक बढ़त हासिल कर ली। 2018 के उत्तरार्ध से ही सीपीआई के कैडर ने प्रतिदिन कन्हैया कुमार की गाँव गाँव में जनसभाएँ आयोजित करनी शुरू कर दी, जिसमें कन्हैया का काफिला दोपहर से ही उस गाँव के प्रभावशाली व्यक्ति के दालान पर गोष्ठियां भी करता था, भोजन आदि भी करता था, स्थानीय लोगों से संवाद भी करता था। शाम को उसी गाँव में जनसभा भी होती थी, जिसमें सीपीआई का कैडर बढ़ चढ़ कर मजदूर ,दलित ,पिछड़ों की भीड़ भी इकट्ठा करता था , जिसे कन्हैया अपने प्रभावशाली ग्रामीण बोली में सम्बोधित करते रहे। कन्हैया का डोर-टु-डोर कंपेन का यह सिलसिला कमोबेश 6 महीनों तक चलता रहा, जिसके चलते गाँव , देहात में भाजपा द्वारा प्रचारित उनकी राष्ट्रद्रोही वाली छवि काफी हद तक कुंद पड़ गई। स्थानीय तथा स्वजातीय होने की सहानुभूति भी कन्हैया को भरपूर मिली , क्योंकि कन्हैया की नेगेटिव छवि के प्रचार के अलावा भाजपा अपनी तरफ से कोई उम्मीदवार नहीं उतार पाई।  गौरतलब है की बेगूसराय की 7 विधानसभा सीटों में से एक भी भाजपा की नहीं है।  जो 2 जदयू के खाते में है, वो भी 2015 में भाजपा विरोधी गठबंधन के नाते मिली है।  इस पूरी कवायद में कन्हैया कुमार को क्षेत्र में स्वीकृति भी मिली, धूमिल छवि को नई चमक भी। इस पूरे दौर में  राजद पूरी तरह से शांत रहा जिससे मुसलमान और यादव बहुल क्षेत्रों में भी कन्हैया के अनुमोदन सूचकांक में वृद्धि ही हुई। कांग्रेस का पूर्णतः नेपथ्य में चले जाने से कन्हैया के कैम्पेन में और अधिक बलवृद्धि हुई। वर्तमान जमीनी रुझान में बछवाड़ा, तेघरा तथा मटिहानी विधानसभा क्षेत्रों में कन्हैया कुमार बढ़त लिए हुए दिख रहे हैं। चेरिया बरियारपुर, बेगूसराय, साहेबपुर कमाल तथा बखरी क्षेत्रों में कांटे का त्रिकोणीय संघर्ष जारी है। तथापि इस बात से नकारा नहीं जा सकता की क्षेत्र में भाजपा, जदयू व लोजपा का भी 35 फीसदी वोटबैंक 2015 तक ठोस रूप से मौजूद रहा है।  राजद का भी 20 प्रतिशत सशक्त वोटबैंक 2015 में रहा है ।  इन चुनावों में उपरोक्त दोनों मैदान में हैं, जो कन्हैया कुमार की बढ़ती लोकप्रिययता को वोट में तब्दील होने से रोकने की पूरी क्षमता रखते हैं।

प्रश्न अनेक, अब सिर्फ उत्तर की खोज

जातीयता, साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीयता, गरीबी, बेरोजगारी, किसान व्यथा आदि के इस उबलते तेल में से कौन अपनी खाल बचाकर निकलेगा यह बेगूसराय के लिए ही नहीं पूरे भारत के वैचारिक विमर्श का दिशा सूचक होगा।  क्या कांग्रेस की अनुपस्थिति में कांग्रेस का वोटर कन्हैया की तरफ जाएगा ? क्या एक चौथाई भूमिहार कन्हैया को स्वजातीय एवं स्वक्षेत्रीय मानकर उसकी तरफ झुकेंगे ? क्या सीपीआई के करीब तीन लाख दलित वोट कन्हैया के पक्ष में एकमुश्त पड़ेंगे ? क्या 50 हजार यादव  युवा जातपात से ऊपर उठकर कन्हैया में अपनी छवि देखेंगे ? क्या दो तिहाई मुसलमान अपना पारम्परिक वोट राजद के खेमे से कन्हैया के खेमे में ट्रांसफर करेंगे ? क्या पढ़ा लिखा युवा वर्ग कन्हैया के शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार के विचारों को सहमति प्रदान करेगा ? या बाहरी भूमिहार गिरिराज सिंह हर हर मोदी के गीत गाते हुए गंगा पार करेंगे ?

बेगूसराय में 2019 का चुनाव संक्षिप्त में ऐसा होगा

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
बेगूसराय ! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।
भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर कोई भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।
( -लेखक का पैतृक ग्राम बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के मटिहानी विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है।)

 

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